लेख

हास्य व्यंग्य- अ-तिथि (लेखक/ईएमएस -विवेक रंजन श्रीवास्तव)

02/05/2021

विगत दिवस हमें एक स्कूल के पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया . स्वयं प्राचार्य महोदय अपने दो सहकर्मियों के साथ हमें निमंत्रित करने घर आये . वे मेरे लिये सचमुच अ-तिथि थे , क्योंकि वे अनायास आये थे . "अतिथि देवो भव" के शुभ भाव से मैंने उनके मना करने पर भी उन्हें चाय बिस्किट से समादृत किया . किसी समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में निमंत्रित होने का यह हमारा पहला अवसर था . हमें अपने इस आमंत्रण पर आंतरिक प्रसन्नता हो रही थी . इस निमंत्रण में हमें हमारी लेखकीय छबि को सार्वजनिक मान्यता मिलती दिख रही थी . अतिथियों के बिदा होते ही हम गर्व से मंद मंद मुस्काते भीतर पहुंचे . पत्नी को अपने मुख्य आतिथ्य की बात बताई .आम हिन्दी लेखको की पढ़ी लिखी पत्नियां , ज्यादातर पति के लेखन को बकवास से अधिक नहीं समझतीं . मेरी पत्नी भी अभिन्न ही है . संपादक जी भले ही लेखक को स्वीकार कर लें . पाठकों को भी रचनायें पसंद आ जायें पर मजाल है कि पत्नी जी रचना की प्रशंसा करें . सदा हमारे शाल श्रीफल के सम्मानो को जुगाड़ बता कर हमारा मजा लेने वाली श्रीमती जी पर भी मुख्य अतिथ्य के इस निमंत्रण का अच्छा प्रभाव पड़ा . पत्नी ने हमें समारोह में क्या पहनना है , कैसे फोटो खिंचवाना है , ज्यादा हंसना नही है , बहुत सरल होना भी अच्छा नही होता, गंभीर व्यक्तित्व का श्रोताओ पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है , जैसे शाश्वत टिप्स टिका दिये . चयन कर हमारी पोशाक निर्धारित कर दी . हम मन ही मन भाषण की तैयारी करने लगे . सोचने लगे क्या बोला जाये जो आयोजन की हैड लाईन बने . यू ट्यूब पर मुख्य अतिथि के कुछ भाषण देख डाले . प्रसन्नता से रात की नींद ही गायब हो गई . बेवजह चार छै फोन करके मित्रों , रिश्तेदारों को बात से बात निकालकर अपने मुख्य अतिथि बनने की सूचना दे डाली . आयोजन की तारीख भी आ पहुंची . सुबह शेव करते हुये मिरर के सामने तरह तरह के पोज बनाकर अपने आप को निरखा परखा . सम्बोधन की प्रैक्टिस भी की .
आयोजन से घंटे भर पहले ही हम क्रीज किये हुये साफ सुथरे वस्त्र धारण कर जाने को तैयार हो गये . अपने सुदीर्घ अनुभव से हमने सीखा था कि मुख्य "अतिथि", आयोजनो में निश्चित तिथि पर तो आते हैं . किन्तु समय से किंचित विलंब से ही प्रगट होते हैं . हम समय काटने के लिये सुबह का पढ़ा हुआ अखबार फिर से बांचने लगे . सजे धजे हम सेल्फी ले ही रहे थे , तभी मोबाईल बजा , हमें लगा आयोजको का रिमाईंडर काल होगा . पर यह तो किसी सेल्स प्रमोटर सुकन्या की आवाज थी . वैसे बाकी दिनो में तो हम इस तरह की फोन काल्स पर भी पांच दस मिनट बिना वजह गपिया ही लेते थे , पर आज हमें इससे खीज हुई . हमने फोन जेब में डाला और पहली बार स्वयं के विलंब पर खुशी का अहसास करते , कार निकाली . हम स्कूल जा पहुंचे . आशा के विपरीत वहां आयोजन की कोई तैयारी न देख हम अचंभे में थे . एकदम से दिमाग की बत्ती जली , समझ आया कि आयोजन सत्ताइस तारीख को है , और आज तो छब्बीस है . अपने इस भ्रमजाल को तोड़ स्वयं से झेंपते हुये हम लौटने को थे पर तभी प्राचार्य जी ने हमें देख लिया . हमने भी संभलते हुये कहा कि इधर से गुजर रहा था तो सोचा आपसे मिलता चलूं . वे हमें सादर अपने कक्ष में ले गये , और स्कूल के विषय में , छात्रों के विषय में , वर्तमान शिक्षा व्यवस्था के विषय में हमारी ढ़ेर सी बातें चाय की चुस्कियों के साथ हुई . आज हम सचमुच उनके अ-तिथि ही थे।
ईएमएस/02मई2021