लेख

जैन समाज की धरोहरों पर प्रभुत्व (लेखक - डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

09/11/2018


भारतीय संस्कृति सर्वधर्म समवाय पर आधारित हैं उसका कारण यहाँ बहुत धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ और सब धर्मों को राज्याश्रय प्राप्त हुआ जिससे उन धर्मों का विकास हुआ। ईशा पूर्व से अनेक राजाओं ने जैन धरम को अंगीकार किया और उन्होंने जैन धरम का विकास ,संरक्षण किया। उनके कार्यकाल में जिन मंदिरों , जैन शास्त्रों ,जैन विद्वानों और समाज को सुरक्षा प्रदान की। जिसका प्रतिफल आज भारत वर्ष और उसके बाहर भी जैन मूर्तियां और जैन मंदिरों की उपलब्धता हैं। जिसका कारण एक समय जैन धरम राजधरम था। तत्समय कुछ विघ्न संतोषियों ने जैन मुनियों ,मंदिरों ,शास्त्रों और जैन परिवार को ईर्ष्या वश बहुत नुक्सान पहुंचाया। ऐसे भी अभिलेख मिले हैं जब विजातियों ने बहुमूल्य ग्रंथों को जानबूझकर नष्ट किये ,जलाये और शास्त्रार्थ के बहाने जैन संस्थाओं पर आधिपत्य किया और जैन स्मृतियों को नष्ट किया पर पूर्णतः सफल न होने से अभिशेष अभी भी उपलब्ध हैं।
जैन धरम मूलतः अहिंसा प्रधान और वीतराग पर आधारित हैं। समय की अनुकूलता और प्रतिकूलता में अहिंसा का शस्त्र अपनाकर कोई विरोध नहीं किया। एक समय देश के अनेक प्रांतों में जैन शासको का शासन होने के बाद अन्य धर्मियों को कभी परेशां नहीं किया। जिस कारण जैन आबादी क्रमशः कम होती गयी पर जैन समाज में शिक्षा का प्रतिशत ९९ % है और देश के अर्थ व्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान हैं।
बात इस समय हिन्दू धरम के राम मन्दिरनिर्माण में जो बाबरी मस्जिद से जो विवाद हो रहा हैं उसका कारण दोनों पक्ष बहुत बलशाली और आपस में विरोधी होने से बराबरी से संघर्षरत हैं और कोई भी हल नहीं निकल पा रहा हैं ,पर जैन समाज आजकल अल्पसंख्यक होने से जैनियों के हजारो मंदिर ,धर्मस्थल पर अन्य समाज ने अपना कब्ज़ा कर लिया और उस पर आधिपत्य कर लिया हैं जिसके ज्वलंत उदाहरण तिरुपति बालाजी का मंदिर, जैन मंदिर हैं जिसमे भगवान् नेमिनाथ की मूर्ति विराजित हैं। इसी प्रकार बद्रीनाथ के मंदिर में जैन तीर्थकंर ऋषभनाथ की मूर्ति हैं , इसके अलावा कोल्हापुर का मीनाक्षी मंदिर, जैन मंदिर हैं जिसके प्रमाण वहां उपलब्ध हैं वर्त्तमान में शबरीमाला का मंदिर जो की पूर्ण जैन मंदिर हैं वहां पर स्थापित मूर्ति भगवान पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति हैं (संदर्भ --टाइम्स ऑफ़ इंडिया दिनांक ४ नवंबर २०१८ पेज नंबर १०) पर इस बात की पुष्टि की हैं क्योकि जो सर्प का चिन्ह हैं वह भगवान् पार्श्वनाथ की मूर्ति को इंगित करता हैं। जैन समाज यह सब जानते हुए भी कभी नहीं चाहती की वह ऐसे विवादित स्थान के लिए अपना हक़ मांगे। कारण यह आस्था का प्रश्न हैं और जैन मुर्तिया पूर्ण रूप से दिगम्बर रहती हैं इसलिए उनको पहचानने में कोई परेशान नहीं होती हैं पर जिन मूर्तियों पर पहनावा। श्रृंगार किया जाता हैं वहां संदेह होना स्वाभाविक होता हैं। जैन समाज इस बात से खुश हैं की इस बहाने जैन तीर्थंकर का पूजन अभिषेक होकर उनकी अभिलाषाएं पूरी हो रही हैं। हम कोई भी मंदिर /स्थान की मांग नहीं करते कारण वह स्थान मिलना असंभव हैं। कारण एक सुई की नौक बराबर जमीन के लिए महाभारत हुआ था ! हम चाहते हैं की उस स्थल पर इस बात का उल्लेख जरूर किया जावे की इस स्थल में स्थापित मूर्ति जैन मूर्ति हैं। इससे जनता में कोई भ्रान्ति न होगी और उनकी आस्था बरक़रार रहेगी।
आजकल जैसे कई तीर्थ जैसे गिरनार पर्वत पर अन्य मताबलम्बियों द्वारा उस पर ज़बरन कब्ज़ा किया जा रहा हैं जहाँ से भगवान नेमिनाथ मोक्ष गए थे सम्मेद शिखर पर भी शासन की कुदृष्टि हैं जहाँ से २० तीर्थंकर मोक्ष गए थे ,यह जैन समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण तीर्थ क्षेत्र हैं पर उन पर भी कुचक्र चलाकर उसकी शुचिता को नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा हैं। यह दावा नहीं बलिक सच्चाई हैंआज जहाँ भी खुदाई होती हैं एक न एक जैन मूर्ति अवश्य निकलती हैं उसका कारण एक समय जैन राजा महाराजाओ काएवं जैन धरम का बाहुल्य इस देश में रहा था।
जैन धरम अनादि निधन धरम हैं ,इसके संस्थापक आदिनाथ /ऋषभदेव भगवान रहे हैं जिनके ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम से भारतवर्ष नाम पड़ा और भगवान बाहुबली की अदुतीय मूर्ति गोमटेश्वर में विराजित हैं और वर्तमान में चौबीसवें तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी का शासन काल चल रहा हैं जिनका निर्वाण पावापुरी से दीवाली के दिन सुबह हुआ था।
आज भी यत्र तत्र सर्वत्र जैन शिलालेख उपलब्ध हैं ,और जैन मूर्तियां अतिशयकारी होती हैं और वीतरागता की प्रतीक होती हैं। इसीलिए जैन समुदाय विवाद में नहीं रहता ,जबकि जैन तीर्थकर सभीक्षत्रिय रहे ,जैन वास्तव में क्षत्रीय हैं पर व्यवसाय के कारण वणिक माने जाने लगे। पर हैं मूलतः क्षत्रिय। इसलिए कोई यह नहीं समझे की वणिक होने से कमजोर हैं पर हैं क्षत्रिय ,अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं हैं। अहिंसा का अर्थ हिंसा का डटकर मुकाबला करो और विजयी हो।
इसिलए जितने भी जैन मंदिर हैं उनमे यह पट्टिका जरूर लगये की यहाँ जैन मूर्ति स्थापित हैं और कुछ नहीं। तथा अन्य समाज जैन मंदिरों को अपनी संस्था न बनाये या बताये.यही हैं भारतीय संस्कृति का प्रतीक ,.
09नवंबर/ईएमएस