लेख

(विचार-मंथन) मातृभाषा खतरे में (लेखक-सिद्धार्थ शंकर/ईएमएस)

17/10/2020

दुनिया भर में अंग्रेजी भाषा के पसरते पांव और मिल रहे संरक्षण ने विश्व में बोली जाने वाली उन सैकड़ों लोक भाषाओं के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है जो सदियों से बोली जाती रही हैं। इस परिप्रेक्ष्य में चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि विलुप्त हो रही भाषाओं में भारत के 196 भाषाओं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। हाल ही में 'भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर' द्वारा किए गए 'भारतीय भाषाओं के लोकसंरक्षण' की रिपोर्ट से उजागर हुआ है कि विगत 50 वर्षों में भारत में बोली जाने वाली 850 भाषाओं में करीब 250 भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं और 130 से अधिक भाषाओं का अस्तित्व खतरे में है। शोध में कहा गया है कि असम की 55, मेघालय की 31, मणिपुर की 28, नगालैंड की 17, और त्रिपुरा की 10 भाषाएं मरने के कगार पर हैं। इन्हें बोलने वालों की संख्या लगातार तेजी से घट रही है। उदाहरण के तौर पर सिक्किम में माझी बोलने वालों की संख्या सिर्फ चार रह गई है। यह लोकभाषाओं के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है। चूंकि भारत भाषायी विविधता से समृद्ध देश है ऐसे में भाषाओं का संरक्षण जरूरी है। भाषाओं के प्रति उदासीनता का ही नतीजा है कि छोटे से राज्य अरुणाचल में ही 90 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं और इनमें से कई भाषाओं को अस्तित्व खतरे में है। इसी तरह ओडिशा में 47, असम की 55, मणिपुर की 28, नागालैंड की 17, त्रिपुरा की 10 और महाराष्ट्र एवं गुजरात में 50 से अधिक भाषाओं में से कई विलुप्ति की कगार पर हैं। भारत ही नहीं वैश्विक स्तर पर भी लोकभाषाएं तेजी से विलुप्त हो रही हैं। पिछले दिनों मैक्सिकों की पुरानतम भाषाओं में से एक अयापनेको के विलुप्त होने की खबर अच्छी खासी चर्चा में रही। सुन-जानकर आश्चर्य लगा कि 'अयापनेको' भाषा को जानने और बोलने वाले लोगों की संख्या विलुप्त में अब महज दो रह गई है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन शेष दो लोगों ने भी ठान लिया है कि वह आपस में इस भाषा के जरिए वार्तालाप नहीं करेंगे। मतलब साफ है कि 'अयापनेको' भाषा का अस्तित्व मिटने जा रहा है।
विश्व की हर भाषा की अपनी ऐतिहासिकता और गरिमा होती है। प्रत्येक समाज अपनी भाषा पर गर्व करता है। 'अयापनेको' भाषा की भी अपना एक विलक्षण इतिहास रहा है। इस भाषा को मैक्सिको पर स्पेनिश विजय का गवाह माना जाता है। लेकिन विडंबना है कि जिस 'अयापनेको' भाषा को युद्ध, क्रांतियां, सूखा और बाढ़ लील नहीं पाया वह अपने अस्तित्व के दौर से गुजर रही है। इन सबके बीच सुखद बात सिर्फ यह है कि इंडियाना विश्वविद्यालय के भाषायी नृविज्ञानी 'अयापनेको' भाषा का शब्दकोष बनाकर उसे विलुप्त होने से बचाने की जुगत कर रहे हैं। पर देखा जाए तो भाषाओं के विलुप्त होने की समस्या सिर्फ 'अयापनेको' तक ही सीमित नहीं है। विश्व के तमाम देशों में बोली जाने वाली अन्य स्थानीय भाषाएं भी दम तोड़ रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक दुनियाभर में तकरीबन 6900 भाषाएं बोली जाती हैं। इनमें से 2500 से अधिक भाषाओं के अस्तित्व पर आज संकट है। और इन्हें 'भाषाओं की चिंताजनक स्थिति वाली भाषाओं की सूची' में रखने के लिए मजबूर होना पड़ा है। त्रासदी यह है कि विलुप्त हो रही भाषाओं को बचाने के प्रयास के बावजूद भी इन्हें बोलने और लिखने-पढऩे वाले लोगों की संख्या लगातार कम हो रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा कराए गए एक तुलनात्मक अध्ययन से खुलासा हुआ है कि 2001 में विलुप्त प्राय: भाषाओं की संख्या जो 900 के आसपास थी वह बढ़कर तीन गुने से पार जा पहुंची है।
आंकड़ों पर विश्वास किया जाए तो दुनियाभर में 199 भाषाएं ऐसी हैं जिनके बोलने-लिखने वाले लोगों की संख्या एक दर्जन से भी कम है। उक्रेन में बोली जाने वाली कैरेम भी इन्हीं भाषाओं में से एक है जिसे बोलने वालों की संख्या महज छह है। इसी तरह ओकलाहामा में विचिता भाषा बोलने वालों की संख्या दस व इंडोनेशिया में लेंगिलू बोलने वालों की संख्या सिर्फ चार रह गई है। इसी तरह विश्व में 178 भाषाएं ऐसी भी हैं जिन्हें बोलने वाले लोगों की संख्या डेढ़ सैकड़ा तक है। किंतु दुर्भाग्य है कि इस भाषायी विविधता को बचाने का कोई ठोस पहल नहीं हो रहा है। भारत के अलावा अमेरिका और इंडोनेशिया का भी यही हाल है। इन आंकड़ों से साफ है कि विलुप्त हो रही भाषाओं को बचाने की दिशा में जितना सार्थक प्रयास किया जा रहा है वह पर्याप्त नहीं है। अगर सार्थक कदम नहीं उठाया गया तो इन भाषाओं को मिटते देर नहीं लगेगी। मौंजू सवाल यह है कि भाषाएं विलुप्त क्यों हो रही है? उन्हें बचाने का प्रयास नाकाफी क्यों सिद्ध हो रहा है?
17अक्टूबर/ईएमएस