लेख

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को निजी क्षेत्र को सौंपने की साजिश? (लेखक--सनत कुमार जैन/ईएमएस)

09/01/2019

राफेल सौदे का मामला अंबानी और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड से सीधा जुड़ता हुआ नजर आ रहा है। केंद्र में एनडीए की सरकार बनने के बाद रिलायंस को आगे करके, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को बाहर करने की एक सुनियोजित साजिश रची गई थी। जो अनिल अंबानी की जल्दबाजी के कारण समय के पहले उजागर हो गई। इस साजिश के तहत हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को आर्थिक रूप से कमजोर करके उसके अधिग्रहण की साजिश उच्च स्तर पर रची गई थी। पिछले 4 वर्षों में सुनियोजित रूप से एचएएल को कमजोर करने के लिए सैन्य क्षेत्र से उसे बहुत कम काम दिया गया। जो काम कराया गया उसका भुगतान समय पर नहीं किया। इसके साथ ही हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने से पिछले 4 वर्षों में एचएएल आर्थिक रूप से दिवालिया होने की कगार पर बढ़ चली थी। राफेल मामले में लोक सभा की बहस के दौरान कई ऐसे तथ्य उजागर हुए, जिससे इस आशंका की पुष्टि होती है। सरकार विपक्ष के किसी भी आरोप का कोई सीधा जवाब नहीं दे पाई। डसॉल्ट ने रिलायंस को क्यों चुना। विपक्ष ने रिलायंस के अनिल अंबानी और प्रधानमंत्री मोदी पर सीधे आरोप लगाए। फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के बयान को विपक्ष ने आधार बनाया। राफेल का सौदा इस शर्त पर हुआ है, कि डसॉल्ट रिलायंस को अपना पार्टनर बनाएगी।
लोकसभा में राफेल मामले में वित्त मंत्री अरुण जेटली और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने सरकार का पक्ष जिस तरीके से रखा, उसमें गांधी परिवार और बरसों पुराने आरोपों को दोहरा कर सौदे को सही बताने का प्रयास किया गया। आरोपों के माध्यम से राफेल मामले को शांत करने की कोशिश सरकार द्वारा की गई, किंतु सरकार स्वयं ही इसमें फंसती चली गई।
राफेल सौदे को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं। उसके अनुसार यूपीए सरकार के समय मुकेश अंबानी समूह की रिलायंस इस सौदे में रुचि ले रही थी। 2012 में रिलायंस समूह ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को अलग करने का प्रयास भी किया था। पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटोनी इसके लिए तैयार नहीं हुए। जिसके कारण मुकेश अंबानी की राफेल सौदे से रूचि खत्म हो गई थी। एके एंटोनी राफेल की तकनीकी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स में ट्रांसफर कराकर भारत में ज्यादा से ज्यादा विमान बनाने के पक्षधर थे। डसॉल्ट ने सरकार के रुख को देखते हुए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के साथ समझौता भी लगभग कर लिया था। इसी बीच केंद्र में सरकार बदल गई और रातों-रात सारी स्थितियां भी बदल गई।
केंद्र में यूपीए की सरकार बनने के बाद राफेल सौदे में अनिल अंबानी कूद पड़े। अनिल अंबानी राजनीतिक संरक्षण के कारण, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को आर्थिक रूप से कमजोर कर अधिग्रहण करने की योजना बना चुके थे। इस काम में सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से उनकी मदद कर रही थी। राफेल से समझौता होने और लंबी अवधि का अनुबंध होने से अनिल अंबानी समूह की रिलायंस कंपनी ने बड़ी तेजी के साथ रक्षा उपकरण के निर्माण में आगे आने की जो योजना बनाई थी। उसमें सरकार ने अनिल अंबानी की मदद करने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स के आर्डर को कम करके और भुगतान नहीं करके उसे कमजोर करना शुरू कर दिया था। सरकार द्वारा एचएएल को समय पर भुगतान नहीं करने के कारण कई माह से वहां पर वेतन नहीं बंटा। जिसके कारण कंपनी को 1000 करोड़ का लोन लेने की कोशिश करनी पड़ी, जबकि यह कंपनी कुछ वर्ष पूर्व तक आर्थिक रूप से बड़ी सक्षम कंपनी थी। सरकार से ऑर्डर नहीं मिलने के कारण और खर्च ज्यादा होने के कारण आर्थिक नुकसान की ओर एचएएल तेजी से बढ़ रही थी। संसद में राफेल सौदे की बहस के दौरान यह सारे तथ्य भी उजागर हुए। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में यह कहा कि 1 लाख करोड रुपए के आर्डर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स को दिए गए हैं। रक्षा मंत्री की इस बयान को राहुल गांधी ने झूठा बताते हुए उन्हें संसद के अंदर चुनौती दे दी। उसके बाद उन्हें स्पष्टीकरण देना पड़ा, जिसमें उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि 74 हजार करोड़ रुपए के ऑर्डर प्रक्रिया गत हैं। रक्षा मंत्री अपने ही जबाव में फंस गई। एचएएल के बकाया बिलों का भुगतान अभी तक क्यों नहीं किया गया। उल्लेखनीय है, फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट को 20000 करोड़ रुपए का भुगतान सरकार ने कर दिया। जबकि एक भी विमान भारतीय वायु सेना को अभी तक नहीं मिला। इससे राहुल गांधी की जेपीसी की मांग को बल मिला।
अनिल अंबानी ने डसॉल्ट के साथ अनुबंध होने के बाद कंपनी की वेबसाइट में खुलासा करने की जो जल्दबाजी की, उससे उन्होंने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मार ली। राफेल सौदे के समय सरकार ने सरकार के साथ सौदा करने की बात कहकर चतुराई का परिचय दिया था। किंतु अनिल अंबानी ने स्वयं गुड़ गोबर कर लिया। रही सही कसर उन्होंने राजनेताओं को मानहानि का नोटिस देकर पूरी कर ली। वर्तमान में राफेल का सौदा अनिल अंबानी के लिए मुसीबत बन गया है। वहीं नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए भी यह सौदा मुसीबत का कारण बन गया है। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले राफेल का यह मुद्दा भाजपा की गले में फांस की तरह अटक गया है।
ईएमएस/09/01/2019