लेख

संकट को बढ़ाते शराब और पेट्रोल के बढ़ते दाम (लेखिका-डा. नाज़परवीन / ईएमएस)

22/05/2020


कोरोना संकट ने केवल मानव स्वास्थ्य की चिन्ता नहीं बढाई, बल्कि अपने साथ दबे पांव कई और समाजार्थिक संकट ले आया है। ऐसे में पहले से गिरती जी.डी.पी. भविष्य में कई चुनौतियां तैयार कर सकती है। प्रत्येक राज्य की सरकारें देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयास में लगी हैं। समूचा भारत 22 मार्च से बंद पडा है, देश के काम-धन्धे ठप्प है, ऐसे में तीसरे चरण के लाॅकडाउन में भारत सरकार द्वारा कुछ राहत देने की बात कही गयी, जिसमें शराब खरीद की छूट अहम थी पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में एक सा नज़ारा देखने को मिला लोगों का इतना विशाल हुजूम शायद आज से पहले शराब के लिए लाइन में खडा पहले किसी ने नहीं देखा था।
शराब और पेट्रोल बिक्री राज्य और के्रन्द सरकार के प्रमुख राजस्व स्त्रोत हैं। बीते वर्ष सितम्बर में भारतीय रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर राज्यों में कुल टैक्स राजस्व का लगभग 10-15 प्रतिशत हिस्सा शराब पर लगने वाले राज्य उत्पाद शुल्क से आता है, संम्भवतः इसी कारण राज्यों ने शराब को वस्तु एवं सेवाकर के दायरे से बाहर रखा है। दिल्ली सरकार ने शराब की बिक्री पर स्पेशल कोरोना शुल्क लगाने की द्योषणा की है। जिससे दिल्ली में शराब की कीमत काफी बढ़ जाएगी। लाॅकडाउन में शराब बिक्री पर आन्ध्रप्रदेश ने 75 फीसदी, दिल्ली ने 70 फीसदी और उत्तरप्रदेश एवं हरियाणा ने शराब की बोतल के हिसाब से टैक्स लगाया है। शराब के साथ-साथ पेट्रोल के दामों में भी तेजी से टैक्स का बढाया जाना वो भी ऐसे समय जब देश में लोगों के पास आमदनी नहीं है और दुनिया भर में तेल की कीमतों में तेजी से कमी देखी जा रही है। राज्य सरकारों ने पेट्रोल और डीजल में जहां वैट बढाया है, वही केन्द्र सरकार ने भी एक्साइज ड्यूटी बढा दी है परिणाम स्वरूप लगभग 18 रू. में मिलने वाला पेट्रोल आम आदमी तक पहुंचते-पहुंचते 70-75 तक का हो गया है। शराब पर बढे हुए टैक्स का भले ही आम-जनमानस पर खासा असर न पडे, लेकिन पेट्रोल और डीजल आम आदमी का तेल निकालने वाले साबित होंगे। ज्यों ही टृांसपोर्ट की लागत बढेगी उसका असर उपभोक्ता तक पहुंचने वाले सामान की कीमत पर भी पडने लगेगा, जिससे आम आदमी का बोझ और बढ जाएगा। हालांकि शराब और पेट्रोल दो ऐसे आमदनी के साधन हैं, जिससे सरकार को आर्थिक संकट के दौर में काफी राहत हो सकती है।
कोरोना संकट के काल में जब दुनिया घरों में कैद है, महिला हिंसा के केस लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में शराब की अंधा-धुंध बिक्री हिंसा, मारपीट, छीना-झपटी, लूटमार जैसी गतिविधियों को बढाने वाला साबित हो सकता है, जिसकी सबसे बडी शिकार महिलाएंे होंगी। आम दिनों से लाॅकडाउन के समय महिलाओं पर हिंसात्मक घटनाएंे बढ़ गयी हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग घरों पर हैं, ऐसे में वो महिलाऐं जो अपनी समस्याओं को समाज के सामने रखने में हिचकती हैं, अब तो उनकी हालात और भी दुशवार साबित होने वाली है। आलम यह है कि महिला हेल्पलाइन व पैनल अधिवक्ताओं के सामने प्रतिदिन 3-4 मामले दर्ज किये जा रहे हैं। जबकि कई महिलाऐं शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रही, जो हिंसा से आत्महत्या तक को बढावा देता है। पिछले वर्ष अप्रैल में लगभग 50 केस दर्ज किए गए थे। इसबार अप्रैल में इनकी संख्या बढ़कर लगभग 100 हो गई है। लॉकडाउन में लगातार हिंसा और मानसिक रोगों की संख्या बढ रही है। पारिवारिक कलह बच्चों को भी अपना शिकार बना रही है। शराब से समाज में जहां अशांति का माहौल बरपाने का खतरा है, वही परिवार टूटने का भी खतरा कम नहीं है। यकीनन शराब सरकारों के आर्थिकी सुधार करने का सबसे अच्छे साधनों में से एक हो सकती है, लेकिन चिंता इस बात भी होनाी चाहिए कि इससे काफी कुछ बर्बाद हो रहा है। संकट के इस घडी में जहां लोगों के पास काम नहीं है, पैसे नहीं है, शराब की लम्बी कतारे गरीब महिलाओं की चूल्हें की आग को और ठण्डा करती नज़र आ रही है। हालांकि देश के कई हिस्से गुजरात, बिहार, मणिपुर, नागालैण्ड, लक्षद्वीप में अभी भी शराबबंदी लागू है। लेकिन शराब की लम्बी कतारे समाज चिन्तन के लिए प्रश्न छोडती हैं।
संकट के दौर में तमाम राज्य सरकारों को केन्द्र सरकार से सलाह करके आर्थिक संकट से निपटने की और भी राहे खोजनी चाहिए। सरकारों को आय के दूसरे स्त्रोंतो को बढावा देना चाहिए जैसे- संपत्ति कर, भू-राजस्व, टिकट और पंजीकरण शुल्क, कुछ फास्ट फूड पर स्पेशल टैक्स लगा कर, जैसा कि हंगरी और मैक्सिकों के द्वारा किया गया था। इसके अलावा सरकार अपने कुछ अनावश्यक खर्चो पर भी कटौती कर सकती है। सरकार कोविड प्रभावित स्विट्जरलैंड, कनाडा, जर्मनी, डेनमार्क, जापान आदि देशों की आर्थिक प्लानिंग से सीख ले सकती है। जिससे भारत इस महासंकट से आसानी से निकल पाएगा।
22मई/ईएमएस