लेख

(विचार-मंथन) व्यवस्था को चुनौती देते नक्सली (लेखक- सिध्दार्थ शंकर/ईएमएस)

02/12/2019

झारखंड के गुमला में मतदान के दौरान नक्सली हमला यह बताने के लिए काफी है कि देश की आतंरिक सुरक्षा लगातार सिर उठा रही है। इससे पहले लातेहार में बीती शुक्रवार रात नक्सली हमला हुआ। इस हमले में पुलिस के चार जवान शहीद हो गए। यह हमला तब किया गया, जब चंदवा पुलिस स्टेशन क्षेत्र में पुलिसकर्मी आधिकारिक वाहन से जा रहे थे। इस हमले के लिए वे बिल्कुल भी तैयार नहीं थे। मारे गए पुलिसकर्मियों में एक सब इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी है। इसी साल जून माह में झारखंड के सरायकेला-खरसावां में भी नक्सलियों ने पुलिसकर्मियों को निशाना बनाया था। हमले में पांच पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। इस तरह के हमले बार-बार सवाल खड़ा कर रहे हैं। नक्सली हिंसा से कई दशक तक जूझने के बाद भी सरकारें नक्सल नीति की दिशा तय करने की चुनौतियों से जूझ रही हैं। यह अभी भी साफ नहीं हो पाया है कि नक्सलवाद की समस्या का समाधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रयासों में है या फिर कानून और व्यवस्था से जुड़ा मामला है। नक्सलवाद के अंतर्गत आने वाले लाल गलियारे की हिंसा पिछले पांच दशकों से जारी है।
देश के 21 राज्यों के लगभग 250 जिलों को प्रभावित करने वाला नक्सलियों का यह इलाका आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इन इलाकों में अपहरण, फिरौती, डकैती, बम विस्फोट, निर्ममता से हत्याएं, अवैध वसूली, विकास को बाधित करने की कोशिशें तथा लोकतांत्रिक सत्ता को उखाड़ फेंकने की इच्छा और समांतर सरकार चलाने की हिमाकतें होती रही हैं। देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बने नक्सलियों को राज्य और केंद्र सरकारें अक्सर चुका हुआ घोषित करने की गलती करते रही हैं और हमेशा इसका जवाब बेहद कायराना मिलता रहा है। साल 2009 में कोलकाता से करीब 250 किलोमीटर दूर लालगढ़ जिले पर नक्सलियों के कब्जे का घटनाक्रम भी बड़ा हैरान कर देने वाला था। माओवादियों ने इस इलाके को कब्जे में लेकर स्वतंत्र घोषित कर दिया था, जिसके बाद कई महीनों तक संघर्ष चला और आखिरकार सुरक्षा बल इस विद्रोह को दबाने में कामयाब रहे थे। दरअसल, सामाजिक न्याय की स्थापना के नाम पर अस्तित्व में आई नक्सल विचारधारा अब हिंसा, रक्तपात और वैधानिक सत्ता के खिलाफ काम करने वाला ऐसा संगठन बन गया है जिसमें खूनी विद्रोह को स्वीकार कर लिया गया है।
आजादी के बाद जब देश बड़े बदलावों के लिए तैयार हो रहा था और सरकारें भूदान, योजना आयोग, पंचवर्षीय योजनाएं, पंचायती राज और अन्य लोक कल्याणकारी कार्यों से देश का पुनर्निर्माण करने को संकल्पबद्ध थीं, तभी नक्सलवाद का उदय होना शुरू हो चुका था जो हिंसक विचारधारा को पोषित करने वाला था। वर्ष 1969 में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर नामक हिंसक समूह की स्थापना से यह साफ हो गया था कि नक्सलवाद आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसका प्रभाव दक्षिण में भी हुआ और वहां पर भू स्वामियों के विरुद्ध हिंसक आंदोलन के लिए 1980 में पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) की स्थापना की गई। इस समय नक्सलवाद का प्रभाव स्थानीय रूप से बढ़ रहा था और उसमें मजदूर और गरीब लोगों को शामिल करने के प्रयास किए जा रहे थे। यह भारत के लिए राजनीतिक तौर पर अस्थिरता और क्षेत्रीय दलों के उभार का भी समय था।
इस समय माकपा भी अस्तित्व में आ चुकी थी जो लोकतंत्र में भी अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाहती थी। 1977 के बाद भाकपा ने माकपा और दूसरी छोटी कम्युनिस्ट पार्टियों के साथ मिल कर वाम मोर्चे का गठन किया। व्यावहारिक तौर पर केरल सहित अधिकांश जगहों पर यह पार्टी माकपा के एक छोटे सहयोगी दल में बदल गई। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे राज्यों में वाम दल सत्ता में आए भी। नक्सलवाद की हिंसक विचारधारा को भी राजनीतिक कारणों से स्थानीय समर्थन मिलने से यह समस्या बढ़ती गई। नक्सलियों ने पुलिस और अर्धसैनिक बलों को निशाना बना कर 90 के दशक में इसे देश की बड़ी आंतरिक चुनौती बना दिया। नक्सलियों ने बुनियादी रूप से पिछड़े हुए सुदूरवर्ती और भौगोलिक रूप से कटे इलाकों पर अपना प्रभाव कायम किया।
सरकार ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इससे निपटने के लिए 'ग्रे हाउंड्सÓ और 'कोबराÓ जैसे बल तैयार किए। नक्सलियों के सफाए के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। यूपीए शासनकाल में नक्सलियों पर त्वरित कार्रवाई और समेकित कार्रवाई योजना जैसी रणनीतियां बनाई गईं। बाद में नक्सल विरोधी अभियान और नक्सल प्रभावित इलाकों के लिए संचार माध्यमों को विकसित करने और आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को भत्ते देने के लिए सुरक्षा संबंधी खर्च की योजना बनाई गई। इस योजना के तहत यह भत्ता केंद्र सरकार राज्यों को देती है। इसके तहत नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों और थानों के लिए भी धन का आवंटन किया जाता है। नक्सली हमलों की कड़ी चुनौती के बीच आठ मई 2017 को माओवादी हिंसा से प्रभावित दस राज्यों में एकीकृत कमान के गठन की पहल करते हुए सभी राज्यों की साझा रणनीति बना कर एक आठ सूत्रीय समाधान तैयार किया गया। इसके अंतर्गत कुशल नेतृत्व, आक्रामक रणनीति, प्रशिक्षण, कारगर खुफिया तंत्र, कार्ययोजना के मानक, कारगर प्रौद्योगिकी, प्रत्येक रणनीति की कार्ययोजना और वामपंथी उग्रवाद के वित्त पोषण को विफल करने की रणनीति को शामिल करने की जरूरत बताई।
इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि नक्सलवाद से निपटने की सरकारी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन में गहरा फर्क देखने को मिला। छत्तीसगढ़ में आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए पुलिस की पुनर्वास नीति के अंतर्गत वादे तो बेहद लुभावने किए गए, जबकि नीतियों को लागू करने में नाकामी छिपी नहीं है।
ईएमएस/ 02 दिसम्बर 2019