लेख

(विचार मंथन) छवि बदल रहे टीपू (लेखक-ईएमएस/सिद्धार्थ शंकर)

14/05/2022

यूपी विधानसभा चुनाव के बाद सपा में मुस्लिम नेताओं का अखिलेश के प्रति जो रवैया बाहर आया, उसकी तस्वीर अब साफ होने लगी है। सपा के कई मुस्लिम नेताओं ने अखिलेश पर मुसलमान विरोधी होने का आरोप लगाया है। कहा जा रहा है कि अखिलेश अब सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति पर आगे बढऩा चाहते है। इस रणनीति के तहत यूपी चुनाव में उन्हें फायदा भी मिला है। अब अखिलेश की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि का बड़ा उदाहरण सामने आया है। रमजान के माह में सपा ने अपनी कार्यशैली को बदलते हुए आधिकारिक रूप से इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं किया। अखिलेश सपा के दूसरे नेताओं की ओर से आयोजित पार्टियों मेंं गए लेकिन जालीदार टोपी से परहेज किया। अब इसके मायने भी तलाशे जा रहे हैं। दरअसल, कोरोना महामारी से पहले सपा हर साल इफ्तार पार्टी का आयोजन करती रही है। मुलायम सिंह यादव के दौर से चली आ रही परंपरा को अखिलेश भी बखूभी निभाते रहे। लेकिन कोरोना महामारी में इसका आयोजन नहीं हो पाया। इस संक्रमण के काबू में होने की वजह से उम्मीद की जा रही थी कि मुसलमानों के एकतरफा वोट पाने वाले अखिलेश यादव समुदाय के लिए शानदार इफ्तार का आयोजन करेंगे। लेकिन लोग इंतजार ही करते रह गए। हां, पार्टी के कुछ नेताओं की ओर से आयोजित इफ्तार में अखिलेश यादव ने शिरकत जरूर की। इफ्तार पार्टियों में अखिलेश के लिबास ने भी सबका ध्यान खींचा और पहले की तस्वीरों से तुलना की जा रही है। 2017 तक इफ्तार में वह जालीदार टोपी और परंपरागत इस्लामिक परिधान में दिखते थे, लेकिन इस बार सपा की लाल टोपी पहने ही नजर आए। अब इस बात को लेकर खूब चर्चा है कि आखिर अखिलेश ने इफ्तार से क्यों परहेज किया? अखिलेश ने किसी मजबूरी के तहत नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति के तहत इफ्तार से परहेज किया है। कहा जा रहा है कि परिस्थितिवश यूपी में इस समय मुसलमानों के लिए एकमात्र विकल्प बन चुके अखिलेश अपनी छवि को लेकर बेहद सतर्क हैं। माना जा रहा है कि हिंदुत्ववादी भाजपा से लड़ रहे अखिलेश यादव को मुस्लिम परस्त छवि बनाए जाने का डर है और इस वजह से वह फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं। सपा अध्यक्ष को एक तरफ तो प्रो-मुस्लिम दिखने पर ध्रुवीकरण का डर सता रहा है। कथित सेक्युलर पार्टियों के नेता अब मंदिरों में जाते हुए दिखते हैं और पूजा-पाठ का सार्वजनिक प्रदर्शन करते हैं। इसके जरिए वह दिखाने की कोशिश करते हैं कि हम गैर हिंदू या मुस्लिम परस्त नहीं हैं। पिछले कुछ सालों के चुनावों को देखकर एक समझ बनी है कि सिर्फ मुसलमानों और या जाति विशेष के वोट के दम पर ही सरकार नहीं बनाई जा सकती है। सत्ता में आने के लिए सभी वर्गों खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं के एक बड़े वर्ग के समर्थन की आवश्यकता है। कांग्रेस और राहुल गांधी की तरह अखिलेश यादव भी सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा लेते दिख सकते हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान ही अयोध्या और हनुमानगढ़ी जाकर कर दी थी।
सिद्वार्थ शंकर, 14 मई, 2022 (ईएमएस)