लेख

(विचार-मंथन) बिहार में किसकी सरकार (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

25/09/2020


चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की तारीखों का एलान कर दिया है। बिहार में इस बार चुनाव का समय बढ़ा दिया गया है, इस बार चुनाव के लिए मतदान सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक होगा। वहीं कोरोना के मरीजों को मतदान करने के लिए अंत में समय दिया गया है। इस बार सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक मतदान किया जाएगा। हालांकि नक्सल प्रभावित इलाकों में ऐसा नहीं किया जाएगा। घर से घर तक कैंपेन के लिए सिर्फ पांच लोगों को अनुमति दी गई है। नामांकन के दौरान केवल दो लोग ही जगह पर मौजूद रहेंगे और इसके अलावा प्रचार के दौरान नेताओं या कार्यकर्ताओं को हाथ मिलाने की इजाजत नहीं है। बिहार में कुल 243 सीटों पर चुनाव लड़ा जाना है। राज्य में 29 नवंंबर को विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाएगा। कोरोना को ध्यान में रखते हुए पोलिंग बूथ की संख्या और मैनपावर को बढ़ाया गया है। चुनाव के दौरान छह लाख पीपीई किट का इस्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा 46 लाख मास्क, सात लाख हैंड सैनिटाइजर और छह लाख फेस शील्ड का इस्तेमाल किया जाएगा।
2015 के चुनाव में सबसे ज्यादा 25 फीसदी वोट शेयर भाजपा का था, लेकिन सीटें 53 ही जीत सकी थी। 2010 के मुकाबले भाजपा का वोट शेयर 8 फीसदी तक बढ़ा था, लेकिन सीटें घट गई थीं। 2010 में भाजपा ने 16.5 फीसदी वोट शेयर के साथ 91 सीटें जीती थीं। महागठबंधन में जाने का सबसे बड़ा खामियाजा नीतीश की जदयू को ही भुगतना पड़ा था। वो इसलिए क्योंकि 2010 की तुलना में 2015 में जदयू का न सिर्फ वोट शेयर घटा, बल्कि सीटें भी कम हो गईं। 2010 के चुनाव में जदयू ने 22.6 फीसदी वोट शेयर के साथ 115 सीटें जीती थीं और 2015 में 17.3 फीसदी वोट शेयर के साथ 71 सीटें ही जीत सकी थीं। इस बार का चुनाव कई मायनों में खास होगा। एक तो यह चुनाव कोरोना काल में होगा, वहीं कई मुद्दे सरकार की परीक्षा लेंगे। हालिया 10-15 साल के दौरान हुए लोकसभा और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो बेरोजगारी के मुद्दे को किसी भी दल ने तवज्जो नहीं दी। ज्यादातर चुनावों में निजी हमले, सांप्रदायिक रंग, आरक्षण, विकास आदि की बातें मुद्दे बनते रहे हैं। लंबे समय बाद बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्य विपक्षी दल आरजेडी बेरोजगारी को मुद्दा बनाने की कोशिश में है। दरअसल, कोरोना वायरस की वजह से लागू हुए देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से बिहार में करीब 26 लाख युवा लौटे हैं। इन लोगों के सामने रोजी-रोटी का संकट है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव बेरोजगारी को मुद्दा बनाने की कोशिश में हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद में कृषि सुधार बिल पास किया है। सरकार इसे किसानों के लिए सबसे बड़ा चेंज मान रही है तो विपक्ष इसे किसानों का सबसे बड़ा दुश्मन बताकर प्रचार कर रहा है। पिछले दो चुनावों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग करते देखे गए थे, लेकिन बीजेपी के साथ दोबारा गठबंधन होने के बाद उन्होंने इस मुद्दे को भुला दिया है। अब आरजेडी इस मुद्दे का थाम चुकी है। बिहार विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा भी बड़ा मुद्दा साबित हो सकता है। एनडीए खेमा का चेहरा सुशासन बाबू कहे जाने वाले नीतीश कुमार हैं, वहीं विपक्ष में तेजस्वी यादव हैं। अनुभव के हिसाब से दोनों चेहरों में बड़ा अंतर है। इसके अलावा नीतीश कुमार की साफ सुथरी छवि है, वहीं तेजस्वी यादव और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। खुद की परिवार से अलग छवि गढऩे के लिए तेजस्वी यादव ने चुनाव पोस्टरों से पिता, मां, बहन सभी को हटा दिया है। एनडीए खेमा इसी को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। इस बार के विधानसभा चुनाव प्रचार में नेताओं की जुबान पर सुशांत सिंह राजपूत, हरिवंश, रघुवंश प्रसाद जैसे नाम दिखेंगे। एनडीए खेमा इसे जोरशोर से उठा रहा है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत की सीबीआई जांच को एनडीए खेमा अपनी उपलब्धि बता रहा है। इतने सारे मुद्दों और बातोंं के बीच बिहार की बाजी किसके हाथ लगेगी, यह 10 नवंबर को पता चल जाएगा, जब मतगणना के नतीजे आएंगे, तब तक तो बिहार की राजनीति पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचती रहेगी।
25सितम्बर/ईएमएस