लेख

केंद्रीय चुनाव आयोग (कें चु आ )वास्तव में बिना रीढ़ और दांत का शेर ! (लेखक/ईएमएस-डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन)

02/05/2021

मद्रास हाई कोर्ट द्वारा केंद्रीय चुनाव आयोग यानी के चु आ को फटकार के साथ कहा की चुनाव के कारण होने वाली मौतों के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार हैं इस कारण उनके ऊपर हत्या का मुकदमा चलना चाहिए .जो आयोग दूसरों पर आश्रित हैं यानी परजीवी हैं उसके ऊपर कार्यवाही करने से की होगा .बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता .गंगोत्री पर कार्यवाही होना चाहिए .वास्तव में इस देश को इस स्थिति में लाने का श्रेय के लिए सत्ता के पिपासु मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं .न केवल वे पर उनके चालीस दोस्त .
कभी कभी शब्दों के मायने खुद अर्थ बता देते हैं .जैसे केंद्रीय चुनाव आयोग यानी कें चु आ यानि केंचुआ जो की बिना रीढ़ का कृमि होता हैं और वह गीली मिटटी में रेंगता हैं ,भाग नहीं सकता .इसका शरीर कई खण्डों में बंटा रहता हैं केंचुआ का तीन चौथाई भाग शरीर की दीवार से अंदर गड़ा रहता हैं और थोड़ा सा हिस्सा बाहर होता हैं.केंचुए पृथ्वी के अंदर १ फुट की गहराई तक रहते हैं .यह अधिकतर पृथ्वी पर पाई जाने वाली सड़ी पत्ती ,बीज ,छोटे कीड़ों के डिम्भ और अंडे इत्यादि कहते हैं .ये जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ाते हैं और उपज भी .
उपरोक्त विवरण से यह प्रतीत होता हैं की हमारा केंद्रीय चुनाव आयोग की दशा यही हैं .पहली बात वह बिना रीढ़ का और दंतहीन शेर जैसा हैं ,गुर्राता हैं पर काट नहीं सकता ,या दूसरे शब्दों में सर्कस का शेर हैं जो रिंग मास्टर के कोड़े पर या इशारे पर चलता हैं ,उसको अपनी शक्ति का अहसास नहीं हैं कारण वह पालतू बन जाता हैं या स्वाभी भक्त श्वान जैसे पहले एच एम् वी यानी हिज मास्टर्स वौइस् या अपने मालिक का स्वामिभक्त पालतू श्वान .के रिकॉर्ड होते थे वैसा ही हैं
वह इतना बफादार होता हैं की और परजीवी की अपने मालिक के टुकड़ों पर पलता हैं और मालिक के इशारे पर नाचता हैं ,अपने मन का उपयोग नहीं कर सकता हैं .यह स्थिति केंचुआ की ही नहीं जितनी भी सर्वोच्च संस्थाएं हैं वे सब रिंग मास्टर के इशारे पर नाच रही हैं इस समय रिंग मास्टर बहुत शक्तिशाली हैं जिसने अपने प्रभाव का उपयोग कर सबको अपना परजीवी बनाया हैं या बना लिया हैं .आज उसके विरोध में किसी की ताकत नहीं हैं जो उसका विरोधकर सके .इससे यह फायदा हुआ हैं की वह जितनी अच्छे कामकरता हैं उनका श्रेय खुद ले लेता हैं और यदि गलत हुआ तो उनकी गर्दन मरोड़ देता हैं कारण वे सब संस्थाएं उसकी पालतू कुत्ते जैसी हैं .
आज देश में बहुत विचित्र स्थिति निर्मित हो गयी हैं जो अस्थायी सेवक यानी नेता मंत्री, प्रधान मंत्री,मुख्यमंत्री उनसे स्थायी सेवक इतना डरते हैं जैसे वे स्थायी सेवक उनके गुलाम हों .अरे वे पांच वर्ष के लिए आते हैं और मौज मस्ती करके चले जाते हैं और ये अस्थायी नेता ऐसा जुल्म ढाते हैं जैसे वे पालक हो .इसी केंचुआ में शेषन जैसा शेर रहा जिसने अपनी शक्ति और उनके क्रियानवयन को करके बताया और दिखाया .आज कितनों को इतनी हिम्मत हैं रिंग मास्टर के सामने साहस दिखाने की ?.आज सब संस्था प्रमुख रिंग मास्टर के सामने केंचुआ बने हैं .इतनी कायरता या पराधीनता तो आपातकाल में नहीं लगी थी.
यहाँ चीन्ह चीन्ह कर रेवड़ी बाँट रहे हैं ,किसी की अपराध को बड़ा और किसी को नगण्य मानकर खाना पूर्ती कर रहे हैं .केंचुआ जरूर बिना रीढ़ का होता हैं पर उसके पास चलने फिरने की छूट रहती हैं पर केंद्रीय चुनाव आयोग वर्तमान में अपने मष्तिष्क का भी उपयोग नहीं कर सकता हैं वह परजीवी हो चूका हैं ,उसका कोई भी स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हैं वह अदृश्य शक्ति के द्वारा संचालित हैं और जितना काम कहते हैं उतना करता हैं .यानी विवेक हीन हो चूका हैं .
ये सब देश की अवनति की निशानी हैं और रिंगमास्टर अपने मुँह मिया मिठ्ठू बन गए .उनको परनिंदा करने में अतीव आनंद होता हैं और मिलता हैं .उसका कारण जैसे उनके संस्कार और कुछ नहीं .एक बात ध्यान रखना होगा सबके दिन एक समान नहीं होते ,और इस समय रिंग मास्टर का पुण्य का उदय हैं तो कोड़ा चल रहा हैं अन्यथा सुबह जिनका राज तिलक होने वाला था उन्हें वनवास जाना पड़ा इसीलिए जब सत्ता मिली हैं तो उसका दुरूपयोग नहीं करना चाहिए अन्यथा जाने के बाद विशेषण का उपयोग करते हैं .
यह बिलकुल सत्य हैं की राजनैतिक पार्टियों ने चुनावों में सत्ता पाने हजारो हजारों को मौत में मुंह में ठेला और लाखो लाखो को संक्रमित किया .अब यह सही में सिद्ध हुआ हैं की मुग़ल सल्तनते अपने ही खून के प्यासे लोगों की हत्याएं कराकर सत्ता पाते हैं जिसका उदाहरण चुनाव हैं .यह सत्ता का नशा उतारना होगा जनता को नहीं तो शासक निरकुंश होकर और अत्याचार करेगा .अपनी कीर्ति ध्वजा फहराने कुछ भी करने को तैयार हैं .धिक्कार हैं ऐसे राजपाट का जो जनता की लाशों पर बैठकर जीत का जश्न मनाएंगे .
वो क़त्ल भी करते हैं चरचा नहीं होती .
हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम .
जब तुम जगत में ,जगत हंसा तुम रोये ,
अब तुम ऐसी करनी करो की ताकि हंसी न होय
ये सत्ता का नशा, नशा नहीं होता
कभी सोचा हैं नशा का उल्टा नाश होता हैं
साक्षर यदि बिगड़ जाए तो राक्षस हो जाता हैं
नदी में जल न हो तो दीं हो जाती हैं
नाली में पानी न हो तो लीन हो जाती हैं .
क्षणिक सुख के लिए जिंदगी भर का बिगाड़ क्यों
शतरंज की सब गोटियां खेलने के बाद एक साथ हो जाती .सोचो
ईएमएस/02मई2021