लेख

तीर्थ-क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य (लेखक-डॉक्टर अरविन्द पी जैन / ईएमएस)

11/07/2019

सागारधर्मामृत में लिखा हैं की गृहस्थ को तीर्थयात्रा अवश्य करना चाहिए क्योकि इससे दरशन की विशुद्धता होती हैं .गृहस्थ केलिए हितकारी होती हैं .वहां जाकर विचारक आत्मा ह्रदय से यही कहेगा ---
खुदा को खुद ही में ही ढूंढ,खुद को तू दे निकाल !
फिर तू ही खुदा कहेगा ,खुदा हो गया हूँ मैं !!
यदि शास्त्र -प्रवचन, तत्व - चर्चा, प्रभु-पूजन, कीर्तन, सामयिक प्रतिकमण या विधान-प्रतिष्टोत्सव आदि धार्मिक प्रसंग हों तो जन-संसर्ग अनर्थ का कारण नहीं है, क्योकि वहाँ सभी का एक ही उद्देश्य होता है ओर वह है - धर्म-साधना। किन्तु जहाँ जनसमूह का उद्देश्य धर्म-साधना न होकर सांसरिक प्रयोजन हो, वहाँ जन-संसर्ग संसार-परम्परा का ही कारण होता है ।
तीर्थ-क्षेत्रों पर जनसमूह एकत्रित होता है, उसका उद्देश्य धर्म-साधन होता है । यदि उस समूह में कुछ तत्व ऐसे हों जो सांसारिक चर्चाओ ओर अशुभ रागवर्धक कार्यों में रस लेते हों तो तीर्थों पर जाकर ऐसे तत्वों के संपर्क से यथासंभव बचने का प्रयत्न करना चाहिए तथा अपने चित की शांति और शुद्धि बढ़ाने का ही उपाय करना चाहिए । यही आंतरिक शुद्धि कहलाती है।
वहशुचिता का प्रयोजन बाहरी शुद्धि है । तीर्थ-क्षेत्रों पर जाकर गंदगी नहीं करनी चाहिए । मल-मूत्र यथास्थान ही करना चाहिए । बच्चो को भी यथास्थान ही बैठना चाहिए । दीवालों पर अश्लील वाक्य नहीं लिखने चाहिए। कूड़ा, राख यथास्थान डालना चाहिए । रसोई यथास्थान करनी चाहिए। सारांश यह है कि तीर्थों पर बाहरी सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
स्त्रीयो को एक बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मासिक-धर्म के समय उन्हे मन्दिर, धर्म-सभा, शास्त्र-प्रवचन, प्रतिष्ठा-मण्डप आदि में नहीं जाना चाहिए। कई बार इससे बड़े अनर्थ और उपद्रव हो जाते हैं।
जब तीर्थ-क्षेत्र के दर्शन के लिए जायें,तब स्वच्छ धुला हुआ(सफेद या केशरिया) धोती-दुपट्टा पहन कर और द्रव्य सामग्री ले जाना चाहिए। जहाँ तक हो, पूजन की सामग्री घर से ले जाना चाहिए। यदि मन्दिर की सामग्री लें तो उसकी न्योछावर अवश्य दे देनी चाहिए। जहाँ से मन्दिर का शिखर दिखाई देने लगे, वहीं से 'कोई विनती अथवा कोई स्तोत्र बोलते जाना चाहिए।क्षेत्र के ऊपर यात्रा करते समय या तो स्तोत्र पढ़ते जाना चाहिए अथवा अन्य लोगों के साथ धर्म-वार्ता और धर्म-चर्चा करते जाना चाहिए।
क्षेत्र और मन्दिर में विनय का पूरा ध्यान रखना चाहिए। सामग्री यथास्थान सावधानी पूर्वक चढ़ानी चाहिए। उसे जमीन में , पैरों में नहीं गिरानी चाहिए। गन्धोदक भूमि पर न गिरे, इसका ध्यान रखना आवश्यक है। गन्धोदक कटि भाग से नीचे नहीं लगाना चाहिए। पूजन के समय सिर को ढकना और केशर का तिलक लगाना आवश्यक है।
जिस तीर्थ पर जायें और जिस मूर्ति के दर्शन करें, उसके बारे में पहले जानकारी कर लेना जरूरी है । इससे दर्शनों में मन लगता है और मन में प्रेरणा और उल्लास जाग्रत होता है।
तीर्थ -यात्रा के समय चमड़े की कोई वस्तु नहीं ले जानी चाहिए। जैसे - सूटकेस , बिस्तरबंद, जूते, बैल्ट, घड़ी का फीता, पर्स आदि।
अन्त में एक निवेदन और है भगवान के समक्ष जाकर कोई मनोती नहीं मागनी चाहिए, कोई कामना लेकर नहीं जाना चाहिए। निष्काम भक्ति सभी संकटों को दूर करती है। स्मरण रखना चाहिए कि भगवान से सांसरिक प्रयोजन के लिए कामना भक्ति नहीं, निदान होता है। भक्ति निष्काम होती है, निदान सकाम होता है। निदान मिथ्यात्व कहलाता है और मिथ्यात्व संसार और दुख का मूल है।
एक बात और ध्यान रखनी चाहिए की हम संसार में रहकर जितने पाप करते हैं उनका तिरोहण तीर्थ क्षेत्र में होता हैं और यदि तीर्थ क्षेत्र में किया गया पाप का निवारण कहाँ होगा ?कहीं नहीं .
इसीलिए कहते हैं --
मक्का गए मदीना गए, बनकर आये हाजी !
न आदत गयी न इल्लत गयी ,फिर पाज़ी के पाज़ी !!
धर्मक्षेत्र में जितने निर्मल परिणाम होंगे जितनी भावों की शुद्धि होगी उतनी शांति और आत्मकल्याण हो सकेगा।
11जुलाई/ईएमएस