लेख

आखिर कछुआ जीत गया !(डीज़ल ने पेट्रोल को पछाड़ा ) (लेखक-डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

30/06/2020


किसी भी मनुष्य को अधिक घमंड नहीं करना चाहिए और न अहम .हमेशा समय बलवान होता हैं .समय को करवट बदलने में समय नहीं लगता .समय के कारण बड़े बड़े पहलवान हार जाते हैं और पिद्दी पहलवान जीत जाते हैं .देखो रावण का घमंड नहीं रहा ,उनको भी हार का सामना कर पड़ा .
ऐसा को व्यक्ति हैं जो हमेशा जीता हैं ,जो हमेशा जीतता हैं उसे हार का डर लगा रहता हैं ,जो हारा हुआ हैं वह निडर रहता हैं .जो शिखर पर होता हैं उसे धरातल में आने का डर रहता हैं और जो धरातल पर हैं उसे किस बात का डर .
कहते हैं शब्द के बाण जिंदगी भर दिल में लगे रहते हैं .शरीर का घाव भर जाता हैं पर शब्द के बाण जिंदगी भर नहीं भरते .मात्र अंधे कि औलाद अंधी होती हैं पर महाभारत हो गया था .रूपवती होने से सीता का अपहरण हुआ ,और जिंदगी भर के लिए रावण कलंकित हुआ .पार देश कि स्तरहीन घटिया राजनीति में अब तो शब्दों का क्या ,बमों का भी असर नहीं पड़ता .
जब विपक्ष में रहते हैं तब कहते हैं ,सरकार को ऐसा करना चाहिए और जब स्वयं सत्ताशीन होते हैं तब कहते हैं हम देखेंगे ,करेंगे .इसका मतलब क्या हुआ ?
वर्तमान में जो सत्ताधारी हैं उनके वर्ष २०१३-१४ के भाषण सुनें तो तत्कालीन सरकार को बिना पानी के कोसते रहे .न केवल वे नेता वरन उनके चम्मचे या चाटुकार चाहे डबल श्री हो या सलवार धारी बाबा .उस समय ऐसा लग रहा था कि यदि सरकार बनी तो केरोसीन ,पेट्रोल और डीज़ल कि नदियां देश में बहा देंगे .उस समय इतने आसूं बहाये ,छाती पीटी और चटखारे लेकर तत्कालीन मुख्य मंत्री गुजरात अपनी लोकप्रियता पर इतना गुमान कर रहे थे कि शायद जो बोल रहे थे वह करेंगे ,पता नहीं कुर्सीनशीन होने के बाद सिर्फ दहाड़ते रहे हुए धरातल पर शून्य ,कारण जीत का उत्साह में होश नहीं रहा .
अपने मुंह मियाँ मिठ्ठू बनने वाले अपनी कसीदा सुनते रहे और सुनाते रहे .लगने लगा जैसे विश्व विजेता बनेगे .विपक्ष को हमेशा बेइज्जत किया .होता भी हैं और होना भी चाहिए ,क्योकि चुनाव लाडे नहीं जाते प्रबंधन से जीता जाता हैं .जनता में बहुत उत्साह हैं और भविष्य में भी रहेगा विश्व गुरु बनना हैं .और उस दिशा में हम अग्रसर हैं .
पता नहीं किस मुहूर्त में पद ग्रहण किया उस दिन से देश में गिरावट का सिलसिला चल रहा हैं .और सबसे अधिक वह व्यक्ति बहुत मुर्ख माना जाता हैं जो अपने विरोधियों के नाम लेकर कोसता हैं .विगत ६ वर्ष से अधिक समय में प्रधान सेवक ने सबसे अधिक लोकप्रिय बनाया गांधी-नेहरू परिवार को .सब जगह इसी परिवार का बखान .दुश्मन दोस्त जैसा हो गया .क्या करे कुछ नहीं किया तो पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ो .उन्होंने कुछ नहीं किया ,उन्होंने ये गलत किया ,पर खुद ने क्या कर लिया ?हवा हवाई जुमलेबाज़ी .
मतलब की बात पर आये जो बहुत महत्वपूर्ण हैं .हमारे देश में हमेशा कछुआ जीतता रहा और इस बार भी जीता .पेट्रोल हमेशा सबसे महंगा रहता था ,पर वर्तमान सरकार की अनुकम्पा से डीज़ल उससे भी आगे निकल गया .इस बिंदु पर सरकार के पास बहुत दलीलें हो सकती हैं और अपनी कमजोरी छिपाने पुरानी सरकारों की नाकामियों की दलील दी जा सकती हैं .वर्तमान सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में हैं ,पूरा समर्थन ,बहुमत होने के बाद कब तक पिछली सरकार को कोसेंगे .फूलमाला पहनने आगे और उस कुछ के लिए पीछे ऐसा क्यों ?
इससे कितने फायदे होंगे ---पहले किसानों को और अधिक मात्रा में आत्महत्या करना पड़ेगा,मंहगाई के कारण शासन में बैठे मंत्री नेता सचिवों को अपने जेब से थोड़ी खर्च करना पड़ता हैं ,उसके बाद माल ढुलाई की लगत बढ़ेंगी ,जिससे सामग्रियां महंगी होगी ,आम नागरिक ख़ास हो जायेगा .रेल बसों का भाड़ा बढ़ेगा ,निजी वाहन खड़े रहेंगे या मन मार कर चलाएंगे .हर सामग्री का महंगा होना ,यानी सरकार की विफलता का प्रतीक हैं .
युध्य के कारण का बहाना बनाकर जनता को चुप करेंगे पर जनता कैसे भरण पोषण करेंगी .सत्ताधारियों को इसलिए फर्क नहीं पड़ता ,क्योकि उनकी निगाह में यक्षणी शक्ति होती हैं .उनके पास अनंत शक्ति का भण्डार होता हैं .कभी झोला उठाकर बाज़ार तो जाना नहीं पड़ता .मात्र अपने सुरक्षित बंगलों में बैठकर चिंतन करते हैं .
इस विषय पर सरकारों को जनहित में सोचना चाहिए ,क्या करे भारत इतना बड़ा देश हैं और जनता में आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हैं ,विपक्ष शक्तिहीन हैं इसका फायदा मिल रहा हैं .
इस प्रकार की असफलताएं भविष्य के लिए लाभकारी होंगी .कारण जनता पछता रही हैं .पुनः मूषको भवः.यही रफ़्तार रही तो हम हर क्षेत्र में अग्रणी रहेंगे चाहे शिक्षा ,स्वास्थ्य सड़क बिजली ,पानी इत्यादि .गरीब रहेंगे नहीं तो गरीबी मिट जाएँगी ,रोजगार की जरुरत नहीं कारण ,रोजगारी ही बेरोजगार हो रहे हैं .सब तरफ अमन चैन हैं .
सब कुछ हमारे देश में रोटी नहीं तो क्या ?
वादा लपेट लो लंगोटी नहीं तो क्या ?
30जून/ईएमएस