लेख

(व्यंग्य) ट्रांसफर न होने का दुःख और सुख ! (लेखक-डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

12/06/2019

कभी कभी दुःख में सुख मिलता हैं और कभी सुख में दुःख। हमारे साथी मित्र बाबूलाल जी हमारे साथ ही सेवा में नियुक्त हुए और वे बहुत कुशल चतुर और तेल लगाने में माहिर हैं ,यानी वे पानी रे पानी तेरा रंग कैसा ,जिसमे में मिला दो उस जैसा उनका स्वाभाव हैं ,कभी भी वे असत्य से दूर नहीं रहते ,हमेशा बोलेंगे की हम पूर्व में जा रहे हैं और जाते हैं दक्षिण। कारण वे राज्य स्तरीय अधिकारी हैं तो वे कभी भी अवकाश नहीं लेते जैसे हमारे प्रधान मंत्री जी , चाहे किसी भी रिश्तेदार के यहाँ मौत हो जाए या शादी। जब भी मौका मिला साहब से टूर प्रोग्राम कीअनुमति ले लेते हैं और कभी कभी तो प्रदेश के बाहर भी जाना हो तो शासकीय दौरा बन जाता हैं ,कारण वे साहब की नाक के बाल हो जाते हैं और हमेशा दूध देने वाली गाय रहते हैं तो साहब उनकी मज़बूरी और अपनी मज़बूरी का फायदा उठाते रहते हैं।
एक बार मुख्यालय छोड़ा तो उनका आप पता नहीं रहता ,उनके कक्ष का कार्य प्रभावित हो तो भी कोई चिंता नहीं। प्रदेश स्तर के अधिकारी होने से दौरे में उनका टीका(तिलक) ---करण बहुत अच्छे से होता हैं.जिस प्रकार नर्मदा का प्रत्येक कंकर शंकर होता हैं फिर मुख्यालय का अफसर वह भी मुखिया का नाक का बाल तो उसका कहना ही क्या हैं ? बाबूलाल जी के पास सब तालों की चाबी रहती हैं। मुख्यालय से बाहर यानि जिला ,क़स्बा ,गांव स्तर तक की पहुंच रखते हैं और वे अपने आपको मुखिया ही बताते हैं ,उनके बिना मुख्यालय का एक पत्ता भी यहाँ से वहां नहीं हिल डुल सकता। जैसे नगर निगम की कचरा ढोने वाली गाड़ी के नीचे चलने वाला श्वान यह समझता हैं की वह ही गाड़ी ढो रहा हैं।
बाबूलाल जी जब भी बाहर जाते तो वे मुख्यालय के हर काम का ठेका लेते हैं जैसे ट्रांसफर ,जाँच ,पेंशन ,पोस्टिंग ,फण्ड स्वीकृत करवाना और धमकी देकर आना की यदि बात नहीं मानी तो नुकसान उठाना पड़ेगा। वैसे उनकी मंशा मुख्यालय से बाहर जाने की नहीं होती कारण प्यासा खुद चल कर कुआँ के पास आता हैं पर क्या करे मौत ,त्यौहार ,शादी विवाह और अन्य रिश्तेदारियां निभाने जाना पड़ता हैं तब मजबूरी में जाते हैं पर वहां भी टीकाकरण (तिलक आदि ) की रस्म भी साथ में होती। मुख्यालय वापिस आने पर सबसे पहले अपने चपरासी से उनके कक्ष की डाक के बारे में जानकारी लेते ,उसके बाद आने वाली फाइल्स की चिंता ,कौन कौन कहाँ से कब आया। उसके बाद चिंता मग्न होकर चाय पीते और उसे पिलाते। साहब आये या नहीं ! इसकी जानकारी लेकर अकेले हैं या मीटिंग में। यदि अकेले हैं तो फिर वो साहब के कक्ष में जाते और बाहर साहब के पी ए से बोलकर नो डिस्टर्ब की हिदायत जारी कर कम से कम एक घंटे आपसी गुफ्तगू होकर बाहर गर्वीली मुद्रा में बाहर निकलते हैं और कुछ अलग चिंता में रहते हैंकि कुछ अधिक तो नहीं दिया साहब को !या फिर मन ही मन सोचते मुर्गा कहाँ जायेगा बचकर।
आजकल मोबाइल का चलन होने से सम्बंधित से बात करने में कोई परेशानी नहीं होती। कभी भी और कुछ कुछ ध्वनि आती सुनाई देती हैं "हाँ सुनो ,बात साहब से हो गयी हैं ,जितना दिया हैं वह कम होगा ,और करना पड़ेगा ,समझे ,और आर्डर कॉपी मेरे घर से लेने आना पड़ेगा ,हां हां बता दूंगा "अरे यार चिंता मत करो समझो काम हो गया। पूरी सेटिंग हो गयी।
समरथ को नहीं दोष गोसाईं तो वे बहुत आराम से रहते हैं। उनके द्वारा बहुत लोगों को उपकृत किया गया और वर्षों से बड़े साहबों की कृपा से, अंगद जैसा पाँव जमा रहा। समय परिवर्तनशील होता हैं। बाबूलाल जी में भी बहुत परिवर्तन हो गया ,मुख्यालय में उनकी तूती बोलती और उनका आभामंडल दिन रात दैदीपमानय होता जा रहा हैं उसका कारण उम्र ,धन और अनुभव की वृद्धि। पर एक बार मुख्यालय में एक बहुत समझदार और सीधे साहब आये और वो भी बाबूलाल जी की तरह। कहावत भी हैं "एक दो होशियार एक साथ नहीं रह सकते ".वैसे पूरे प्रदेश में ,सचिवालय और मंत्री जी के यहाँ बाबूलाल एक स्थापित नाम हैं तो नए साहब ने उनका ट्रांसफर मुख्यालय से संभागीय स्तर के कार्यालय में किया और उनके कार्यों की समीक्षा के लिए दो सदस्यीय समिति बनाकर पूरे कार्यकाल का परीक्षण कराया। उसमे सबसे महत्वपूर्ण बात समझ में आयी की ट्रांसफर उद्योग में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और उस माध्यमसे उन्होंने खूब उपकार किया और उपकृत हुए।
पर बाबूलाल जी की मुख्यालय में इतनी अधिक पकड़ थी की जैसे हॉस्पिटल में आई सी सी यु में एक सेंट्रल मोनेटरिंग होती हैं वैसे ही उनको रोज मुख्यालय की जानकारी मिलती रहती और वे मुख्यालय वापिस आने तड़पते रहते। पर बाबूलाल जी तेल और तेल की धार देखने और परखने के शौकीन हैं तो उन्होंने वहां पर भी मुख्यालय जैसी कार्यपद्धति अपनाई और वहां पर भी वो काम लेकर मुख्यालय आते जाते बने रहते। तब तक नए साहब रहे तब तक उनकी दाल नहीं गली पर ज्योंही दूसरे नए साहब आये तो उन्होंने बाबूलाल जी का ट्रांसफर अन्य स्थान पर कर दिया। इससे उन्हें बहुत परेशानी हुई ,तब उनको समझ में आया की बार बार ट्रांसफर करने या कराने से क्या नफा नुक्सान होता हैं। नफा यह रहा की फॅमिली मुख्यालय के शहर में पर ट्रांसफर में फॅमिली को ट्रांसफर वाले स्थान पर बताकर ट्रांसपोर्ट और टी ए बिल का फायदा लिया पर दूसरी बार के ट्रांसफर में बाबूलाल जी ने कसम खाई की अब कहीं नहीं जाना हैं ,पुराना फॉमूला की अब निलंबन कराओ और मुख्यालय में अपना मुख्यालय बनबाओ जिससे एक तीर से दो निशाने पहली बात मुख्यालय में आना जाना रहेगा और निलंबन भत्ता ७५% छह माह में हो जायेगा और मुख्यालय से संपर्क रहने से कभी तो दिन फिरेंगे!
बाबूलाल जी का जीवन मुख्यालय में ही बीता तो उन्हें मुख्यालय की आबोहवा अच्छी लगती हैं। इस प्रकार टी ए बिल में भी फायदा लिया ,निलंबन में भी लाभ मिला और अगले साहब के आने का इंतज़ार करते। आजकल जैसे ट्रांसफर होने से ट्रांसफर भत्ता भी मिलता और जल्दी जल्दी ट्रांसफर होने से साहब भी फाइल नहीं देखते और मात्र ला (लाओ) एंड आर्डर ले जाओं ,सोच लिया एक माह का वेतन खरच किया तो निलंबन और ट्रांसफर से मुक्त और मुख्यालय में आ गए।
बाबूलाल जानते हैं की ट्रांसफर करने में भी पैसा मिलता हैं और वापिस बुलाने में भी पैसा मिलता हैं। जिस प्रकार श्वाश लेने और देने में शक्ति खरच होती हैं।
इस विचार से कोई चले तो ट्रांसफर कोई दंड नहीं हैं जैसे निलंबन कोई अपराध नहीं हैं। यह जीवन में निश्चित रूप से राजस्व का पट्टा जैसा होता हैं.
खुदा करे हसीनों के बाप रोज मरा करे ,
ताकि उनके घर रोज आया जाया करे।
12जून/ईएमएस