लेख

हिन्दी भाषा के साथ-साथ भारतीय भाषाओं का प्रयोग जरूरी (लेखक-डॉ. भरत मिश्र प्राची / ईएमएस)

10/06/2019

किसी भी देश की अपनी एक भाषा होती है। जिसमें पूरा राष्ट्र बात करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है। जिसमें पूरे देश का स्वाभिमान झलकता है। यहीं भाषा राष्ट्रभाषा कहलाती है। राष्ट्रभाषा राष्ट्र की आत्मा होती है। जिसमें पूरा देश संवाद करता है। जिससे राष्ट्र की पहचान होती है । यह तभी संभव है जब सभी भारतवासी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। तभी सही मायने में हिन्दी का राष्ट्रीय स्वरूप उजागर हो सकेगा। हिन्दी के राष्ट्रीय स्वरुप उजागर होने की आज महत्ती आवश्यकता है। जिसमें देश की एकता अस्मिता समाहित है। पर इस भावना का अनादर आज तक ओछी राजनीति के चलते यहां होता रहा है। जैसे वर्तमान में तमिलनाडू में हिन्दी का विरोध जारी है। इस तरह का विरोध पहले भी देश में होता रहा है जिसके पीछे स्थानीय राजनीति प्रभावी रही है। इस विरोध को कम करने के उदेश्य से राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ - साथ सरकार ने पूर्व में त्रिभाषीय फर्मूला श़िक्षा जगत में लागू करने का प्रयास किया जिसे केन्द्रीय विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल भी किया गया पर यह अपना मूलरूप आजतक नहीं ले पाया। जिसके पीछे इसे अमल लाने में लापरवाही रही।
स्वतंत्रता उपरान्त देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी संवैधानिक रुप से बन तो गई परन्तु 72 वर्श बाद भी वह इस देश की भाषा आज तक नहीं बन पाई। आज भी यहां इस भाषा पर सात समुंदर पार की भाषा अंगल पूर्णरूपेण हावी है। संसद, विधान सभा, शिक्षा एवं सरकारी, निजी कार्यालयों में इसके जारी प्रभाव को आसानी से देखा जा सकता है। आम प्रयोग एवं बोलचाल में आज भी अंगल के प्रभाव को देखा जा सकता है। यह प्रभाव हमारी जनभाषाओं पर भी पड़ा है। जनभाषा जो माता की गोद से मिली है, जिसमें जन्मभूमि की पहचान समाई है, वह भी आज बनावटीपन, दिखावा के परेवेश में उलझकर अपने अस्तित्व को दिन प्रति दिन खोती जा रही है। स्वाधीन भारत में अंग्रेजियत प्रभाव एवं स्वार्थपूर्ण राजनीति के कारण न तो हिन्दी राष्ट्रभाषा बन सकी न जनभाषा भावी पीढ़ी की धरोहर बन सकी। अंग्रेजी स्कूलों का बढ़ता दायरा एवं दिखावे के परिवेश से जुड़ी अंग्रेजी मानसिकता आज तक स्वाधीन भारत के स्वरुप को उजागर नहीं कर पाई। आज भी स्वतंत्र भारत का एक हिन्दी अधिकारी अपने आप को हिन्दी ऑफिसर कहलाना ज्यादा बेहतर मानता ही नहीं, बच्चों को अंग्रजी स्कूल में पढ़ता है, उसे पूर्णरूपेण अंग्रेजीयत संस्कृति में डालने का भरपूर प्रयास करता है। देश का जनप्रतिनिधि संसद एवं विधान सभा में हिन्दी के वजाय अंग्रेजी झाड़ता है, इस तरह की मानसिकता वाले हिन्दी अधिकारी से जो हिन्दी की रोटी खाकर अंग्रेजी का गुणगान करता है, ऐसे जनप्रतिनिधि से जो देश की संप्रभुता एवं अस्तित्व की रक्षा का संकल्प लेकर निज भाषा को तज पराई भाषा का आदर करते है।
आज यहीं मूल कारण है कि राष्ट्रभाषा होने के वावयूद भी हिन्दी का विरोध जारी है। हिन्दी का विरोध नहीं हो इसके लिये जरूरी है कि हिन्दी के साथ - साथ भारतीय अन्य भाषाओं का भी प्रयोग देश भर में किया जाय। इस दिशा में सरकार का पूर्व त्रिभाषीय प्रयोग सफल हो सकता है पर इसे सही ढ़ंग से लागू करने की आवश्यकता है। सभी को अपनी भाषा से प्यार है जिसे किसी भी कीमत पर अलग नहीं किया जा सकता। यदि देवनागरी लिपि के माध्यम से भारतीय भाषाओं का ज्ञान देशवासियों को प्रारम्भिक स्तर से ही शिक्षा के माध्यम से दिया जाय तो पुरा देश भाषा के मामले में एक जैसा दिखाई देगा। इसी तरह भारतीय भाषाओं की लिपि का भी ज्ञान प्रारभिक स्तर से ही देश के बच्चों को दिया जाय तो आगे चलकर वे अपनी धरती पर परायपन का बोध नहीं कर सकेगे। तब हिनदीं का रोध होना कम हो सकता है। जब हमारे देश के बच्चें सात समुन्दर पार की भाषा सीख सकते है तो अपने देश की भाषा क्यो नही ? इस पर अमल करने की जरूरत है। हिन्दी के साथ - साथ भारतीय भाषाओं का प्रयोग जरूरी है तभी हिन्दी का विरोध कम हो सकता है। इसके लिये शिक्षा क्षेत्र में भाषा ज्ञान विषय शुरू करने की आवश्यता है जिसके माध्यम से भारतीय भाषाओं की लिपि एवं आमबोलचाल के शब्दों की जानकारी देवनागरी एवं अंगल भाषा के साथ देने का प्रयास किया जा सकता है। यह देश अपना है। भाषा से ही देश की पहचान बनती है। राष्ट्रभाषा को लेकर किसी भी तरह कर राजनीतिक रोध किया जाना राष्ट्रहित में कदापि नहीं हो सकता ।
10जून/ईएमएस