लेख

समता भाव के आदर्श प्रतीक भगवान पार्श्वनाथ की गर्भकल्याणक (लेखक/ईएमएस-डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन)

03/05/2021

जैन तीर्थ-काशी (वाराणसी) जैनों का प्रसिद्ध तीर्थ है। तीर्थक्षेत्र के रूप में इसकी प्रसिद्धि सातवें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ के काल से ही हो गयी थी। जब यहाँ उनके गर्भ, जन्म, तप और केवलज्ञान कल्याणक मनाये गये, उस समय काशी के नरेश महाराज सुप्रतिष्ठ थे। पृथ्वी उनकी महारानी थी। ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ उनके गर्भ से उत्पन्न हुए। ‘तिलोयपण्णत्ति’ ग्रंथ में उनके जन्म के संबंध में लिखा है-
वाराणसीए पुडवी सुपइट्ठेहिं सुपास देवो य।
जेट्ठस्स सुक्कवार सिदिणम्मि जादो विसाहाए।।४।५३२
अर्थात् सुपार्श्वदेव वाराणसी नगरी में माता पृथ्वी और पिता सुप्रतिष्ठ से ज्येष्ठ शुक्ला १२ के दिन विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न हुए। इसके पश्चात् तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ के गर्भ, जन्म और दीक्षाकल्याणक इसी प्रकार धूमधाम और उल्लास के साथ मनाये गये। ‘तिलोयपण्णत्ति’ में उनके जन्म के संबंध में इस प्रकार विवरण मिलता है-
हयसेण वम्मिलाहिं जादो हि वाणारसीए पासजिणो।
पूसस्स बहुल एक्कारसिए रिक्खे विसाहाए।।४।५४८।।
अर्थात् भगवान पार्श्वनाथ वाराणसी नगरी में पिता अश्वसेन और माता वम्मिला (वामा) से पौष कृष्णा एकादशी के दिन विशाखा नक्षत्र में उत्पन्न हुए।
काशी देश में वाराणसी नामक एक नगरी थी। महाराज अश्वसेन वहाँ के राजा थे। वामा देवी उनकी महारानी थीं। वैशाख कृष्णा द्वितीया को शुभ नक्षत्र में पार्श्वनाथ का जीव वामादेवी के गर्भ में आया। इन्द्र की आज्ञा से धनपति कुबेर ने गर्भावतरण के छह माह पूर्व से रत्नवर्षा प्रारंभ कर दी। रत्नवर्षा का यह कार्य भगवान के जन्म होने तक चलता रहा। इन्द्र और देवों ने वाराणसी नगरी में पहुँचकर त्रिलोकीनाथ भगवान का गर्भकल्याणक उत्सव बड़ी भक्ति के साथ मनाया। भगवान के पुण्य प्रभाव से महाराज अश्वसेन के प्रासादों में, नगर में और काशी राज्य में सुख-समृद्धि में निरन्तर वृद्धि होने लगी। पौष कृष्णा एकादशी को भगवान का जन्म हुआ। इन्द्रों और देवों ने वाराणसी में आकर भगवान को अपने ऐरावत हाथी पर सुशोभित रत्नमय सिंहासन पर विराजमान किया। बालक भगवान को लेकर वे सुमेरु पर्वत के पाण्डुक वन में स्थित पाण्डुकशिला पर ले गये और वहाँ क्षीरसागर के जल से उनका अभिषेक किया। इन्द्राणी ने प्रभु का शृँगार किया, वस्त्रालंकार पहनाये। तब सौधर्मेन्द्र भगवान को लेकर अन्य इन्द्रों और देवों के साथ वाराणसी आये और महाराज अश्वसेन के नवमंजिले सर्वार्थसिद्धि महल में उन्होंने भक्तिमग्न होकर ताण्डव नृत्य किया। फिर सब लोग अपने-अपने स्थानों पर चले गये।
कुमार पार्श्वनाथ एक दिन क्रीड़ा के लिए नगर से बाहर गये। वहाँ उन्होंने एक वृद्ध तापसी को देखा जो पंचाग्नि तप कर रहा था। वह महीपाल नगर का राजा था और पार्श्वनाथ का नाना लगता था। अपनी रानी के वियोग से वह तापस बन गया था। उसके सात सौ तापस शिष्य थे। कुमार पार्श्वनाथ उस महीपाल तापस को नमस्कार किये बिना उसके पास जाकर खड़े हो गये। तापस ने उनके इस व्यवहार को बड़ा अपमानजनक माना। उसने बुझती हुई अग्नि में लकड़ी डालने के लिए एक बड़ा लक्कड़ उठाया और कुल्हाड़ी से काटने के लिए वह ज्यों ही तैयार हुआ कि अवधिज्ञानी भगवान पार्श्वनाथ ने उसे रोका-‘इसे मत फाड़ो। इसमें साँप हैं।’ मना करने पर भी वह तापस नहीं माना और उसने लकड़ी काट ही डाली। इससे लकड़ी में बैठे हुए साँप-साँपिनी दोनों के दो टुकड़े हो गये। प्रभु ने दयाद्र्र होकर उस सर्प-युगल को णमोकार मंत्र सुनाया। मंत्र सुनकर वह सर्प-युगल शांत भावों से मरा और अपनी शुभ भावनाओं के कारण मरकर धरणेन्द्र और पद्मावती बने। तापसी का घोर तिरस्कार और अपमान हुआ। वह वहाँ से अन्यत्र चला गया। उसका सारा क्रोध कुमार पार्श्वनाथ के ऊपर केन्द्रित हो गया। कषाय परिणामों में वह निर्मलता नहीं ला सका और मरकर संवर नाम का ज्योतिषी देव हुआ।
बनारस में ‘भदैनी जैन घाट’ नाम से एक स्थान है जो भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्मस्थान माना जाता है। यहाँ आजकल स्याद्वाद महाविद्यालय नामक प्रसिद्ध शिक्षा संस्था है। इस भवन के ऊपर भगवान सुपार्श्वनाथ का मंदिर है। यह गंगा तट पर अवस्थित है, दृश्य अत्यंत सुन्दर है। मंदिर छोटा ही है किन्तु शिखरबद्ध है।
भगवान पार्श्वनाथ का जन्मस्थल वर्तमान के भेलूपुर मोहल्ले को माना जाता है। उनके जन्मस्थान पर बहुत विशाल सुन्दर मंदिर बना हुआ है। उसी कम्पाउन्ड के भीतर धर्मशाला भी बनी हुई है। जिसमें सभी दिगम्बर जैन बंधुओं के ठहरने की समुचित व्यवस्था है। भेलूपुर में एक और दिगम्बर जैन मंदिर भी है उसमें मूलनायक पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा है।
हिन्दुओं की मान्यतानुसार अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, अवन्ति और द्वारका ये सात महापुरियाँ हैं इनमें काशी मुख्य मानी गई है। ‘‘काश्यां हि मरणान्मुक्तिः’’ यह हिन्दू शास्त्रों का वाक्य है। काशी में मरने से मुक्ति होती है इस विश्वास के कारण ही प्राचीन काल में यहाँ देहोत्सर्ग करने के लिए हिन्दू लोग आया करते थे। काशी का संबंध महाराजा हरिश्चन्द्र, कबीर और तुलसी से भी जुड़ा रहा है।
बनारस सहस्रों वर्षों से विद्या का केन्द्र रहा है। यहाँ भारतीय वाङ्मय-दर्शन और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की प्राचीन परम्परा आज तक सुरक्षित है।
शुभ प्राणत स्वर्ग विहाये ,वामा माता उर आये ,
वैशाख तनी दुति कारी ,हम पूजें विघ्न निवारी
ईएमएस/03मई2021