लेख

बिंदिया (लेखक/ईएमएस -प्रो.शरद नारायण खरे)

04/05/2021

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नारी का श्रंगार है बिंदिया,
गरिमा का तो सार है बिंदिया।

नारी की शोभा बिंदिया से,
आकर्षण,उजियार है बिंदिया।

मेले,उत्सव और पर्व पर,
दमके,वह संसार है बिंदिया।

नारी को सम्मान दिलाती,
जय-जय-जयकार है बिंदिया।

पति को जो हरदम भाती है,
मोहक-सा व्यवहार है बिंदिया।

दुल्हन पी के देश है जाती,
लज्जा है,अभिसार है बिंदिया।

खो जाये तो ढूंढो कहती,
साजन जी का प्यार है बिंदिया।

आँच आन पर आ जाए तो,
तेज एक तलवार है बिंदिया।

राज़ छिपाये हरदम अनगिन,
नारी को उपहार है बिंदिया।

गिरी अगर जो बीच बजरिया,
प्यार और तक़रार है बिंदिया।

जन्म-जन्म का बंधन जिसमें,
वह नेहिल अधिकार है बिंदिया।

"शरद" मोल न देखा जाता,
पूरा इक संसार है बिंदिया।
ईएमएस/04मई2021