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(विचार मंथन) आरसीईपी: भारत का इंकार सही कदम (लेखक-सिद्वार्थ शंकर/ईएमएस)

06/11/2019

भारत का क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) समझौते से बाहर होने के फैसला एकदम सही और सटीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस फैसले से देश के किसानों, सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) और डेयरी क्षेत्र को बड़ी मदद मिलेगी। आरसीईपी में भारत का रुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व और दुनिया में भारत के बढ़ते कद को दर्शाता है। मंच पर भारत का रुख काफी व्यावहारिक रहा है। भारत ने जहां गरीबों के हितों के संरक्षण की बात की, वहीं देश के सेवा क्षेत्र को लाभ की स्थिति देने का भी प्रयास किया। यह भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति के साथ-साथ समझौते के निष्पक्ष और संतुलन के आकलन को दर्शाता है। वार्ता में भारत के मूल हितों से जुड़े कई मुद्दे अनसुलझे रहे, जिसके बाद हमने इससे बाहर होने का फैसला किया। इस मंच पर भारत ने विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को खोलने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। साथ ही मजबूती से यह भी बात रखी कि समझौते का कोई भी नतीजा आए, वह सभी देशों और क्षेत्रों के अनुकूल हो। यह पहला मौका नहीं है जब अंतरराष्ट्रीय व्यापार और इससे जुड़ी बातचीत को लेकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने मजबूत इरादों को दर्शाया है। पूरे परिदृश्य को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस बार भारत ने फ्रंटफुट पर खेला और व्यापार घाटे पर अपनी चिंताओं को दूर करने की आवश्यकताओं पर जोर दिया। इसके साथ ही भारतीय सेवाओं और निवेशों के लिए वैश्विक बाजार खोलने की जरूरत पर भी जोर दिया। इससे जहां किसानों, गरीबों के हितों की रक्षा होगी, वहीं सेवा क्षेत्र को भी लाभ पहुंचेगा।
प्रधानमंत्री का फैसला ऐसे समय पर आया जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने आरसीईपी को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि मेक इन इंडिया अब बॉय फ्रॉम चाइना यानी चीन से खरीदो बन गया है। उन्होंने आरोप लगाया था कि मुक्त व्यापार समझौते से देश में सस्ता सामान भर जाएगा और इस वजह से लाखों लोग रोजगार गंवा देंगे। अर्थव्यवस्था में मुश्किलें बढ़ जाएंगी। कांग्रेेस नेता ने कहा था कि हम हर साल चीन से प्रति व्यक्ति छह हजार रुपए की वस्तुओं का आयात करते हैं। 2014 के बाद से इसमें 100 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। आरसीईपी के बाद सस्ते सामान की बाढ़ आ जाएगी जिससे लाखों नौकरियां चली जाएंगी। हालांकि, अब राहुल को जवाब मिल गया होगा। वैसे, राहुल के इस बयान पर भाजपा ने पलटवार करते हुए कहा था कि आरसीईपी वार्ता में भारत यूपीए सरकार के समय 2012 में शामिल हुआ। वर्ष 2005 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 1.9 अरब डॉलर था जो 2014 में 23 गुना बढ़कर 44.8 अरब डॉलर हो गया। अब प्रधानमंत्री नेरेंद्र मोदी आपकी गलतियां सुधार रहे हैं।
आरसीईपी में शामिल न होने के फैसले से मोदी ने न सिर्फ वैश्विक बल्कि घरेलू मोर्चे पर भी जीत हासिल कर ली है। अगर भारत इस मंच का हिस्सा बनता तो विपक्ष सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल सकता था। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव के बाद भाजपा वैसे भी बैकफुट पर है। अगले कुछ दिनों में झारखंड और फिर दिल्ली के चुनाव होने हैं। अगर सरकार आरसीईपी में शामिल होने का फैसला कर लेती तो इसे विपक्ष देशभर में सरकार के खिलाफ प्रचारित करता।
बहरहाल, उन कारणों की भी समीक्षा करनी जरूरी है, जिनकी वजह से भारत ने अपने कदम पीछे खींचे। अगर भारत आरसीईपी समझौते में शामिल होता तो उसे भारत में आयात होने वाले 90 फीसदी सामानों पर 15 साल तक के लिए शुल्कों में कटौती करनी पड़ती। भारतीय बाजार चीन के सस्ते सामान के अलावा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के डेयरी उत्पादों से पट जाते। इससे देश के छोटे कारोबारियों और डेयरी किसानों पर सबसे ज्यादा असर पड़ता। आरसीईपी के 11 देशों से कारोबार में भारत का व्यापार घाटा 104 अरब डॉलर का है। यानी निर्यात की तुलना में भारत इन देशों से ज्यादा आयात करता है। भारत के लिए चीन उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि चीन के लिए भारत 11वां बड़ा साझेदार है। टैरिफ घटाने के लिए 2013 को आधार वर्ष माने जाने का दबाव था, लेकिन भारत 2019 को आधार वर्ष मानने पर जोर दे रहा था। इसकी वजह यह थी कि बीते छह साल में टैरिफ खासा बढ़ चुका है। इस सौदे में डाटा लोकलाइजेशन बड़ा मुद्दा था। भारत का कहना था कि सभी देशों को अपने डाटा की रक्षा करने का अधिकार है।
बता दें कि आरसीईपी समझौता 10 आसियान देशों और 6 अन्य देशों यानी ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया के बीच एक मुक्त व्यापार समझौता है। इस समझौते में शामिल 16 देश एक-दूसरे को व्यापार में टैक्स कटौती समेत तमाम आर्थिक छूट देंगे। अगर भारत आरसीईपी समझौता करता तो भारतीय बाजार में सस्ते चाइनीज सामान की बाढ़ आ जाती। चीन का अमेरिका के साथ ट्रेड वॉर चल रहा है जिससे उसे नुकसान उठाना पड़ रहा है। चीन अमेरिका से ट्रेड वॉर से हो रहे नुकसान की भरपाई भारत और अन्य देशों के बाजार में अपना सामान बेचकर करना चाहता है। आरसीईपी में शामिल होने के लिए भारत को आसियान देशों, जापान और दक्षिण कोरिया से आने वाली 90 फीसदी वस्तुओं पर से टैरिफ हटाना पड़ता। इसके अलावा, चीन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से आने वाले 74 फीसदी सामान को टैरिफ से मुक्त करना पड़ता। ये कदम भारत के लिए आत्मघाती साबित हो सकता था। आरसीईपी के 16 सदस्य देशों की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी का एक-तिहाई है और दुनिया की आधी आबादी इसमें शामिल है। इस समझौते में वस्तुओं व सेवाओं का आयात-निर्यात, निवेश और बौद्धिक संपदा जैसे विषय शामिल हैं। चीन के लिए ये एक बड़े अवसर की तरह है क्योंकि उत्पादन के मामले में बाकी देश उसके आगे कहीं नहीं टिकते। चीन इस समझौते के जरिए अपने आर्थिक दबदबे को कायम रखने की कोशिश में है। अगर भारत आरसीईपी पर हस्ताक्षर कर देता तो चीन समेत सभी दूसरे देश सस्ती कीमतों पर अपना सामान भारत में बेचना शुरू कर देते और सबसे पहले भारत की छोटी कंपनियां इसका शिकार बनतीं। इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम को उम्दा कहा जाना एकदम सही होगा।
ईएमएस/06 नवंबर 2019