लेख

(विचार-मंथन) आतंकवाद और आर्थिक दबंगई से निपटने की दरकार (लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

11/06/2019

वर्तमान विश्व के लिए खतरा बन चुके आतंकवाद पर सख्ती से प्रहार करने की आवश्यकता है। कहने में हर्ज नहीं कि आतंकवार के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में अमेरिका और उसके सहयोगी देश असफल रहे हैं। यही कारण है कि वैश्विक आतंकवाद और उसे प्रश्रय देने वाले देश लगातार दुनिया के सामने चुनौती खड़ी करते देखे जा रहे हैं। दरअसल आतंकवाद के खिलाफ जो सामरिक कार्रवाहियां होती हैं वो भी दोहरी नीति के चलते अप्रभावी सिद्ध हो जाती हैं। इसका जीता जागता उदाहरण अफगानिस्तान, इराक, सीरिया और पाकिस्तान जैसे अनेक देश हैं। याद करें जब आतंकवाद को जड़ से खत्म करने के नाम पर अमेरिका ने अफगानिस्तान से तत्कालीन तालिबान की कथित बरबर हुकूमत को खत्म करने का काम किया था। उसके बाद क्या हुआ, हुकूमत तो दूसरों के हाथों में आ गई, लेकिन हमले आज भी जारी हैं। इसी तरह इराक में सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाने तक का काम भी दुनिया को आतंक का भय दिखाकर ही किया गया था, लेकिन इससे क्या क्योंकि न तो अफगानिस्तान में आतंकी हमले होने रुके और न ही इराक में ही शांति स्थापित हो सकी। सीरिया का मामला तो ताजा है, जिसे लेकर कहा जाने लगा है कि अमेरिका सिर्फ छोटे देशों में बल पूर्वक सरकारें बदलवाने और अपनी मर्जी चलवाने का काम कर रहा है, जिसका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है। यदि यह सही नहीं है तो फिर क्या कारण है कि पाकिस्तान जैसे देश में जहां दुनियाभर के आतंकवादी पनाह पाए हुए हैं और पड़ोसी मुल्कों का जीना दूभर किए हुए हैं, उस पर अभी तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई और न ही वहां मौजूद आतंकवादियों का वैसे ही एनकाउंटर किया गया जैसे कि ओसामा बिन लादेन का किया गया था। यह सरासर 'हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और' वाला हिसाब-किताब है। इस कारण आतंकवाद का भुगतान भारत ही नहीं बल्की अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे अनेक पड़ोसी देश भी भुगत रहे हैं। यहां यह भूमिका बांधनी इसलिए भी जरुरी हो गई थी क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी दूसरी पारी शुरु करने के साथ ही पहली विदेश यात्रा के दूसरे चरण में जब श्रीलंका पहुंचे तो उन्होंने ईस्टर बम ब्लास्ट के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी और पीड़ित परिवारों समेत सरकार को ढांढस बंधाया और आतंकवाद के सवाल पर परोक्ष रुप से पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की। प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि एक बार फिर श्रीलंका उठ खड़ा होगा। इसका गूढ़ अर्थ यही है कि हिंसक प्रवृत्तियों और आतंकवाद के खिलाफ जिस तरह की लड़ाई श्रीलंका ने पहले लड़ी एक बार फिर उसे उसी रास्ते से गुजरना होगा और तब शांति के तौर पर वह एक बार फिर विजयी हो सकेगा। इसके साथ ही विचारणीय सवाल यह भी है कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी दूसरी पारी की पहली विदेश यात्रा के लिए पड़ोसी देश मालदीव और श्रीलंका को ही क्यों चुना? दरअसल इससे मोदी सरकार की 'पड़ोसी प्रथम' वाली नीति फलीभूत होती है। यह हकीकत भी है कि यदि आपका पड़ोसी सुख और समृध्दि से परिपूर्ण होगा तो आप पर खतरे के बादल ज्यादा नहीं मंडराएंगे, बल्कि वह प्रगति और विकास की ही बातें करता नजर आएगा, जबकि भूखे और नंगे पड़ोसी आपके लिए सदा मुसीबतें खड़ी करते रहेंगे, इसलिए अच्छे पड़ोसी तो होने ही चाहिए और यदि पड़ोसी मुसीबत में हैं तो उन्हें मदद भी दी जानी चाहिए, ताकि उनके जीवन में भी सुख और शांति आ सके। इसके साथ ही भारतीय संस्कृति असीम सुख की प्राप्ति होने पर सबसे पहले उन लोगों से मिलने को कहती है, जिन्हें किन्हीं कारणों से दु:ख हुआ होता है। इस लिहाज से प्रधानमंत्री का श्रीलंका जाना भारतीय संस्कृति को पोषित करना ही है। दरअसल श्रीलंका में हाल ही में आतंकी हमले हुए जिसमें खासा जान-माल का नुक्सान हुआ और जिससे श्रीलंका ही नहीं बल्कि संपूर्ण शांतिप्रिय देश भी दु:खी हैं। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी का श्रीलंका जाना समझ में आता है। वैसे श्रीलंका पहुंचने पर प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने भंडरनायके अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर किया, जिससे भारत और भारतवासियों के प्रति उनकी आत्मीयता का भी पता चलता है। गौरतलब है कि इससे पहले विदेश यात्रा के प्रथम चरण में प्रधानमंत्री मोदी मालदीव पहुंचे थे, जहां उन्होंने मजलिस यानी संसद को संबोधित करते हुए परोक्ष रुप से पाकिस्तान पर निशाना साधा था और कहा था कि 'राष्ट्र प्रायोजित आतंकवाद मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। इससे निपटने के लिए वैश्विक नेताओं को एकजुट होना होगा।' इस तरह प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा रुपी एक तीर से कई निशाने साधने का काम किया है। आतंकवाद और आर्थिक दबंगई के मामलों को लेकर जहां प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान और चीन को घेरने की कोशिश की है तो वहीं भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए पड़ोसियों को एकजुट होने का संदेश भी दे दिया है। इससे स्वयंभू दरोगाओं को भी सचेत होने के संकेत मिलते हैं। वैसे भी मालदीव में पिछले दिनों जो घटित हुआ उसके बाद मजलिस में मोहम्मद नशीद को स्पीकर के रूप में भारतीय प्रधानमंत्री के साथ बैठे देखना किसी चमत्कार होने से कम नहीं कहा जा सकता है। यहां आपको याद दिला दें कि पिछले साल माह फरवरी में ही अब्दुल्ला यामीन सरकार ने मालदीव में आपातकाल घोषित किया था। इसके बाद मोहम्मद नशीद ने ही भारत सरकार को पत्र लिखकर इस मामले में हस्तक्षेप करने और मामले को सुलझाने की मांग कर दी थी। बहरहाल जो हुआ सो हुआ लेकिन इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को मालदीव का सर्वोच्च सम्मान 'रूल ऑफ़ निशान इज़्ज़ुद्दीन' से नवाजा गया तो दुनिया में भी संदेश गया कि भारत और मालदीव बहुत करीब है। इस सम्मान को विनम्रता से स्वीकार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा वह भी विशेष मायने रखता है। बकौल प्रधानमंत्री मोदी, 'यह सिर्फ मेरा सम्मान नहीं है बल्कि दो देशों की दोस्ती का सम्मान है।' अब चूंकि दोस्ती का फर्ज अदा हो चुका है अत: जरुरत इस बात की है कि तमाम देश मिलकर आतंकवाद के खिलाफ उठ खड़े हों और ऐसे तमाम नकली मुखौटों को दुनिया के सामने लेकर आएं जो आतंकवाद के नाम पर सिर्फ और सिर्फ अपना भला कर रहे हैं, जबकि दूसरों के लिए मुसीबतें खड़ी करते दिख रहे हैं।

11जून/ईएमएस