लेख

(विचार-मंथन) दिल्ली में बढ़ते अपराधों को लेकर कौन कितना गंभीर (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

11/07/2019

जब-जब दिल्ली में अपराध बढ़ने और अपराधियों के बेखौफ होने की खबरें सामने आती हैं तब-तब दिल्ली की केजरीवाल सरकार की वह मांग भी याद हो आती है, जिसके तहत कहा गया था कि दिल्ली पुलिस को राज्य के प्रति जवाबदेह कर दें, इसके बाद अपराध रोकने की पूरी जिम्मेदारी दिल्ली सरकार की हो जाएगी। इससे न सिर्फ अपराध का आंकड़ा घट जाएगा बल्कि राज्य सरकार नवप्रयोग करते हुए दिल्ली पुलिस को भी बेहतर बनाने की दिशा में अच्छे कार्य कर सकेगी। बहरहाल दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश होने के नाते अनेक अधिकारों से वंचित है, इसलिए आम आदमी पार्टी ने दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की भी मांग कर रखी है। वहीं दूसरी तरफ केंद्र की मोदी सरकार यह कतई नहीं चाहेगी कि उसके रहते हुए पुलिस महकमें को किसी और सरकार के आदेशों का पालन करना पड़े। इसलिए यदि दिल्ली में अपराध का ग्राफ बढ़ता दिख रहा है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार के गृह विभाग की ही है। इस बात का एहसास खुद भारतीय जनता पार्टी के सांसद को भी है, जो समय-समय पर ईमानदारी के साथ इस मसले को उठाते चले आए हैं। इस स्थिति के चलते ही कहा जाता है कि मोदी सरकार विपक्ष या विरोधियों से नहीं बल्कि अब तो अपने ही सांसदों से घिरती चली जा रही है। यह सब इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पूर्व क्रिकेटर एवं लोकसभा में भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने दिल्ली में बढ़ते अपराध को लेकर केंद्र की अपनी ही सरकार से सवाल किया है। सांसद गंभीर के इस अहम सवाल पर गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने जो कहा उससे यही संदेश गया कि अपराध बढ़े नहीं हैं बल्कि लोग पुलिस में मामले ज्यादा दर्ज कराने लग गए हैं। दरअसल संसद में जवाब दे रहे रेड्डी ने कहा कि 'आपराधिक मामलों के ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा और प्रक्रिया काफी आसान बनाए जाने से केस भले ही ज्यादा दर्ज हो रहे हैं, मगर पिछले वर्षों की तुलना में अपराध के आंकड़ों में कमी आई है।' गौरतलब है कि अपराध बढ़ने या घटने की जो बात होती है वह पंजीकृत मामलों के आधार पर ही की जाती है, फिर ऐसे कौन से आंकड़ों की बात इस समय सरकार कर रही है, जिसके आधार पर बतलाया जा रहा है कि पिछले सालों की तुलना में दिल्ली में अपराध घट गए हैं, जबकि खुद पार्टी के सांसद बढ़ते अपराधों पर चिंता जाहिर करते हुए सदन में इन्हें रोके जाने की गुहार लगाते नजर आ गए हैं। यहां रेड्डी ने जो आंकड़े पस्तुत किए उसके मुताबिक 2014 में दिल्ली में जहां कुल 10266 अपराध दर्ज हुए थे, वहीं 2016 में 8238 मामले सामने आए, जबकि 2017 में जघन्य अपराध के मामलों की संख्या 6527 रही, वहीं 2018 में 5688 मामले सामने आए। इन आंकड़ो के साथ गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने बतलाया कि 2014 की तुलना में अपराध की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज हुई है। इससे तो यही सिद्ध होता है कि पहले ज्यादा मामले दर्ज होते थे, जबकि अब बहुत कम मामले दर्ज किए गए हैं। कुल मिलाकर केंद्र दिल्ली की बिगड़ती कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की बजाय आंकड़ों की बाजीगरी में उलझी हुई है। इसलिए दिल्ली का हाल फिलवक्त सुधरना मुश्किल ही है। इसलिए सांसद गंभीर की चिंता बाजिब है। यही नहीं गंभीर के सवाल पर रेड्डी जब आश्वस्त करते हुए कहते हैं कि सरकार इसे रोकने के लिए गंभीर है, तो ऐसा कहकर वो अपनी ही बात को काटते नजर आ जाते हैं। बात साफ है कि या तो अपराध रोकने में शासन-प्रशासन सफल हो रहा है या इस दिशा में अभी और बेहतर काम करने की आवश्यकता है। बीच की स्थिति तो ठीक वैसी ही कही जा सकती है जैसे कि मैन स्टेंड में लगाकर किसी दो पहिया वाहन पर सवार होकर कहा जाए कि तय समय में हम मंजिल पर पहुंच रहे हैं। इससे ईंधन और शक्ति जाया होगी, मंजिल नहीं मिलेगी। बावजूद इसके यह एक अच्छी बात है कि लोग ऑनलाइन मामले दर्ज कराने के लिए आगे आ रहे हैं, वर्ना अनेक इलाकों में तो अपराधियों का इस कदर खौफ तारी हो जाता है कि लोग सब सहते हुए भी शिकायत करने को आगे नहीं आते हैं। जान-माल के नुकसान का भय उन्हें ऐसा करने से रोकता है। इससे कानून के रखवाले भी अपने आपको असहाय महसूस करते देखे जाते हैं। तब स्थिति और भी खराब हो जाती है जबकि किसी अपराधी को छुड़वाने या केस को कमजोर करने के लिए कथित नेता पुलिस थाने तक पहुंच जाते हैं। ऐसे मामलों से भी पुलिस को अनेक दफा दो-चार होना पड़ता है, मजबूरी और दबाव के चलते जब पुलिस कार्रवाई से हाथ पीछे खींचती है तो अपराधियों का सीना गर्व से फूल जाता है। इसलिए दिल्ली में बढ़ रहे अपराध को रोकने के लिए गंदी राजनीति करने वालों को भी सबक सिखाने की आवश्यकता है। इसके लिए ठीक वैसी ही कार्रवाई होनी चाहिए जैसे कि किसी तयशुदा अपराधी के खिलाफ पुलिस द्वारा की जाती है। अपराध बढ़ने के इन पहलुओं से हटकर एक पक्ष जो ज्यादा गंभीर है वह यह कि किसी की छवि खराब करने और बेवजह बदनाम करने के लिए भी अपराध के मामले दर्ज करा दिए जाते हैं, जबकि सच्चाई कुछ और ही होती है। इसलिए पुलिस का काम उसे ईमानदारी से करने दिया जाए। उस पर बेवजह राजनीतिक दबाव न थोपा जाए तो संभव है कि अपराध के ग्राफ में वाकई कमी आ जाए। वैसे भी ज्यादातर लोगों का तो यही मानना है कि देश में माननियों की सुरक्षा में जितना पुलिस बल लगा हुआ है, उस पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, क्योंकि इसकी वजह से आमजन की सुरक्षा में कमी आ रही है।
11जुलाई/ईएमएस