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आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तान की नीति , भले टूटेंगे पर झुकेंगे नहीं (लेखक/ईएमएस-अशोक भाटिया )

08/04/2021

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत से चीनी और कपास मंगाने के अपनी ही कैबिनेट के फैसले पर रोक लगाकर केवल यही नहीं साबित किया कि वह यू-टर्न लेने में माहिर हैं, बल्कि यह भी जता दिया कि भारत को अपने इस पड़ोसी देश पर भरोसा करने के पहले सौ बार सोचना चाहिए। इमरान ने अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारने वाला यह फैसला करके उन उम्मीदों को ध्वस्त करने का ही काम किया है, जो संघर्ष विराम पर नए सिरे से सहमति बनने और फिर भारतीय प्रधानमंत्री की ओर से पाकिस्तान दिवस पर भेजे गए शुभकामना संदेश के जवाब में सामने आई चिट्ठी से उपजी थीं। हालांकि इमरान खान ने इस चिट्ठी में जिस तरह जम्मू-कश्मीर का जिक्र किया, उससे यही संकेत मिला था कि पाकिस्तान अपनी आदत से बाज नहीं आएगा, फिर भी भारत से चीनी और कपास आयात करने के उसके फैसले से यह प्रतीति हुई थी कि मजबूरी में ही सही, उसे अक्ल आ गई है। खुद का भला करने वाले फैसले को पलटकर पाकिस्तान ने यही जाहिर किया कि उसे भारत से नफरत के चलते कुछ सही सूझता ही नहीं। यह फैसला करके पाकिस्तान ने एक ओर जहां अपने टेक्सटाइल उद्योग पर एक और चोट की, वहीं दूसरी ओर किसी अन्य देश से चीनी खरीदने में अतिरिक्त विदेशी मुद्रा खर्च होने की चिंता भी नहीं की। इसे ही कहते हैं विनाशकाले विपरीत बुद्धि।
दरअसल पाकिस्तान सरकार को कट्टरपंथियों के आगे झुक गई भारत से कपास व चीनी आयात के फैसले को पलटकर अपने राष्ट्रहित को ही नुकसान पहुंचाया है। पाकिस्तान के प्रधान मंत्री इमरान खान प्रगतिशील विचारों वाले नेता हैं और उन्होंने विश्व की तमाम व्यवस्थाओं को करीब से देखा-समझा है, इसलिए जब वे पाकिस्तान के प्रधान मंत्री बने तो लगा कि वे कट्टरपंथियों से किनारा करने में कामयाब होंगे। पाकिस्तान के हुक्मरानों ने कश्मीर को ऐसा संवेदनशील मुद्दा बनाकर अपने अवाम के सामने पेश किया कि अब वह उनके ही गले की हड्डी बना हुआ है। पाक फौज और खुफिया एजेंसी आईएसआई अपने वजूद को सही ठहराने के लिए हमेशा भारत से दुश्मनी का रुख अख्तियार किया, इसका नतीजा यह हुआ कि जो पाकिस्तान एक बेहतर राष्ट्र के सपने के साथ भारत से अलग हुआ, वह फौज, आईएसआई व इस्लामिक कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गयापाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत से चीनी और कपास मंगाने के अपनी ही कैबिनेट के फैसले पर रोक लगाकर केवल यही नहीं साबित किया कि वह यू-टर्न लेने में माहिर हैं, बल्कि यह भी जता दिया कि भारत को अपने इस पड़ोसी देश पर भरोसा करने के पहले सौ बार सोचना चाहिए। खुद का भला करने वाले फैसले को पलटकर पाकिस्तान ने यही जाहिर किया कि उसे भारत से नफरत के चलते कुछ सही सूझता ही नहीं। यह फैसला करके पाकिस्तान ने एक ओर जहां अपने टेक्सटाइल उद्योग पर एक और चोट की, वहीं दूसरी ओर किसी अन्य देश से चीनी खरीदने में अतिरिक्त विदेशी मुद्रा खर्च होने की चिंता भी नहीं की। इसे ही कहते हैं विनाशकाले विपरीत बुद्धि।
चीन व तुर्की के अलावा कोई पाक का दोस्त नहीं है, और चीन पाक का उपनिवेश की तरह दोहन कर रहा है, यह पाक को भी पता है। कोरोना के बाद तो पाकिस्तान आर्थिक हालत और खराब है, वह महंगे आयात को सहने की स्थिति में नहीं है। सूत के अभाव में कपड़ा उद्योग दम तोड़ रहा है। इसलिए पाकिस्तान की इकोनॉमिक कोऑर्डिनेशन कमेटी ने अपने यहां के उद्यमियों की मांग पर ही भारत से कपास व धागा मंगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, साथ ही निजी क्षेत्र की कंपनियों को भारत से चीनी आयात के लिए अनुमति दी थी। भारत की चीनी दूसरे देशों से 15 से 20 रुपये प्रति किलो सस्ती है। लेकिन कट्टरपंथी की आलोचना व विपक्ष के आरोपों के सामने अपने राष्ट्रीय हितों की बलि देकर एक दिन बाद ही भारत से आयात का फैसला वापस ले लिया। चूंकि पाक पर टेरर फंडिंग के मुद्दे पर ब्लैकलिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है। हाल में वह भारत से संबंध सुधारने की कवायद में जुटा हुआ है, भारत से भी सकारात्मक जेस्चर मिला है। आंशिक रूप से खेल गतिविधियां शुरू हो रही हैं। ट्रेड शुरू करने से पाक व भारत और करीब आते, लेकिन इमरान सरकार यह मौका गंवा रही है। इमरान सरकार को पाक को आतंकवाद व कट्टरपंथ मुक्त पाकिस्तान के निर्माण की दिशा में काम करना चाहिए, इससे पाक की आर्थिक सेहत भी सुधरेगी व वह विश्व में स्वीकार्य भी होगा। भारत से दुश्मनी निभाने से पाकिस्तान को कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है, उल्टे वह और जर्जर होता जाएगा।
अब तक अति राष्ट्रवादी रवैया अपना कर पाकिस्तान ने अपना काफी नुक्सान कराया यानि अपने ही पांवों पर खुद कुल्हाड़ी मार ली। द्विपक्षीय व्यापार खत्म होने की स्थिति में नुक्सान किसी एक पक्ष का नहीं होता बल्कि दोनों पक्षों का होता है, यह अलग बात है कि पाकिस्तान को ज्यादा संकट का सामना करना पड़ा है। जब भी दो देशों में व्यापार बढ़ता है तो लाभ का हिस्सा जनता, व्यापारी और सरकार सभी को जाता है। पाकिस्तान और भारत के बीच होने वाले व्यापार में व्यापार संतुलन पाकिस्तान की बजाय भारत के पक्ष में रहा है। भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2.5 अरब डालर के करीब होता रहा है, जिसमे भारतीय निर्यात की भागीदारी 75 प्रतिशत है, जबकि पाकिस्तान आयात की भागीदारी 25 प्रतिशत के करीब है। भारत पाकिस्तान को कपास, ऑर्गेनिक कैमिकल, प्लास्टिक, मशीनरी आदि निर्यात करता रहा है, जबकि पाकिस्तान भारत को सीमेंट, पहाड़ी नमक, ड्राईफूट आदि का निर्यात करता रहा है।
भारत को होने वाला निर्यात पुलवामा हमले के बाद से प्रभावित हो चुका था। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तान से टूट कर अलग देश बने बंगलादेश से भारत के काफी अच्छे संबंध हैं। आज भारत और बंगलादेश के बीच व्यापार दस अरब डालर से ज्यादा का हो चुका है। भारत और चीन के बीच लद्दाख सीमा पर हुई झड़प और इससे पैदा हुए गम्भीर तनाव के बावजूद वर्ष 2020 में चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना रहा। पाकिस्तान में कपास के दाम काफी बढ़े हुए हैं। पाकिस्तान में न्यूनतम 12 मिलियन गांठों की वार्षिक अनुमानित खपत के मुकाबले इस वर्ष केवल 7.7 मिलियन गांठें उत्पादन की उम्मीद है। कपास व्यापारियों ने 5.5 मिलियन गांठ के उत्पादन की उम्मीद जताई है। कपास और यार्न की कमी के चलते पाकिस्तान के व्यापारी अमेरिका, ब्राजील और उज्बेकिस्तान से आयात करने को मजबूर हैं। कपास से जुड़े छोटे-मोटे उद्योग बंद हो चुके हैं। भारत से कपास का आयात पाकिस्तान के लिए सस्ता होता है। लगभग ऐसी ही स्थिति चीनी की है।

पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को संतुष्ट करने के लिए कश्मीर का उल्लेख करना इमरान की घरेलू राजनीति है। पाकिस्तान कश्मीर के बहाने तनाव उत्पन्न कर अमेरिका से अफगानिस्तान में विशेष स्थिति हासिल करने के खेल में लगा हुआ है। पाकिस्तान को यह भी पता है कि कश्मीर में एलओसी की जो यथास्थिति फिलहाल है, उसे बदल सकने की ताकत उसमें नहीं है। बेहतर यही होगा कि इमरान आतंकवाद को खत्म करने के लिए भारत के साथ कंधे से कंधा मिलकर चलने का भरोसा देते। पाकिस्तान में द्विपक्षीय कारोबार को लेकर भी भारत के भीतर भी मंथन चल रहा होगा। भारत पहले ही पाकिस्तान के साथ सामान्य कारोबारी रिश्तों की बात करता रहा है। पाकिस्तान को कोरोना महामारी से बचने के लिए भी दवाओं की जरूरत है, देखना है कि व्यापारिक संबंध सुधारने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जाते हैं। दुनिया के तमाम देश इस समय व्यापार के लिए लड़ रहे हैं, किसी भी मुल्क की अर्थव्यवस्था की मजबूती उसके उत्पादन क्षमता और निर्यात से देखी जाती है। इमरान ने इस फैसले को वापस लेकर अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार ली है, क्योंकि अगर पाकिस्तान के कपड़ा उद्योग को भारतीय कपास का सहारा मिल जाता तो वह एक बार फिर दुनिया में अपनी चमक बिखेर पाता। भगवान पाकिस्तान के हुक्मरानों को सद्बुद्धि दें।
अशोक भाटिया/ईएमएस/08अप्रैल2021