क्षेत्रीय

“सलमोरा गांव, माजुली, असम, की कुमार समुदाय की कुम्हारी परंपरा" की ऑनलाइन प्रदर्शनी

10/06/2021

भोपाल(ईएमएस)। इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय द्वारा अपनी ऑनलाइन प्रदर्शनी श्रृंखला के बावनवे सोपान के तहत आज कुम्हार पारा मुक्ताकाश प्रदर्शनी से सलमोरा गांव, माजुली, असम, की कुमार समुदाय की कुम्हारी परंपरा की जानकारी को ऑनलाईन प्रदर्शनी श्रृंख्‍ला के तहत प्रदर्शित किया गया है। इससे सम्बंधित विस्तृत जानकारी तथा छायाचित्रों एवं वीडियों को ऑनलाईन प्रस्तुत किया गया है।
इस संदर्भ में संग्रहालय के निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार मिश्र ने बताया कि माजुली असम की विशाल ब्रम्हपुत्र नदी में एक द्वीप है। सलमोरा गांव माजुली द्वीप के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है, जो व्यापक पैमाने पर कुमार समुदाय द्वारा बसा हुआ है, जो एक कुशल कुम्हार और नाव बनाने में सिद्दहस्त हैं। ऐसा कहा जाता है कि कुमारों की प्रारंभिक बस्ती ऊपरी असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर सादिया में थी, और वे 13वीं से 16वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान विभिन्न चरणों में मिट्टी के बर्तनों के लिए उपयुक्त मिट्टी की तलाश में इस द्वीप पर चले आये। इस गांव में मिट्टी के बर्तन पारंपरिक रूप से महिलाओं द्वारा हाथ से बनाये जाते हैं। ये विभिन्न प्रकार के उपयोगी बर्तन, औपचारिक और सजावटी वस्तुओं का निर्माण इस द्वीप व अन्य गांवों और कस्बों में लोगों की मांगों की आपूर्ति हेतु करते हैं। जब कुमार समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर मिट्टी के बर्तनों को लेकर विशाल ब्रम्हपुत्र नदी में नावों के माध्यम से गांव से पास के शहर तक जाते हैं तो यह एक अद्भुत दृश्य होता है।
मानसून के प्रारंभ में, बाढ़ के दौरान मिट्टी को एकत्र करने के लिए नदी के किनारे गड्ढे तैयार किए जाते हैं। बरसात के मौसम में, नदी के किनारे वाले भाग पर नए जलोढ़ जमा हो जाते है। उपयुक्त मिट्टी को 30-40 फीट गहरे गड्ढों से खोदकर एकत्र कर लिया जाता है और नदी के किनारे ढेर लगा दिया जाता है। फिर मिट्टी को उनके घरों के आंगन में ले जाया जाता है। जिसे पानी में मिलाकर एक गड्ढे में रख दिया जाता है और भविष्य में उपयोग हेतु सुरक्षित रखने के लिए रेत से ढक दिया जाता है। मानसून खत्म होने के बाद मिट्टी के बर्तनों के निर्माण का कार्य प्रारंभ किया जाता है।
कुम्हार बर्तन बनाने हेतु पारंपरिक उपकरणों और औजारों का उपयोग करते हैं। कठ- एक लकड़ी का तख्ता होता है, जिसमें मिट्टी को रेत के साथ मिलाकर पिंड तैयार किये जाते हैं, इथाली- रिम को आकार देने के दौरान उपयोग किया जाने वाला कपड़ा, साथ में पानी में डूबा हुआ मिट्टी का कटोरा, अफ़ारी- एक उथला व चौड़ा मिट्टी का कटोरा, जिसमें निचला हिस्सा धँसा हुआ होता है, जिसका उपयोग बर्तन को आकार देने के लिए रोटर के रूप में किया जाता है।, पिटन- एक लकड़ी या मिट्टी का मुदगर, बलिया- एक पत्थर या गीली मिट्टी का निहाई। इन मिट्टी के बर्तनों की अनूठी विशेषताओं में से एक अफ़ारी नामक उपकरण का प्रभावी उपयोग है। जब एक पिंड से खोलोनी नामक बर्तन का आधार तैयार किया जाता है तो इसे वांछित आकार देने के लिए अफ़ारी पर रखा जाता है। बर्तन बनाने के दौरान कुम्हार अपने पैर के अंगूठे से इस कटोरे जैसे उपकरण के किनारे को घुमाने के एक अनूठे शिल्प कौशल का प्रदर्शन करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह हस्तनिर्मित और चाक से मिट्टी के बर्तनों निर्माण की अवस्था है। घर के खुले आंगन का उपयोग धूप में बर्तन सुखाने के लिए किया जाता है। सूखे मटके को भट्टी में पकाने के पूर्व ही रंगा-मिट्टी (एक प्रकार की लाल मिट्टी) से उपचार और सजावट की जाती है, जिसे कुम्हार डेरगांव आंचल में नदी किनारे से प्राप्त करते हैं, जहां इस मिट्टी के भंडार प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है।
एन. सकमाचा सिंह, संग्रहालय एसोसिएट ने जानकारी देते हुए बताया कि अनुष्ठानिक बर्तन तैयार करने हेतु सामाजिक रीति-रिवाजों और प्रथाओं का उचित रूप से पालन किया जाता है। विवाह समारोह के लिए, अवंतेकेली (पवित्र जल के लिए एक बर्तन) और दहातेकेली (दही के लिए एक बर्तन) नामक विशेष बर्तन उपयुक्त अनुष्ठानों संपादित कर तैयार किए जाते हैं। जब शादी तय हो जाती है, तो इन बर्तनों को बनाने के लिए कुम्हारों को दूल्हे के घर से तामूल-पान (पान और सुपाड़ी) दिया जाता है। इन्हें तैयार करने वाले कुम्हार को एक दिन उपवास करना होता है । अगले दिन स्नान करने के बाद अनुष्ठान पूजा की जाती है। तैयारी के समय कुछ खास बातों का ध्यान रखा जाता है, जो दोनों के वैवाहिक संबंधों से गहराई से जुड़ी होती है। ऐसा माना जाता है कि अगर बनाते समय घड़ा टूट जाए तो विवाह की तिथि आगे बढ़ा दी जाती है। यदि मटके में पानी जमा हो जाता है, तो शादी के दिन बारिश होगी। यदि घड़ा बार-बार टूटता है तो यह विवाह के लिए अशुभ संकेत है।
ग्रामीण अपने बर्तनों को पकाने हेतु पारंपरिक भट्टे का उपयोग करते हैं। यह एक उभरी हुई गोलाकार दीवार की संरचना है, जिसमें एक केंद्रीय भट्टी होती है जिसमें चार छिद्र होते हैं। वृत्ताकार भट्ठे की ऊपरी सतह लकड़ी के तख्ते से बनी तथा मिट्टी और पुआल से ढकी होती है। सामने की दीवार में भट्ठी में आग लगाने के लिए अंदर की ओर एक जगह होती है। एक व्यक्ति इस खुले स्थान से अंदर प्रवेश कर सकता है और आवश्यक तापमान के अनुसार आग को नियंत्रित कर सकता है। बर्तनों को पकाने के लिये इकट्ठा कर उपयुक्त रूप से व्यवस्थित किया जाता है। इसे घास और मिट्टी के कई स्तरों से ढक कर का एक गुंबद जैसी संरचना तैयार कर ली जाती है। भट्ठी की आग समान रूप से पूरी गुंबद संरचना में वितरित होती है। मटके को पकने में लगभग 3 से 4 घंटे का समय लगता है, और उन्हें तभी हटाया जाता है जब ऊपरी गुंबद की सतह पूर्ण रूप से ठंडी हो जाती है।
असम में माजुली द्वीप के मिट्टी के बर्तन इन प्राचीन प्रथाओं की गौरवशाली संस्कृति और परंपरा को दर्शाती है। यद्यपि कुम्हारों ने पहिया और मशीनीकृत मिट्टी के बर्तनों का उपयोग करना शुरू कर दिया, फिर भी पारंपरिक विश्वास व्यवस्था अभी भी कुम्हारों में गहराई से अंतर्निहित है। संग्रहालय की इस प्रदर्शनी को 2016 में असम, माजुली द्वीप के सलमोरा गांव के कुम्हारों को आमंत्रित करके तैयार करवाया गया था।
दर्शक इसका अवलोकन मानव संग्रहालय की अधिकृत साईटएवं फेसबुक के अतिरिक्त यूट्यूब लिंक पर ऑनलाइन के माध्यम से घर बैठे कर सकते हैं।
हरि प्रसाद पाल / 10 जून, 2021