लेख

(विचार-मंथन) बतौर प्रधानमंत्री अब शुरु हो गया इमरान का इम्तेहान (डॉ हिदायत अहमद खान/ईएमएस)

05/12/2018

जैसा कि प्रारंभ से उम्मीद थी उसके मुताबिक ही अब पाकिस्तान में बतौर प्रधानमंत्री इमरान खान की परीक्षा भी प्रारंभ हो चुकी है। अमेरिका जैसे स्वयंभू दरोगा से फटकार और आर्थिक पाबंदियों के बीच विदेशी मामलों से बुरी तरह घिरे पाकिस्तान को वैसे तो आर्थिक तंगी के साथ ही साथ आतंकबाद से पार पाना सबसे बड़ी चुनौती है, लेकिन कहते हैं कि जब बुरा वक्त आता है तो अपना साया ही साथ छोड़ जाता है। ठीक इसी तरह अब इमरान सरकार को इन सब चुनौतियों से हटकर अपनों के द्वारा उठाए जाने वाले सवालों का जवाब देना भी मुश्किल हो रहा है। एक तरफ आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की जीतोड़ कोशिशों के बीच ही इमरान सरकार के खिलाफ विरोधियों ने निशाना साधना शुरु कर दिया है। इसकी मुख्य वजह इमरान सरकार का भारत के प्रति नरम रुख के साथ ही साथ करतार कॉरीडोर मामले में आगे बढ़कर काम करना बताया जा रहा है। इसे लेकर पाकिस्तान में मौजूद कट्टरपंथियों की भृकुटियां तनी हुई हैं। ऐसा करते हुए वो भूल रहे हैं कि किस तरह से अमेरिका ने पाकिस्तान में मौजूद आतंकियों, उनके ठिकानों और प्रशिक्षण केंद्रों को लेकर गंभीरता दिखा रहा है। उसने तो अपने एक बयान में यहां तक कह दिया था कि पाकिस्तान ने अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को छावनी शहर ऐबटाबाद के पास छिपाने में मदद की थी। मतलब लादेन को पालने और पोसने का काम भी कहीं न कहीं पाकिस्तान ने ही किया था। गौरतलब है कि तब अमेरिका समेत अन्य देशों की सेनाओं ने पाकिस्तान को बिना बताए एक सैन्य अभियान के तहत ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में ही खत्म कर दुनिया को चौंकाने जैसा काम कर दिया था। इससे पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार अपनी ही आवाम को जवाब देने के लायक भी नहीं बची थी। मानों आतंकवाद के खिलाफ छद्म युद्ध से पाकिस्तान बेनकाब हो गया। बहरहाल मौजूदा स्थिति में अमेरिका ने आतंकवाद को लेकर जिस तरह से पाकिस्तान के खिलाफ लगाम कसने का काम किया है उसे देखते हुए कहा जा रहा है कि आज नहीं तो कल अन्य पड़ोसी देशों से भी उसे चुनौती मिलने वाली है। ऐसे में पाकिस्तान विदेश मंत्रालय का यह दावा कि अमेरिका ने अफगानिस्तान मामले में तालिबान को बातचीत की मेज तक लाने में पाकिस्तान का सहयोग मांगा है, गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं लगती है। दरअसल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रुस ने इस संबंध में कोशिशें शुरु कर रखी हैं और लगातार बातचीत के लिए तमाम देशों और संगठनों को आमंत्रित भी किया जा चुका है। इस स्थिति में जिस देश पर आतंकवाद को प्रश्रय देने और उन्हें प्रशिक्षित करने के गंभीर आरोप लगते रहे हों उसे ऐसे कैसे कहा जा सकता है कि वो तालिबान से बातचीत के लिए प्रयास करे। खासतौर पर तब जबकि पाकिस्तान की इमरान सरकार अपने ही देश के कट्टरपंथियों के निशाने पर आ चुकी हो। बावजूद इसके कहा यही जा रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को खत लिखकर संकटग्रस्त अफगानिस्तान में 17 साल से चल रहे भयानक युद्ध को खत्म करने के लिए तालिबान को बातचीत की मेज तक लाने में पाकिस्तान से मदद मांगी है। पाकिस्तान के इस दावे पर यकीन कर भी लिया जाता लेकिन मुश्किल यह है कि इसके कुछ दिन पहले ही तो ट्रंप ने ओसामा बिन लादेन और पाकिस्तान से जुड़े तारों का जिक्र करके उसे सरेराह नंगा करने जैसा काम भी तो किया था। यह अलग बात है कि लादेन मामले में प्रधानमंत्री इमरान का कोई रोल नहीं रहा। यही नहीं चूंकि इमरान बखूबी जानते हैं कि उन्हें चुनौती खड़े करने वाले देशों को जवाब कैसे देना है अत: वो अमेरिका के हमले पर करारा पलटवार करते हुए कह जाते हैं कि अपनी विफलताओं के लिए पाकिस्तान को बलि का बकरा बनाने की बजाय अमेरिका को इस तथ्य पर गंभीरतापूर्वक मूल्यांकन करना चाहिए कि अफगानिस्तान में एक लाख, चालीस हजार नाटो सैनिकों और ढाई लाख अफगान सैनिकों को लगाने और एक हजार अरब डॉलर खर्च करने के बाद भी तालिबान पहले से ज्यादा मजबूत स्थिति में आज क्यों है। बहरहाल पाकिस्तान के कट्टरपंथियों को इससे क्या, क्योंकि उनकी नजर में तो पड़ोसी मुल्क हिंदुस्तान से मधुर संबंध रखना सबसे बड़ा गुनाह है और इसके लिए आज नहीं तो कल इमरान सरकार को भी सजा भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह अलग बात है कि भारत पहले ही कह चुका है कि आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती हैं, इसलिए पहले आतंकवाद पर लगाम कसना होगा उसके बाद दोस्ती की बात की जानी चाहिए। बतौर प्रधानमंत्री इमरान खान दोस्ती की खातिर ऐसा करना भी चाह सकते हैं, लेकिन मुट्ठीभर कट्टरपंथियों की जिद के आगे वो मजबूर नजर आने लगे हैं। अगर ऐसा नहीं था तो क्या पूर्व सरकारों की गलतियों को सुधारते हुए भारत के गुनाहगार, भगोड़े आतंकियों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें हिंदुस्तान के हवाले नहीं कर सकते हैं। इस मामले में इमरान के हाथ वाकई बंधे हुए नजर आते हैं, इसलिए वो यहां अदालती कार्रवाई की बात करना शुरु कर देते हैं। यह कौन नहीं जानता कि इमरान सरकार यदि आतंकियों पर लगाम कसने में वाकई कामयाब हो जाती है तो न सिर्फ अमेरिका बल्कि पड़ोसी देशों से भी उसके संबंध सुधर सकते हैं और जिस तरह से आर्थिक संकट को हल करने के लिए कभी सऊदी तो कभी चीन का मुंह उन्हें ताकना पड़ रहा है वह भी करने की आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि तब रुकी हुई आर्थिक मदद अमेरिका जारी कर सकता है और अन्य देश भी उसकी मदद के लिए आगे आ सकते हैं। शर्त सिर्फ यही है कि इमरान सरकार आतंकवाद के खिलाफ दिए जाने वाले इम्तेहान को पास तो कर ले।
ईएमएस/ 05 दिसम्बर 2018