लेख

अस्मिता की खातिर - स्वतंत्रता की एक और अलख (लेखक- राकेश कुमार वर्मा / ईएमएस)

14/08/2019

आज हम 73 वे स्वतंत्रता दिवस में प्रवेश के साथ अतीव गौरव महसूस कर रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बावजूद अपने ही देश में शरणार्थियों समान जीवन जीने को विवश उन कश्मीरियों के साथ हम अपनी आजादी का जश्न मना रहे हैं जिसकी विशिष्ट पहचान अनुच्छेद 370 के कारण लालचैक लालकिले की परिधि से धुंधला नजर आता था। इसके साथ ही इस अनुच्छेद की आड़ में अलगाववादियों को तुष्ट करने वाले तंत्र का अंत हो गया। इस भाव के अभाव पर वर्षों से अपनी जमीन तैयार कर रहे राजनीतिक और सांस्कृतिक संगठन ने ऐसा साहसिक निर्णय लिया जिसने जन-जन में आत्मगौरव की अलख जगाई। सोशल मीडिया पर क्या आपको कश्मीर में प्लाट मिलेगा, अथवा वहां विवाह करने जैसे कथन अपने ही दांतों से स्वयं की जीव्हा को आहत करने जैसा है। कश्मीर पर आये फैसले ने कन्याकुमारी तक तादात्म्य उत्साहित जन को जिस तरह एकसूत्र में पिरोया, वह बताता है कि प्रतीकों और अधिकारों का अपना महत्व है। इस परिप्रेक्ष्य में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पहल उल्लेखनीय रही जिसने वर्ष 1990 में एक देश में दो विधान, दो निशान के विरुद्ध बड़ा आन्दोलन तैयार किया। उस समय छात्र-छात्राओं के जनसैलाब का उत्साह देखते ही बनता था। इससे पहले तत्कालीन संगठन मंत्री सालिगराम तोमर के नेतृत्व में कश्मीरी छात्रों का उद्बोधन हमें वहां की कटु वास्तुस्थिति से अवगत कराने के लिए पर्याप्त था, जिसने हमें कुरुक्षेत्र में कूदने को प्रेरित किया। अब कश्मीर से अलगाववादियों और आतंकवादियों के पतन का समय आ गया है। भारतीय सैनिकों के दुश्मन, भारत को चुनौती देने वाले जिस अलगावाादी बुरहानवानी को संयुक्तराष्ट्र महिमामण्डित करता आ रहा था उसके दंश से आहत संपूर्ण भारत के जन का प्रधानमंत्री मोदी से यही अपेक्षा थी । एक व्यक्ति खेत का हल, कारखाने की मशीन अथवा कम्प्यूटर का पटल मात्र नही हो सकता अपितु उसके अंदर राष्ट्रप्रेम की भावनाओं से परिपूर्ण धड़कता एक दिल भी होता है। क्योंकि, हमें रोजी-रोटी के साथ गर्व से जीने का संबल भी चाहिये।
हाल ही में संपन्न मतदान के दौरान मतदाता जागरुकता एक विप्लव की तरह सामने आया। लेकिन कर्नाटक का घटनाक्रम, इस दिशा में पुनर्विचार की ओर उद्यत करता है। यह हमारे उस तिलिस्म को तोड़ता है जिसमें एक निर्धारित विचारधारा के पल्लवन निमित्त हमारा मत अहम भूमिका निभाता है। लेकिन ठगी हुई जनता, घटना से नेता रूपी अपने वोटों का दल-बदल देख चुकी है। सदन में विश्वासमत की परीक्षाओं का यह दौर जिसमे नेतागण बाजार में वस्तु की भांति बिककर लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप पर कुठाराघात किया है। चाहे वह पचास के दशक का केरल हो अथवा नब्बे का झारखण्ड। देश में वैचारिक विरासत के वर्चस्व के लिए अथवा राजनीति में विचारधारा और नैतिकता को रौंदने के खिलाफ जनता को एकजुट खड़े होने का समय आ चुका है। अतएव मतदाता को नहीं अपितु यह समय राजनीतिक दल के जागरण का है।
इस तंत्र का दुःखद पहलू यह है कि इसरो मिशन सहित तमाम विकासशील परिणामों के बावजूद चिकित्सा, शिक्षा, पोषण और जीवनमूल्यो के क्षरण की जो भयावह स्थिति हमारे सामने है उसके सार्थक परिणाम के लिए संघर्ष करना होगा। चिकित्सा, पोषण और आवश्यक तकनीक के अभाव में सीवेज टैंको में मरते मजदूर, बिगड़ते पर्यावरण पर पुख्ता नीति के अभाव में हमारा कर्तव्य अभी लंबी लड़ाई के लिए प्रेरित करता है।
14अगस्त/ईएमएस