लेख

रावण का खिलखिलाना (लेखक-शरद नारायण खरे/ईएमएस)

08/10/2019

हर बार की तरह
लोग फर्ज़ निभा
रहे थे
बड़ी मेहनत से बनाये
दशानन रावण
के पुतले को
जला रहे थे
लोग खुश थे कि
हर साल
पाप जल रहा है
और पुण्य फल
रहा है
अधर्म की पराजय
और धर्म की जय है
दुराचरण/अहंकार
का हो रहा
सतत् क्षय है
पर,जैसे ही राम के व्दारा
छोड़ा गया
जलता तीर
रावण के पुतले में घुसा
वैसे ही वातावरण में
गूंज गया एक ज़ोरदार
अट्टहास/ जो
उड़ाने लगा उपस्थितों
का उपहास
स्वर गूंजा कि नादानो
तुम सैकड़ों सालों से
मूरखता करके
मन ही मन
व्यर्थ ही
खिलखिला रहे हो
अरे रावण का तो तुम
कुछ भी नहीं बिगाड़
पाये हो
वह तो तुम्हारे
भीतर सदा ज़िन्दा है
तुम तो केवल
पुतला जला रहे हो ।।
ईएमएस/08/10/2019