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(विचार-मंथन) ज्यादा तनाव बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है उत्तर कोरिया (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

14/04/2019

उत्तर कोरिया लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों और लगातार बढ़ती आर्थिक बदहाली के कारण तनाव की स्थिति से गुजर रहा है। पहले कहा जाता था कि पड़ोसी देश दक्षिण कोरिया से उसके आपसी संबंध खराब होने और जब-तब युद्ध छेड़ देने की वजह से देश के हालात बदतर हुए हैं। इसके बाद कहा गया कि उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता किम जोंग उन को परमाणु शक्ति संपन्न बनने की सनक सबार है, इसलिए देश की आवाम परेशान हाल है। इन तमाम आरोपों और दाबों के बावजूद कभी भी उत्तर कोरिया के अंदर टॉप लीडर किम जोंग उन के खिलाफ आवाज उठती हुई सुनाई नहीं दी। प्रमुख नेता किम ने जब कभी जो फैसला लिया संपूर्ण देश उसके पीछे पंक्तिबद्ध हो खड़ा दिखा है, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। एक तरफ अमेरिका से बातचीत के चलते परमाणु निरस्त्रीकरण की ओर उत्तर कोरिया बढ़ा है, वहीं दूसरी तरफ बहुत ही समझदारी से उसने दक्षिण कोरिया से संबंध भी सुधारने में सफलता हासिल की है। दरअसल वर्षों के बिगड़े संबंधों को दोनों देशों ने आपसी बातचीत के जरिए सुधारने के जो प्रयास किए उससे दुनिया में एक अच्छा संदेश भी गया। इसके साथ ही कहा जाने लगा कि बातचीत का मतलब यह हुआ कि अब दो पड़ोसी दुश्मन देश दोस्त बन चुके हैं, लेकिन इससे क्या क्योंकि देश के अंदरुनी हालात तो बद से बदतर हुए चले जा रहे हैं। इसलिए उत्तर कोरिया में तनाव बढ़ रहा है, जिसे देखते हुए प्रमुख नेता किम जोंग उन ने सत्तारुढ़ वर्कर्स पार्टी की शीर्ष समिति की बैठक बुलाकर समस्या का समाधान खोजने को कहा है। उसके लिए सबसे बड़ी समस्या आर्थिक संकट ही है। इसे लेकर उत्तर कोरिया के सरकारी मीडिया ने भी सूचना दी कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ किम जोंग उन की हनोई में हुई शिखर वार्ता विफल रहने के बाद केंद्रीय समिति की बैठक बुलाई गई है। गौरतलब है कि फरवरी में हुई इस बैठक में दोनों नेताओं के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। इससे पहले पिछले साल जून में सिंगापुर में ट्रंप और किम के बीच पहली ऐतिहासिक बैठक हुई थी, जिससे दुनियाभर में संदेश गया था कि अब उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति संपन्न होने की जिद छोड़ चुका है और इसलिए अमेरिका द्वारा उस पर लगाए गए प्रतिबंधों को भी उठा लिया जाएगा। वैसे किम ने तो पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण की बात सार्वजनिक तौर पर कहते देखे गए, लेकिन ट्रंप ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिससे संदेश जाता कि अब उत्तर कोरिया से वह प्रतिबंध उठाने जा रहा है। हॉं यह जरुर रहा कि ट्रंप ने किम पर प्यार आने की बात कही, लेकिन इससे क्या, क्योंकि उनके विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ किम को तानाशाह ही बताते रहे। अब इससे और पीछे चलें तो देखने को मिलता है कि साल 2017 में अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच तनाव चरम पर था। अमेरिका लगातार उत्तर कोरिया को घेरने और युद्ध की धमकी देने में लगा रहा, जिसे संज्ञान में लेते हुए रूस और चीन ने भी चेतावनी देते हुए कहा था कि किसी भी गलत कदम का भयानक परिणाम उसे भी भुगतना पड़ सकता है। इस जुबानी जंग के बीच दुनिया में भय भी व्याप्त हुआ कि कहीं वाकई युद्ध छेड़ दिया गया और किसी भी देश ने यदि परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर दिया तो फिर इस दुनिया का क्या होगा, क्योंकि परमाणु युद्ध की भयावहता सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इसके विचार से ही शांतिप्रिय देशों के नागरिकों का दिल त्राहिमाम, त्राहिमाम करने लग जाता है। दरअसल यह वह समय था जबकि अमेरिकी युद्धपोत और पनडुब्बियां उत्तर कोरिया पहुंच मोर्चा तक संभाल चुकी थीं, वहीं बताया जा रहा था कि उत्तर कोरिया भी युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार है। इसी बीच उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता किम की चीन यात्रा अचानक होती है और पूरा माजरा ही बदलता नजर आ जाता है। अमेरिका भी बातचीत के लिए मार्ग प्रशस्त करने जैसी बातें करता दिखता है। वहीं जून 2018 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ किम की ऐतिहासिक शिखर वार्ता भी होती है। ट्रंप और किम की करीब चार घंटे तक चली इस बातचीत के बाद राष्ट्रपति ट्रंप कहते नजर आते हैं कि बातचीत बेबाक, प्रत्यक्ष एवं सकारात्मक रही। वहीं वो एक दार्शनिक की भूमिका में भी नजर आते हैं और कहते दिखते हैं कि 'जरूरी नहीं कि अतीत का संघर्ष भविष्य का युद्ध हो।’ इसका अर्थ यह निकाला गया कि उत्तर कोरिया ने अपने आपको शक्ति संपन्न बनाने के लिए अतीत में जो संघर्ष किया वह किसी देश के साथ युद्ध की पूर्व तैयारी नहीं थी, बल्कि उसने आत्मरक्षा की खातिर अपने आपको मजबूत करने जैसा काम किया है। ट्रंप के इस आशय के बयानों ने दुनिया को मानों आश्वस्त करने का काम किया कि अब युद्ध की विभीषिका टल गई है। बहरहाल इस घटनाक्रम को हुए काफी समय ब्यतीत हो गया है, इसलिए वाकई अब उत्तर कोरिया और उसके नागरिकों की सुध लेने की आवश्यकता आन पड़ी है। अब अमेरिका को विचार करना होगा कि आखिर उसे उत्तर कोरिया से किस तरह प्रतिबंध हटाने हैं और आर्थिक तौर पर पूरी तरह टूट चुके देश को किस तरह की मदद मुहैया करानी है, क्योंकि इस दिशा में यदि देरी हुई तो एक बार फिर तनाव की स्थिति अपने चरम पर पहुंच सकती है। अब यह तनाव उत्तर कोरिया की जनता बर्दाश्त नहीं कर सकेगी, जिसका बेहद गंभीर परिणाम भी देखने को मिल सकता है। इसलिए इंसानियत का तकाजा तो यही है कि युद्ध और अशांति की बातें छोड़ शांति और सद्भाव की दिशा में आगे बढ़ा जाए। कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण की प्रतिबद्धता को अमली जामा पहनाने में कोई परेशानी नहीं हो।
14अप्रैल/ईएमएस