लेख

भारतीय शिक्षित बेरोजगारों का भविष्य (लेखक- डॉ. अरविन्द जैन/ईएमएस)

26/03/2019

हमारे देश भारत नहीं इंडिया बाबा का भविष्य उस समय से तय हो चूका था जब से भारत का नाम इंडिया हुआ। इंडियन मतलब अपढ़, गंवार, और असभ्य यह परिभाषा ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने दी हैं। सबसे पहले गरीबी अपने आप में अभिशाप हैं और उस पर आमदनी का जरिया न हो तो जीते जी मरना होता हैं, जब छात्र १० वी पास करने बाद उसके लिए डॉक्टर, इंजीनियर आदि बनने का समय होता हैं तब वह उमंग के साथ अपने विषय का चयन करता हैं और उस दिशा में बढ़ता और पढता हैं। फिर उस हिसाब से कॉलेज जाकर अपनी उपाधि लेता हैं और फिर कुछ उच्चतम शिक्षा लेकर अपने संजोयें सपनो के अनुरूप नौकरी तलाशता हैं क्योकि वह स्वप्न देखता हैं, जमीनी हक़ीक़त से दूर रहता हैं और उसकी स्वप्न से निद्रा भग्न होती हैं तब वह धरातल पर आ गिरता हैं। औसतन २५ वर्ष वह अपनी पढाई लिखाई में भेट करता हैं और उसके बाद उसकी योग्यता के अनुरूप अधिकांश को नौकरी नहीं मिलती,
भाषणों /वादों से पेट की आग नहीं बुझती उसके लिए अन्न /भोजन चाहिए जिसके लिए पैसा और पैसे के लिए नौकरी /व्यापार या अपराध। हमारे देश में नौकरी और व्यापार कम हैं और अपराध बहुत हैं, दुःख इस बात का होता हैं की जो छात्र या नवयुवक जिस विषय में पारंगत होता हैं उसके अनुरूप काम या नौकरी नहीं मिलती हैं, नौकरी न मिलने का कारण सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन समुचित नहीं हैं। यह सच हैं की देश की आबादी के अनुरूप नौकरियां नहीं हैं पर जितनी भी हैं उनमे चयन और नियुक्ति पत्र समय पर न होने का कारण मात्र सुविधा शुल्क हैं। कारण परछाईं को जितना पकड़ने का प्रयास करो वह उतनी दूर भागती हैं। और थम जाओ तो मिल जाओ।
वर्तमान में हमारे देश के प्रधान सेवक ने २०१४ में कहा था की मेरी सरकार प्रतिवर्ष २ करोड़ नौकरियां देगी और दे दी बेरोजगारियाँ ये सब सरकारी आकंड़े हैं। रेलवे की प्रथम ग्रेड की नौकरी जिसमे हेल्पर, गैंगमैन, केबिनमैन,कीमेन,ट्रैकमैन और वेल्डर की पोस्ट के लिए न्यूनतम शिक्षा १० वी पास होनी चाहिए। और पद खाली थे ६२,९०७। इसके लिए आवेदन पत्र मात्र १.९ करोड़ १०वी पास अभ्यार्थी आये और ४८.४८ लाख उपाधि और उत्तर उपाधि धारकों ने भी आवेदन किया। रेलवे द्वारा जारी विज्ञापन में वेतन और भत्ते मिलाकर १८००० रुपये वेतन हैं आवेदन कर्ताओं का विभाजन इस प्रकार हैं ४ .९१ लाख उपाधि धारक इंजीनियर और ४१००० पोस्ट ग्रेजुएट ने १० पास की अर्हता के लिए आवेदन किया था और उपाधि धारी मैनेजमेंट की ८६,००० आवेदन आये थे। रेलवे ने २ करोड़ आवेदन प्राप्त किये प्रथम ग्रेड के लिए। सरकार की तरफ से यह सूचना बताई गयी की अधिकांश लोग सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देते हैं और कुछ लोग कहीं और नौकरी कर रहे हैं और इस वर्ग के लिए आवेदन कर रहे हैं।
नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के मुताबिक वर्ष २०११ -१२ से २०१७ -१८ के बीच आकस्मिक कामगारों की नौकरियों से हाथ धोना पड़ा जिसमे लगभग ३ करोड़ मजदुर जो खेतिहर थे। और करीबन ४.७करोड युवाओं को नौकरी से वंचित रहना पड़ा। पिछले वर्ष १ करोड़ नौकरिया सरकार की गलत नीतियों के कारण नहीं भर पायी। वर्ष १९९३ -९४ से देश में बेरोजगारी का प्रतिशत बढ़ा हैं। वर्ष २०१८ में मोदी सरकार ने मात्र ४५० लोगों को प्रतिदिन नौकरी दी हैं जो ऊंट के मुँह में जीरा हैं।
इस प्रकार हम यदि एक विभाग रेलवे की देखे तो इससे समझ में आता हैं की पढ़े लिखे छात्र अब अपनी योग्यता से भी कमतर पद पर नौकरी करने बाध्य हैं, जबकि उन्होंने कितना श्रम कर उपाधियाँ प्राप्त की और उनको अपेक्षित नौकरी नहीं मिल रही हैं, इससे वे अच्छे हैं जो निरक्षर और अपढ़ हैं वे कम से कम श्रम कर अपना भरण पोषण कर लेते हैं जो भी जैसा मजदूरी का काम, आजकल व्यापार की स्थिति ऐसी हो गयी की रोजगार करने वाला बेरोजगार होता चला जा रहा हैं। जिसने स्वप्न देखे थे और उसे कोई मार्ग न सूझे तो वह क्या करेगा, वह तड़पेगा जैसे प्रधानसेवक चुनाव के समय अपनी जीत के लिए वोट की भीख मांगने तैयार हैं, क्या वे भविष्य में यदि चुनाव हार जाते हैं तब भी उन्हें पदानुसार सब सुविधाएं मिलेंगी किसकी दम पर, हम वोटरों की दम पर। और हम करदाताताओं के धन से
भारत वर्ष की प्रतिष्ठा विश्व स्तर पर बहुत हैं, हम स्वर्णिम युग में जी रहे हैं और हमारे प्रधान सेवक पूरे विश्व में भ्रमण कर, समझौता करके आये पर अब तक कितनों को नौकरी दी। इस चुनाव में यह मुद्दा विशेष रूप से होना चाहिए की भविष्य की क्या रूपरेखारहेंगी सभी पार्टियों की, यदि यह क्रम जारी रहा तो स्थिति विस्फोटक हो जाएँगी।
इसके लिए जरुरी हैं की सरकार सुनियोजित ढंग से नौकरी का प्रबंधन करे और जो युवा भारत का भविष्य हैं उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर आये अन्यथा युवा का भविष्य दांव पर लगा रहेगा और बिना नौकरी व्यवसाय के वे अपराध की दुनिया में जायेंगे और उन्हें मुफ्त में रहना खाना सरकार की तरफ से मिलेगा।
इसके लिए इंडिया का नाम भारत रखे अन्यथा हम वास्तव में असभ्य गंवार और अपढ़ माने जायेंगे और अब बहुत हो चुके भाषण, अब हमें नौकरी और रोटी कपडा और मकान चाहिए। इससे कम में अब समझौता नहीं होगा।
थके बाप और बूढी माँ की आँखों में ये स्वप्न तैरता,
पढ़े -लिखे बेटे का एक दिन लाएगा रूजगार लिफाफा !
बिना शकर के हफ्ता बीता, फिर पहली तारीख़ तक,
लेकिन, बंद हुआ न मुजरा, फिर पहली तारीख तक !
सात दशक से तो केवल जनता ही लुटती आयी हैं,
उस जनता की बात करे क्या, जिसने जीभें सी ली हैं !
पल पल जीते मरते हमने इतनी साँसे जी ली हैं,
सारे वादे टूट गए, फिर भी आँखें सपनीली हैं।
और अंत में
सब कुछ हमारे देश में रोटी नहीं तो क्या ?
वादा लपेट लो लंगोटी नहीं तो क्या ?
26/03/2019