लेख

क्या यमराज को भस्मक रोग हो गया, कोरोना क्या क्या छीनोगे ! (लेखक/ईएमएस-डॉ अरविन्द प्रेमचंद जैन)

04/05/2021

इतिहास में पढ़ा था की युद्धों में ,महामारियों में बहुतों की मौते हुई थी और रात में कभी भी दाह संस्कार नहीं होते थे पर इस करोना ने एक एक कहानी जो संक्रमित हैं या थे या होंगे की अलग अलग कहानियां हैं !यह समय दुर्दिन के हैं !इस समय उदासी ,निराशा ,हताशा ,दुःख ,शोक की लहरे हर घर ,समाज ,मुहल्ले नगर, महानगर और देश और विश्व में लहरा रही हैं !
अब इस समय में आ रहा हैं की जीवन एक हवा का झोंका हैं ,पानी का बुलबुला हैं और संसार में सब अनिश्चित हैं पर मौत निश्चित हैं वह कब कहाँ कैसे होगी यह कोई नहीं जानता !आजकल /हमेशा चाहे कोई भी हो वह मौत के चंगुल में फंसा हुआ हैं !यह अदृश्य जीवाणु ने क्या सितम ढाया हैं जो कल्पनातीत हैं !हर क्षण यमराज का चक्र /पाश चल नहीं, दौड़ रहा हैं !
यमराज को भस्मक रोग हो गया हैं ,उसकी भूख कम नहीं हो रही हैं और उसका कारण उनको उनके अनुकूल भोजन मिल रहा हैं और उनको इस समय सब उम्र के इंसान मिल रहे हैं !
जिस प्रकार अच्छी फसल या व्यवसाय के सफलता लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल ,भव, भाव निमित्त, उपादान कारकों की जरुरत होती हैं उसी प्रकार रोगाणुओं की प्रचुरता ,देश में वातावरण की अनुकूलता ,विषमकाल हैं राजा के स्वाभाव की प्रतिकूलता , और दवा विक्रेताओं ,जमाखोरों ,कार्यकर्ताओं में नैतिकता का ह्रास ,अनुकूल वातावरण न मिलना ,रोगियों की अधिकता ,व्यवस्थाओं की कमी और राजनैतिक लोगों में कटुता का भाव ,हर एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास !
कोरोना सक्रमण इतना घातक हो गया हैं की कोई किसी की मदद नहीं कर पा रहा हैं !निजी को भी निजी मदद नहीं कर पा रहा हैं , चारों तरफ दुखमय वातावरण हैं !हर क्षण मौतों के समाचारों ने सबको आंदोलित कर दिया हैं !स्वस्थ्य कब अस्वस्थ्य हो जाए और अवस्थ्य कब मौत के मुँह से समा जाए !कोई नहीं जानता !
विगत दिनों में मेरी भतीजी ,भतीज दामाद ,साढू भाईआदि और परिचित एक सप्ताह में मौत के मुँह में समां गए !पूरा परिवार उदासी के आगोश में हैं !कहीं से भी सुखदायक समाचार नहीं मिल रहे हैं !दिन भर घुटन और अशांतमय वातावरण हैं !ईश्वर की आराधना में भी क्षणिक मन लगता हैं कारण निजियों की मृत्यु से मन को एकाग्र करना बहुत कठिन होता हैं !
इस समय बहुत सावधानी की जरुरत हैं ,साथ में आत्मबल ,आत्मविश्वास के साथ सकारात्मकता की जरुरत हैं !मानव स्वाभाव असंतुलित होता हैं उसे संतुलित करने की जरुरत हैं !समता भाव जरुरी हैं !यह कहना सरल हैं पर उस पर अमल करना कठिन हैं पर उसके बिना हम क्या कर सकेंगे !जिस के ऊपर बीत रही हैं वहीँ अहसास कर सकता हैं !समानुभूति की आवश्यकता हैं
जनम मरण अरु जरा--रोग से ,सदा दुखी रहता !
द्रव्य क्षेत्र अरु काल भाव ,भव -परिवर्तन सहता !
छेदन भेदन ,नरक पशुगति ,बध बंधन सहना
राग -उदय से दुःख सुरगति में ,कहाँ सुखी रहना !
भोगि पुण्यकाल हो इकइंद्री ,क्या इसमें लाली
कुतवाली दिनचार वही फिर ,खुरपा अरु जाली
मानुष -जन्म अनेक विपतिमय ,कहीं न सुख देखा
पंचम गति सुख मिले ,शुभाशुभको मेटो लेखा !
ईएमएस/04मई2021