लेख

उमर-महबूबा का ‘जमात’ वाला प्रेस (लेखक - योगेश कुमार गोयल / ईएमएस)

15/03/2019

आतंकवाद पर नकेल कसने के मकसद से केन्द्र सरकार द्वारा घाटी में अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा छीनने के बाद जिस प्रकार अलगाववादी संगठन जमात-ए-इस्लामी पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत 5 साल का प्रतिबंध लगाया गया है, उसका हर ओर स्वागत होना चाहिए था लेकिन अगर महबूबा मुफ्ती या उमर अब्दुल्ला सरीखे जम्मू कश्मीर के बड़े नेता इस फैसले का विरोध करते हुए बेसुरा राग अलाप रहे हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं हैं। आश्चर्य इस बात को लेकर है कि एक ओर जहां चौतरफा दबाव के बाद पाकिस्तान अपने वहां के ऐसे ही कुछ संगठनों पर प्रतिबंध लगाने पर विवश हुआ है, वहीं हमारे यहां ऐसे किसी संगठन पर प्रतिबंध लगने पर हमारी ही धरती पर पलने वाले कुछ तत्व इस प्रकार की विरोध की राजनीति कर रहे हैं। दरअसल अलगाववादियों की भाषा बोलते रहे इन लोगों की फितरत ही कुछ ऐसी है कि जब ये सत्ता में होते हैं तो इनके सुर कुछ और होते हैं और सत्ता से बाहर होते ही ये अलगाववादियों की भाषा बोलने लगते हैं। घाटी में आतंक का पर्याय बने पत्थरबाजों के पक्ष में आवाज बुलंद करना, अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस लिए जाने पर उसका विरोध करना और अब जमात-ए-इस्लामी सरीखे अलगावादी संगठन पर प्रतिबंध लगाए जाने पर उसकी मुखालफत करना, यही इनकी राजनीति का वास्तविक घृणित चेहरा है।
जमात-ए-इस्लामी पर पहले दो बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है। पहली बार 1975 में जम्मू कश्मीर सरकार द्वारा इस पर दो साल का प्रतिबंध लगाया गया था और दूसरी बार केन्द्र सरकार द्वारा 1990 में इसे प्रतिबंधित किया गया था, जो दिसम्बर 1993 तक जारी रहा। हम यह कैसे भूल सकते हैं कि 1975 में जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगाने वाले कोई और नहीं बल्कि उमर अब्दुल्ला के दादा शेख अब्दुल्ला थे जबकि 1990 में जब इस संगठन पर प्रतिबंध लगा, तब केन्द्र सरकार में गृहमंत्री महबूबा के पिता मुफ्ती मोहम्मदसईद थे। ऐसे में उमर अब्दुल्ला तथा महबूबा द्वारा सरकार के इस संगठन का पुरजोर विरोध करना बचकाना ही लगता है। हालांकि आज घाटी में जो हालात हैं, ऐसे में जरूरत इस बात की है कि महबूबा हों या उमर, वे घाटी के भटके हुए नौजवानों को सही राह दिखाकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के गंभीर प्रयास करें किन्तु ये जिस प्रकार अपने सियासी फायदे के लिए आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े तत्वों का समर्थन कर नौजवानों के मनोमस्तिष्क में भारत विरोधी जहर भरते रहे हैं, ऐसे में समय की मांग यही है कि घाटी में अमन-चैन की बहाली के लिए भविष्य में कोई भी कठोर फैसले लेते समय ऐसे स्वार्थी सत्तालोलुप नेताओं को पूरी तरह दरकिनार किया जाए।
जिस संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया है, उस पर अक्सर आरोप लगते रहे हैं कि यह राज्य में अलगाववादी विचारधारा और आतंकवादी मानसिकता के प्रसार के लिए जिम्मेदार रहा है। यह ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की तरह का ऐसा संगठन है, जिसका प्रमुख उद्देश्य राजनीति में भागीदारी करते हुए राज्य में इस्लामी शासन की स्थापना करना माना जाता है। यह घाटी में आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार रहा है और अलगाववादी व आतंकवादी तत्वों का वैचारिक समर्थन और उनकी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में उनकी हरसंभव मदद करता रहा है। इस संगठन की करतूतों का काला चिट्ठा ऐसा है, जिससे यह आईने की तरह साफ हो जाता है कि यह किस प्रकार घाटी के युवाओं को इस्लाम के नाम पर भड़काकर उन्हें ‘जेहाद’ के नाम पर अपने अलगाववादी मंसूबों के लिए इस्तेमाल करता रहा है। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि किस प्रकार यह बेरोजगार युवाओं के हाथों में बंदूकें थमाकर उन्हें घाटी में खूनखराबे के लिए उकसाता रहा है किन्तु दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में जमात-ए-इस्लामी जैसे अलगाववादी संगठन दशकों से इसी प्रकार राजनीतिक छत्रछाया में फलते-फूलते हुए हमारे अमन-चैन के दुश्मन बने रहते हैं और हम कुछ नहीं कर पाते।
जमात-ए-इस्लामी है क्या और कब तथा कैसे इसका जन्म हुआ, यह भी जान लें। एक इस्लामी धर्मशास्त्री मौलाना अबुलअलामौदूदी द्वारा इस्लाम की विचारधारा को लेकर काम करने वाले एक संगठन ‘जमात-ए-इस्लामी’ का गठन वर्ष 1941 में किया गया था। देश की आजादी के बाद यह जमात-ए-इस्लामी पाकिस्तान और जमात-ए-इस्लामी हिंद में विभाजित हो गया। जमात-ए-इस्लामी हिंद पर अब तक राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को लेकर कोई आरोप नहीं है और कहा जाता है कि यह देश में स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण वेलफेयर कार्य करता रहा है। राजनीतिक विचारधारा में मतभेद के चलते 1953 में जमात-ए-इस्लामी हिंद से अलग होकर एक संगठन बना ‘जमात-ए-इस्लामी (जम्मू कश्मीर)’, जिसने अपना अलग संविधान बनाया और जिसकी घाटी की राजनीति अहम भूमिका रही है।
15मार्च/ईएमएस