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गुरु नानक देव ने फ़ैलाया ज्ञान का प्रकाश! (लेखक-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट / ईएमएस)

30/11/2020


अंधविश्वास और आडंबरों को दूर कर ज्ञान का प्रकाश सारे जगत में फैलाने वाले गुरु नानक का प्रकाश उत्सव यानि अवतरण दिवस कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है, हालांकि उनका वास्तविक जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ था। गुरु नानक देव पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर एक किसान के घर जन्मे थे। उनके माथे पर शुरू से ही तेज आभा बनी हुई थी। तलवंडी जो अब पाकिस्तान के लाहौर से 30 मील दूर पश्चिम में स्थित है, गुरु नानक का नाम साथ जुड़ने के बाद ननकाना कहलाया। गुरु नानक के प्रकाश उत्सव पर प्रति वर्ष भारत से सिख श्रद्धालुओं का जत्था ननकाना साहिब जाकर वहां अरदास करता है।
बचपन में जब नानक देव के अन्य साथी बच्चे खेल कूद में व्यस्त होते थे तो वह अपने नेत्र बंद कर चिंतन मनन में खो जाते थे। यह देख उनके पिता कालू एवं माता तृप्ता चिंतित हो जाते थे। उनके पिता ने पंडित हरदयाल के पास उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा ,लेकिन पंडितजी बालक नानक के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाते और वे उनके ज्ञान व प्रतिभा को देखकर समझ गए कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर इस संसार में भेजा है। नानक को मौलवी कुतुबुद्दीन के पास पढ़ने के लिए भी भेजा गया लेकिन वह भी नानक के प्रश्नों से निरुत्तर हो गए। अन्ततः नानक देव ने घर बार छोड़ दिया और दूर देशों में भ्रमण करना शुरू किया। इससे उपासना का सामान्य स्वरूप स्थिर करने में उन्हें बड़ी सहायता मिली। उन्होंने कबीरदास की 'निर्गुण उपासना' का प्रचार पंजाब से आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु बन हुए।
गुरु नानक देव का विवाह सन सन1485 में बटाला निवासी कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द हुए। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु यह सारे प्रयास नाकाम साबित हुए। उनके पिता ने उन्हें घोड़ों का व्यापार करने के लिए जो राशि दी थी, वह भी नानक जी ने साधु सेवा में लगा दी। कुछ समय बाद नानक जी अपने बहनोई के पास सुल्तानपुर चले गये। वहां वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत खां के यहां मादी रख लिये गये। नानक जी अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करते थे और जो भी आय होती थी, उसका ज्यादातर हिस्सा साधुओं और गरीबों को दे देते थे।
सिख ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि गुरु नानक नित्य बेई नदी में स्नान करने जाया करते थे। एक दिन वे स्नान करने के पश्चात वन में अन्तर्ध्यान हो गये। उस समय उन्हें परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। परमात्मा ने उन्हें अमृत पिलाया और कहा− मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं, जो तुम्हारे सम्पर्क में आयेंगे वे भी आनन्दित होंगे। जाओ दान दो, उपासना करो, स्वयं नाम लो और दूसरों से भी नाम स्मरण कराओ। इस घटना के पश्चात वे अपने परिवार का भार अपने श्वसुर को सौंपकर विचरण करने निकल पड़े और धर्म का प्रचार करने लगे। उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों के साथ ही विदेशों की यात्राएं भी कीं और जन सेवा का उपदेश दिया। बाद में वे करतारपुर में आकर बस गये और सन1521 ई. से सन1539 ई. तक वहीं रहे।
गुरु नानक देव ने जात−पांत को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए 'लंगर' प्रथा शुरू की । लंगर में सब छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही है, जहां हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। इस में सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है। गुरु नानक देवजी का जन्मदिन प्रतिवर्ष गुरु पूर्व के रूप में मनाया जाता है। तीन दिन पहले से ही प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं। जगह−जगह भक्त लोग पानी और शरबत आदि की व्यवस्था करते हैं। गुरु नानक जी का निधन सन सन1539 ई. में हुआ। उन्होंने गुरुगद्दी का भार गुरु अंगददेव (बाबा लहना) को सौंप दिया थाऔर स्वयं करतारपुर में 'ज्योति' में लीन हो गए।
गुरु नानक जी ने अपने अनुयायियों को दस उपदेश दिए जो कि सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। नाम−स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत−प्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को जीवन की दस शिक्षाएं दीं जो यहां प्रस्तुत हैं,
ईश्वर एक है,सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है। ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता।ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए। बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं। सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए। मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। भोजन शरीर को जि़ंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ−लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।गुरु नानक देव की दी हुई शिक्षा से समाज मे व्यापक जागृति आई और वे सिर्फ सिख धर्म ही नही सम्पूर्ण समाज के प्रेरक बने।उन्हें शत शत नमन।
30नवंबर/ईएमएस