लेख

विकास दुबे काण्ड- न वकील ,न दलील ,ना अपील और केस/विकास ख़तम! (लेखक- डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

11/07/2020


चौबीस घण्टे में विकास दुबे का मामला ख़तम। यह बहुत बड़ी सफलता मिली पुलिस को। विकास ने अपने आपको बहुत करीने से आत्मसमर्पण किया जिसमे उसने आपको आपको जीवित रखने और रहने का प्रमाण रखा। वह पुलिस और प्रशासन को अँधेरे में न रखकर स्वयं सामने आया ,उसका मकसद था की वह जिन्दा हैं जिसके प्रमाण उसने पर्याप्त दिए जो सी सी टी वी में दिखे। यहाँ तक कोई शक सुबहा नहीं रहा। उत्तर प्रदेश पुलिस ने बहुत शीघ्र कानपूर से उज्जैन की यात्रा की जैसे उनको पूर्वाभास रहा हो ! ठीक हैं जब एक सफलता मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी तब उन्हें अपराधी को कब्जे में लेने में क्यों देरी करना ?
भागने के बाद कहाँ कहाँ गया ,कैसे कैसे उसने यात्रा करने के बाद वह उज्जैन आया और उसने अपने आपको घोषित किया की मैं विकास दुबे कानपूर वाला हूँ और पुलिस और गॉर्ड ने तत्परता दिखाई और उसके द्वारा स्व -प्रेरणा से आत्मसमर्पण किया गया। और मजेदार बात उसी समय सम्बंधित अधिकारी तो पहुँच भी पहुँच गए ,सभी मीडिया के लोग भी पहुँच गए ,इससे लगता हैं की उसके द्वारा सुनियोजित तरीके से अपने आपको बचाया या आत्मसमर्पण किया पर दोनों पक्ष को सफलता मिल गयी और सभी प्रशंसा के पात्र हैं।
मध्य प्रदेश ने विकास को सुरक्षित उत्तरप्रदेश पुलिस को सौंप दिया। कम से कम मध्य प्रदेश पुलिस इस कलंक से मुक्त रही। पर उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा जो कदम उठाये वह वास्तव में इत्तफ़ाक़ कह सकते हैं ,पुलिस वाहन का दुर्घटना ग्रस्त होना ,उसका भगाना और फिर आपस में गोलीबारी होना और उसके बाद जख्मी होना ,तत्काल अस्पताल ले जाना और वहां मृत घोषित करना। इसके साथ कुछ पुलिस वालों का जख्मी होना या किसी का शहीद होना का मतलब विकास ने अपने बचाव का प्रयास किया और मुठभेड़ में मारा जाना।
वास्तव में पुलिस का कदम बहुत प्रशंसनीय हैं। उसे कितने कठिनाई से पकड़ा गया और मारा गया। इससे सरकार का बहुत काम सुगम हो गया। इससे उसके सब अपराध ख़तम हो गए। एक अध्याय समाप्त। बस अब इस बात की जरुरत हैं की उसके द्वारा विगत ६ माहों में किन किन से मोबाइल पर संपर्क रहे उनका विवरण मिलने से बहुत कुछ जानकारियां मिल सकेगी पर उनका उजागर होना कइयों के लिए घातक हो जायेगा ,इसलिए संभवतः सभी साक्ष्य को मिटाना होगा। हाँ विपक्ष की मांग होने पर सरकार लॉलीपॉप जैसे कोई आयोग या समिति बनाकर प्रकरण को ठन्डे बास्ते में डलवा देगी।
इस बहाने सब राजनीतिक दल के स्वयंभू नेता सुरक्षित हो गए। और इस बहाने कुछ अफसर १५ अगस्त या २६ जनवरी को पुरस्कृत हो जायेंगे। मृत पुलिस वालों के परिवार को अनुग्रह राशि और नौकरी दे दी जाएँगी। और विकास और उसके साथियों जिनकी मृत्यु हो गयी उनके परिवार का पोस्ट मार्टम होगा और कुछ नए प्रकरण उन पर भी चलेंगे।
जिस प्रकार डाकू वाल्मीकि से साधुओं के पुछा था की तुम्हारे पाप में परिवार की भागीदारी रहेंगी अथवा नहीं। परिवार जनों ने कहा था हम तुम्हारी कमाई में भागीदार हैं ना की पापों में। पर आधुनिक समय में विकासऔरउसके साथियों के पापों में
परिवार जन भी भागीदार रहेंगे। हो सकता हैं वे भी किसी न किसी अपराध में सहयोगी होकर आरोपी बनाकर हो सकता हैं उन्हें भी न्यायलय के माध्यम से कारावास भोगना पड़ेगा ,इस बहाने सरकार की छवि स्वच्छ और ईमानदार हो जाएगी या हो गयी। इस प्रकार जिस भीतरह से यह घटना हुई वह संदेहों से घिरी हैं पर सफलता ने सबके मुंह बंद कर दिए।
अब देश में न्यायालय की जरुरत कम होगी ,आयोगों की अधिक ,आयोग बिना दांत के शेर होते हैं जिनका प्रभाव सरकार की तरफ रहता हैं और रहेगा।
इस प्रकार अपराधियों को अब न वकील ,न दलील और न अपील की जरुरत रहेगी। खेल ख़तम और पैसा हजम। क्या यही हैं सही तरीका अपराधियों से निपटने का ?यह यक्ष प्रश्न हैं और रहेगा।
11जुलाई/ईएमएस