लेख

(विचार-मंथन) पेरिस में महंगाई से उपजी हिंसा से सबक लेने की आवश्यकता (लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान/ईएमएस )

04/12/2018

दुनिया भर के सैलानियों के लिए पेरिस सदा से पहली पसंद रहा है। यहां की खूबसूरती और सेहतमंद मौसम सैलानियों को किस कदर आकर्षित करता है, इसका सुबूत इसी बात से मिल जाता है कि हर साल डेढ़ करोड़ से भी अधिक लोग प्रेम की नगरी पेरिस को निहारने के लिए पहुंचते हैं और सपना पूरा होने जैसा अनुभव करते हैं। बहरहाल यहां हम पेरिस की खूबसूरती या फिर उसके पर्यटन के महत्व को लेकर चर्चा नहीं कर रहे हैं बल्कि फ्रांस में आसमान छूती महंगाई की मार से परेशान पेरिस के लोगों द्वारा किया जाने वाला हिंसक प्रदर्शन हमारे वैचारिक धरातल का केंद्रबिंदु है। बताया जा रहा है कि लंबे समय से महंगाई की मार सहते लोगों ने अब आपा खो दिया है और वो सड़कों पर उतर हिंसा करने पर मजबूर हुए हैं। खबरें यदि सही हैं तो फ्रांस की राजधानी पेरिस में जो हिंसा हुई है वह 50 सालों में हुए सबसे भयानक हिंसक दंगों में सबसे बड़ी बताई जा रही है। कुल मिलकार महंगाई के विरोध में पेरिस में हिंसक प्रदर्शन हुए हैं, जिसके चलते करीब चार सौ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है और कानून व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने की बात भी कही गई है। पेरिस में हिंसा इस कदर हुई कि फ्रांस के राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों को आपात बैठक बुलाना पड़ गई। इसी के साथ प्रधानमंत्री एडवर्ड फिलिप को प्रदर्शनकारियों और उनके कर्ता-धर्ताओं समेत राजनीतिक पार्टियों के प्रमुख नेताओं से मुलाकात करने और बातचीत से समस्या का हल करने के लिए भी कहा गया। गौरतलब है कि फ्रांस में खासतौर पर पेरिस में पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों और हाइड्रोकार्बन टैक्स बढ़ाए जाने का लोग बड़े स्तर पर विरोध कर रहे हैं। इसे राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है और कहा जा रहा है कि विरोधी पार्टियां और उनके नेता इस मामले को तूल दे रहे हैं, जिस कारण आमजन भी बेकाबू होता जा रहा है और सड़कों पर उतर सरकारी व निजी संपत्ती को नुक्सान पहुंचा रहा है। इस कारण पुलिस और प्रदर्शनकारी भी आमने-सामने आते हुए दिखे हैं, जिससे राष्ट्रपति को आपात बैठक बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। दरअसल यह बात सही है कि जहां हजारों या लाखों की भीड़ किसी मकसद से प्रदर्शन करती हुई दिखाई देती है वहां हिंसक प्रवृत्ती के लोग इसका बेजा फायदा उठाने से भी नहीं चूकते हैं। भीड़ का फायदा उठा ऐसे हिंसावादी लोग तोड़-फोड़ और आगजनी कर जाते हैं, जिससे प्रदर्शन का असली मकसद धरा रह जाता है और प्रदर्शन में शामिल लोग राह से भटक जाते हैं और इसी बीच पुलिस प्रशासन कानून व्यवस्था बनाने के नाम पर सख्ती बरतती नजर आ जाती है। बहरहाल यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि जब हजारों लोगों की भीड़ जिंदगी से जुड़े मामलों को लेकर सड़कों पर उतरती है तो उसका मकसद हिंसा करना तो कतई नहीं होता है, बल्कि वो अपने दु:ख और तकलीफ को बयान करने के लिए सड़कों पर आते हैं, जिसे सरकार लगातार नजरअंदाज करती चली आ रही होती है। इसके बाद जो हिंसा भड़कती है, उसमें किसका हाथ होता है वह समझने और ऐसे लोगों को प्रदर्शन से दूर रखने की जिम्मेदारी दोनों ही पक्षों की होती है। बहरहाल पेरिस की महंगाई जैसा मामला भारत में भी पिछले कुछ सालों से लगातार चल रहा है। यहां भी लगातार पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं और इन्हीं के दम पर सरकारें गिराने और बनाने का खेल भी राजनीतिक पार्टियों और नेताओं द्वारा खूब खेला गया है, लेकिन इसके बाद भी महंगाई पर कोई लगाम लगाता हुआ नजर नहीं आया है। हद यह है कि महंगाई के विरोध में जिस पार्टी के लोगों ने कभी संसद को बैलगाड़ियों से घेर लिया था आज उनकी केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद पेट्रोलीयम पदार्थों के दाम आसमान छू रहे हैं। इसका विरोध भी होता है, लेकिन तब सरकार विरोधी तत्वों से जोड़कर मामले को शांत कर दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जो देखने को मिलता है उसके आधार पर कहा जा सकता है कि जैसे ही बढ़ते दामों का विरोध जनता करना शुरु करती है वैसे ही रुपयों में बढ़ाए गए दामों को पैसों में घटाने का खेल शुरु कर दिया जाता है। अब जबकि हमारे देश में जीएसटी और नोटबंदी जैसे फैसले मोदी सरकार ने पूरे जोशो-खरोश के साथ लिए उससे संदेश तो यही गया कि बहुत जल्द लोगों को महंगाई से राहत मिलने वाली नहीं है। देश में इस समय इन्हीं मुद्दों को लेकर जगह-जगह राजनीतिक मंचों से केंद्र सरकार को घेरने का काम किया जा रहा है। आमजन को बताया जा रहा है कि किस तरह से एक अच्छी योजना को आधी-अधूरी तैयारी के साथ जमीन पर ले आया गया, जिसका हर्जाना देश के आमजन को भुगतना पड़ रहा है। बहरहाल यहां किसी का विरोध करना या किसी के पक्ष में तथ्य पेश करना हमारा मकसद नहीं है, बल्कि जिस तरह से पेरिस में राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री और पूरी सरकार महंगाई और उसके खिलाफ होने वाले प्रदर्शनों को गंभीरता से लेती हुई दिखाई दी हैं, वैसी ही सजगता की आवश्यकता इस समय भारत में भी है। इससे पहले कि लोगों के लिए महंगाई की मार सहना असहनीय हो जाए और वो सड़कों पर उतरें सरकारों को चाहिए कि वो इस पर काबू करने की दिशा में अहम फैसले लें। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण अनेक कारोबारियों और दुकानदारों को खासा नुक्सान हुआ है और अनेक औद्योगिक इकाइयां या तो घसिट रही हैं या उन पर ताला लग चुका है। ऐसे में पीड़ित लोगों को सांत्वना और उन्हें फिर से चलने लायक बनाने की जिम्मेदारी निभाने की आवश्यकता है।
ईएमएस/ 04 दिसम्बर 2018