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(विचार-मंथन) राजनीतिक आईने में विरोधियों की धुंधली तस्वीर भी कहती है बहुत कुछ (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान /ईएमएस)

03/12/2018

देश में जैसे ही चुनाव का समय करीब आता है, तमाम राजनीतिक पार्टियां और नेता कुछ इस तरह से जनता के समक्ष आते हैं मानों वो अब संपूर्ण सच देश के सामने लाने वाले हैं। मौजूदा सरकार की नीतियों और फैसलों के साथ ही साथ कार्यों पर अंगुली उठाना तो विरोधियों का मानों धर्म ही होता है, जबकि सरकार में रहते हुए येन-केन-प्रकारेण विरोधियों का मुंह बंद करना सत्ता पक्ष का। इसलिए सरकार पर सरकारी मिशनरी के दुरुपयोग का आरोप भी खूब लगता है। इस बीच सरकार की योजनाओं और उनके क्रियांवयन की समीक्षाएं भी सामने आती हैं तो वहीं सत्ता पक्ष पूर्व सरकारों की कथनी और करनी के अंतर को भी बतलाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखता है। कुल मिलाकर अपना पक्ष रखते ये सभी कहीं न कहीं चुनाव को जीत लेने की कवायद में जुटे होते हैं। इसमें कोई हर्ज भी नहीं है, लेकिन सवाल यही है कि ऐसा करते हुए कुछ मर्यादाओं का भी तो पालन होना ही चाहिए। आखिर चुनाव तो कुछ समय में समाप्त हो जाएंगे और जनादेश के साथ किसे सत्ता संभालनी है और किसे विपक्ष में बैठना है यह भी तय हो ही जाएगा, लेकिन इस दौरान छवि खराब करने के लिए जो विवादित बयान दिए जाते हैं वो तो सदा याद रह जाएंगे। इसके साथ ही जो कानूनी और न्यायालयीन प्रक्रिया में उलझेंगे वो भी तो आखिर कहीं न कहीं लंबे समय तक परेशानी महसूस करेंगे ही करेंगे। अत: होना तो यही चाहिए कि चुनाव के दौरान जब जनता के बीच वोट मांगने जाएं तो क्षेत्र व देश के विकास का फार्मूला लेकर जाएं। उम्मीदवारों की खामियां गिनाने की बजाय अपनी बेहतर योजनाओं को प्रचारित-प्रसारित करें। यह जरुर बताएं कि सरकार में आने के बाद उनके प्रयासों और योजनाओं से देश या प्रदेश किस तरह से कर्ज मुक्त होगा और आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर होगा। आमजन को कर्जों से किस तरह राहत मिलने वाली है या किसानों के लिए खेती लाभ का धंधा कैसे बनने वाली है। इसके साथ ही देश और दुनिया के बदलते परिवेश में हम भारतीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किस तरह से स्थापित होंगे यह कार्ययोजना भी सामने लायी जानी चाहिए। अफसोस कि इन सब की बजाय धर्म, जाति, संप्रदाय और क्षेत्रीयता की बातें तो खूब की जाती हैं, एक दूसरे को सांपनाथ और नागनाथ बताते हुए महाचोर और डकैत की उपमा से भी खूब नवाजा जाता है। जब इससे भी दिल नहीं भरता तो संपूर्ण समाज में जहर घोलने का काम किया जाने लगता है। ऐसा करते हुए यह भी नहीं विचार किया जाता कि इससे समाज में नफरत पैदा होगी और हमारी अनेकता में एकता वाली मिसाल कमजोर होती चली जाएगी। चुनाव के दौरान हिंदू-मुस्लिम तो छोड़िए अब तो गोत्र तक की बात प्रमुखता से उठाई जाने लगी है। यह सब एक-दूसरे को नीचा दिखाने और वर्गगत मतदाताओं को दूसरों से काटकर अपने पक्ष में करने की कवायद के अलावा कुछ भी नहीं है, लेकिन ऐसा बहुतायत में हो रहा है। दरअसल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए इन सियासी दलों से जो बन पड़ा वो किया है। अब जबकि राजस्थान और तेलंगाना विधानसभा चुनाव मतदान 7 दिसंबर को होना है तो सभी एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं। राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की सक्रियता देखती ही बनती है। यहां वो मोदी सरकार द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक के राजनीति करण करने पर उन्हें घेरते हैं और कहते हैं कि पूर्व मनमोहन सरकार के समय भी तीन सर्जिकल स्ट्राइक की गईं थीं, लेकिन तब केंद्र सरकार ने राजनीतिक फायदे के लिए यूं प्रचारित या प्रसारित नहीं किया था, जैसा कि अब किया जा रहा है। यहां राहुल आरोप लगाते हैं कि प्रधानमंत्री ने सेना के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया है। दरअसल उनका कहना रहा है कि केंद्र ने सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक इस्तेमाल किया है, जबकि असल में यह एक सैन्य फ़ैसला था। मतलब साफ है कि यह सरकार करती कम है और प्रचारित ज्यादा करती है। इसके चलते वह यह भी भूल रही है कि उसकी भी कुछ हदें हैं, जिन्हें लांघा नहीं जाना चाहिए, लेकिन अनजाने में कहें या फिर अनावश्यक हस्तक्षेप का दुस्साहस कि वह लगातार ऐसे फैसले ले रही है और जनता में उन्हें प्रचारित भी कर रही है। गौर करें कि इससे पहले तक यूं सेना को राजनीतिक मामलों में कभी नहीं घसीटा गया है, जिस तरह से मोदी सरकार के समय में हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ भाजपा और उसके अनुवांशिक संगठन कांग्रेस को घेरने के लिए हिंदुत्व का मुद्दा आगे करके जाति, संप्रदाय और अब तो गोत्र जैसी बातों को भी प्रमुखता से उठाते हुए मंदिर निर्माण तक जा रहे हैं। कुल मिलाकर चुनाव से विकास और बेरोजगारी दूर करने जैसे मामले गायब हो चुके हैं, जो वाकई चिंता का विषय है। अगर ये मामले हैं भी तो महज घोषणा-पत्रों तक ही सीमित हैं, लेकिन इससे क्या क्योंकि राजनीतिक दल तो चुनाव जीतने के बाद इन्हें चुनावी जुमले भी तो बताने में देर नहीं लगाते हैं। ऐसे में मतदाता को ही समझदारी से काम लेना होगा और कोशिश करनी होगी कि ये आईना दिखाने वाले लोग और पार्टियां आपके सामने साफ-सुथरा आईना ही लेकर आएं। ऐसा न हो कि आज जिस गंदे आईने में विरोधियों की धुंधली तस्वीर आपको दिखाने की कोशिश की जा रही है, कल चुनाव जीतने के बाद उसी गंदे आईने में देश के असली मालिकों की तस्वीरें दिखाकर आपको ही चोर साबित करने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी जाए।
03दिसम्बर/ईएमएस