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(63वें महापरिनिर्वाण दिवस 06 दिसंबर पर विशेष)भारतीय संविधान के शिल्पी : बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर (लेखक-नरेन्द्र सिंह तोमर / ईएमएस)

05/12/2018


भारत में समतामूलक समाज के पक्षधर, विश्वस्तर के विख्यात विधिवेत्ता, महान राजनेता, भारतीय संविधान के जनक, दलितों, वंचितों और महिला अधिकारों के समर्थक, मानवतावादी चिंतक, विचारक, दार्शनिक, प्रखर वक्ता, विद्वान और भारत रत्न की उपाधि से अलंकृत बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन मध्य प्रांत (वर्तमान मध्य प्रदेश) के महू जिले में एक दलित परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। 16 वर्ष की छोटी उम्र में मैट्रिक परीक्षा पास करते ही उनका विवाह रमा बाई नामक किशोरी से कर दिया गया। सैनिक स्कूल में प्रधानाध्यापक, उनके पिता की इच्छा थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में व्याप्त छुआछूत, जात-पांत और संकीर्णता जैसी कुरीतियों को दूर कर सके। डॉ. भीमराव बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और अध्ययन में उनकी अगाध रूचि थी। 1912 में बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद 1913 में वे बड़ौदा के महाराजा से छात्रवृत्ति पाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका चले गये। 1913 से 1917 तक अमरीका और इंग्लैंड में रह कर उन्होंने डॉक्टरेट तथा कानून की परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं और भारत लौट आये। महाराजा बड़ौदा ने उन्हें अपना सचिव नियुक्त किया, लेकिन वहां छुआछूत और भेदभाव के अपमान को सहन न कर पाने के कारण पद छोड़कर मुम्बई में अध्यापन कार्य में लग गये। इसके बाद बाबासाहेब ने वकालत शुरू की। उन्होंने अस्पृश्यता के विरूद्ध संघर्ष करने का संकल्प लेते हुए साप्ताहिक पत्रिका मूक नायक का प्रकाशन शुरू किया। इस पत्रिका में दलितों की दशा और कल्याण के बारे में प्रकाशित उनके लेखों का भारतीय दलित वर्ग और शिक्षित समाज पर गहरा असर पड़ा।
बाबासाहेब ने भारत में अस्पृश्य समाज के राजनीतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की पुरजोर वकालत की। दलित वर्ग के एक सम्मेलन के दौरान उनके भाषण से कोल्हापुर राज्य के स्थानीय शासक शाहू चतुर्थ बेहद प्रभावित हुए और उनका अंबेडकर जी के साथ भोजन करना रूढिवादी समाज में हलचल का कारण बन गया। बाबासाहेब ने दलित वर्गों के बीच शिक्षा के प्रसार और उनके सामाजिक उत्थान के लिए बहिष्कृत हितकारिणी सभा की भी स्थापना की।
बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर एक प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे। उन्होंने कहा था कि 'हम सबसे पहले और अंत में भारतीय हैं।' वे हमारे संविधान के प्रमुख शिल्पकार थे। सामाजिक अन्याय, अत्याचार और असमानता के उन्मूलन के लिए उन्होंने संविधान के मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों का बड़ा तोहफा भारत और उसकी जनता को सौंपा, ताकि सही अर्थों में सामाजिक लोकतंत्र, समरसता और सामाजिक समानता का स्वप्न साकार हो सके। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में नागरिकों के प्रति देश के सकारात्मक उत्तरदायित्वों को समाहित किया गया। इनका उद्देश्य उस सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र को सुनिश्चित करना है, जिसे संविधान में वर्णित मूल अधिकारों द्वारा संरक्षण प्राप्त है। डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा था – 'हम जिन्हें नीति-निर्देशक सिद्धांत कहते हैं, वह सामान्यत विधायिका और कार्यपालिका के लिए इन निर्देशों के तंत्र का ही दूसरा नाम है कि उन्हें अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किस तरह करना चाहिए ?' उन्होंने अपने गहन अध्ययन और उच्चकोटि की तार्किक एवं विश्लेषणात्मक क्षमता के आधार पर सामाजिक बुराइयों के प्रति आलोचनात्मक चिंतन और सटीक मूल्यांकन प्रस्तुत किया, जो कि आगे आने वाली पीढ़ी के लिए हमेशा मार्गदर्शक तथा प्रेरणा स्रोत के रूप में काम करता रहेगा। उनका मानना था कि सामाजिक परिवर्तन के लिए दलितों और कमजोर वर्गों के बीच शिक्षा की समुचित व्यवस्था तथा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का होना बहुत आवश्यक है। डॉ. अंबेडकर भारतीय महिलाओं की उन्नति के लिए बड़े पैमाने पर प्रगतिशील कदम उठाने के पक्षधर थे। हिन्दू कोड बिल जैसे प्रगतिशील कदम के जरिए वे पुरुष प्रधान संस्कृति पर प्रहार करते हुए सभी महिलाओं को पुरुषों के बराबर कानूनी अधिकार देकर गौरवान्वित करना चाहते थे। इस बिल में हिन्दू महिलाओं को विवाह, तलाक आदि में पुरुषों जैसा ही हक दिया गया था। उन्होंने कहा था कि 'मैं किसी समुदाय की प्रगति महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति से नापता हूं।'
बाबासाहेब ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द पर बल देते हुए कहा था कि सांप्रदायिक मुद्दे कनाडा जैसे देशों में भी हमेशा से रहे हैं, पर आज भी अगर अंग्रेज और फ्रांसीसी प्रेमभाव से एक साथ रहते हैं, तो हिन्दू और मुसलमान एक साथ सौहार्द के साथ क्यों नहीं रह सकते। गांधीजी और कांग्रेस के कटु आलोचक होने के बावजूद डॉ. अंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विधिवेत्ता के रूप में थी । यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार ने उन्हें देश का प्रथम विधि एवं न्याय मंत्री बनाया। 29 अगस्त, 1947 को डॉ. अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नये संविधान की रचना के लिए गठित संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। बाबासाहेब ने भारतीय संविधान को आकार देने के लिए भले ही पश्चिमी मॉडल का आधार लिया है, लेकिन उसकी मूल भावना विशुद्ध रूप से भारतीय है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से नागरिकों को व्यापक स्वतंत्रता की सुरक्षा दी है। इसमें धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत, हर तरह के भेदभाव पर रोक, महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के उपाय, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए स्कूलों तथा कॉलेजों में प्रवेश तथा नौकरियों और सिविल सेवाओं में आरक्षण प्रणाली की गारंटी दी गयी, ताकि सामाजिक तथा आर्थिक असमानताओं को जड़ से मिटा कर दलित और वंचित वर्ग को हर क्षेत्र में प्रगति के लिए समान अवसर उपलब्ध कराए जा सकें। 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा द्वारा संविधान को अंगीकृत किए जाने के बाद डॉ. अंबेडकर ने अपने भाषण में कहा था कि 'मैं महसूस करता हूं कि भारतीय संविधान साध्य और लचीला होने के बावजूद इतना मजबूत भी है कि यह देश को शांति और युद्ध दोनों समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में मैं कह सकता हूं कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था, बल्कि इसका उपयोग करने वाले की नीयत में खोट था।' इस अवसर पर उन्होंने यह भी कहा था कि 'यदि मुझे लगा कि संविधान का दुरुपयोग किया जा रहा है तो इसे मैं ही सबसे पहले जलाऊंगा।'
सन् 1950 के दशक में अंबेडकर जी बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध भिक्षुओं के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका गये । 1955 में उन्होंने भारतीय बौद्ध महासभा अर्थात बौद्ध सोसायटी ऑफ इंडिया की स्थापना की । 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अंबेडकर जी ने औपचारिक समारोह में एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से बौद्ध धर्म की दीक्षा ली ।
अपनी अंतिम पांडुलिपि द बुद्ध एंड हिज धम्म को पूरा करने के तीन दिन बाद 06 दिसम्बर, 1956 को नई दिल्ली में नींद के दौरान ही उनका निधन हो गया।
डॉ. अंबेडकर के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन तथा सुधारों का आधुनिक भारत पर गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। उन्हें व्यक्ति की स्वतंत्रता में अटूट विश्वास था। वे सामाजिक स्वतंत्रता के भी प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने कहा था कि 'जब तक आप व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता हासिल नहीं कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है, वो आपके लिए बेमानी है।'
धर्म की प्रकृति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था कि 'मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है ।' कानून और व्यवस्था के बारे में उनका दृष्टिकोण अत्यन्त संतुलित था, जिसकी मिसाल उनके इस कथन में मिलती है कि 'कानून और व्यवस्था राजनीतिक शरीर की औषधि है और जब राजनीतिक शरीर बीमार पड़े, तो दवा जरूर दी जानी चाहिए।'
बाबासाहेब ने महापुरूषों और ख्याति प्राप्त बड़ी हस्तियों के बीच सुस्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींचते हुए कहा था कि 'ए ग्रेट मैन इज डिफरेंट फ्रॉम एन एमिनेंट वन इन दैट ही इज आल्वेज रेडी टु बी द सर्वेंट ऑफ द सोसायटी – अर्थात एक महापुरूष एक लब्ध-प्रतिष्ठ व्यक्ति से इस मामले में भिन्न होता है कि वह हमेशा तत्पर रहता है समाज का सेवक बनने के लिए।'
डॉ. अंबेडकर का सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चिंतन समतामूलक दृष्टिकोण पर आधारित था और वस्तुत यही आज के समय की मांग भी है। समाज के वंचित वर्गों के कल्याण और उत्थान से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानता तथा भेदभाव दूर किया जा सकता है। डॉ. अंबेडकर का विश्वास था कि आर्थिक और सामाजिक न्याय के बिना, केवल राजनीतिक आजादी से राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत नहीं किया जा सकता। प्रसन्नता की बात यह है कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार डॉ. भीमराव अंबेडकर की 125वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में 14 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वाकांक्षी ग्रामोदय से भारत उदय अभियान संचालित करने जा रही है। इसके माध्यम से अंबेडकर जी के संकल्प को गांव-गांव और जन-जन तक ले जाकर लोगों के बीच सामाजिक समरसता, समानता और पारस्परिक सदभाव
की नई चेतना जाग्रत करने और दलितों के नायक बाबासाहेब के सपनों को साकार करने की दिशा में सार्थक पहल की जा रही है। भारतीय लोकतंत्र को आधार देने में डॉक्टर अम्बेडकर का अद्वितीय योगदान भुलाया नहीं जा सकता। सामाजिक न्याय के लिए प्राण-पण से संघर्ष करने वाले महापुरुष के रूप में उनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। वस्तुत अगर डॉक्टर अम्बेडकर को भारतीय संविधान का मुख्य शिल्पी या जनक कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
लेखक केंद्रीय मंत्री हैं।)
ईएमएस / 05 दिसम्बर