लेख

राष्ट्र को समर्पित संत विनोबा भावे (लेखक-मनोहर पुरी/ ईएमएस)

10/09/2019

(11सितंबर जन्म दिवस पर विशेष)
साधु स्वभाव और विनम्र सौम्यता की प्रतिमूर्ति थे आचार्य विनोबा भावे। दृढ़ इच्छा शक्ति ,गहरी निष्ठा और अनवरत परिश्रम उनके चरित्र के ऐसे गुण थे जिनके कारण वह देश में सर्वोदय और भूदान जैसे आंदोलन प्रारम्भ करने में सफल हो पाये। बहुमुखी प्रतिभा के धनी,मौलिक विचारक और दार्शनिक विनोबा भावे में बुद्धि,वाणी और कर्म का अद्भुत समन्वय था। उन्होंने आत्मसंयम,सादगी और त्याग का जीवन व्यतीत करते हुए अपने आपको राष्ट्र और समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। वह गांधीवादी विचारधारा के सबसे बड़े अनुयायी थे। उन्हें विनोबा नाम भी स्नेह और श्रृद्धा के कारण कोचारब आश्रमवासियों ने दिया जिसे गांधी जी ने भी अपना आर्शीवाद प्रदान कर दिया था। बचपन में उनका नाम विनायक रखा गया था।
नरहरि विनायक भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कलाबा जिले के गगोदा नामक स्थान पर चितपावन ब्राह्मण कुल में हुआ। वह नरहरि शंभुराव भावे और रुक्मिणी देवी के जेष्ठ पुत्र थे। विनायक के पिता बड़ोदरा की देशी रियासत में वस्त्र तकनीकी विशेषज्ञ के रूप में कार्य करते थे। बचपन में धार्मिक विचारों वाली माता और प्रगतिशील विचारों वाले पितामह का उन पर गहरा प्रभाव हुआ। बाद में वह महात्मा गांधी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ही उनके आदर्शों के लिए समर्पित कर दिया। शैशवावस्था से ही उनमें सरलता,आध्यात्मिकतातथा सहिष्णुता के गुण दिखाई देने लगे थे। जब वह मात्र दस वर्ष के थे तभी उन्होंने राष्ट्र सेवा और ब्रह्मचर्य का प्रण ले लिया और उसे जीवनपर्यन्त निभाया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। 1903 में उनका परिवार बड़ौदा चला गया। यहां पर विनोबा जी को तीसरी कक्षा में प्रवेश दिलाया गया। अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण उनकी गणना कक्षा के होशियार छात्रों में की जाती थी। 1913 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उर्त्तीण की। इसी समय के दौरान उन्होंने गीता,रामायण और महाभारत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने अनेक भाषाओं में भी प्रवीणता प्राप्त की।
सन् 1916 में जब विनायक अपने मित्रों सहित इंटरमीडिएट की परीक्षा देने के लिए बम्बई जा रहे थे तो रेलगाड़ी में ही अचानक उन्होंने एक ऐसा निर्णय ले लिया जिसने उनके जीवन की दिशा को ही बदल दिया। सूरत स्टेशनपर उन्होंने अपने साथियों को सूचित किया कि मैं बम्बई के स्थान पर वाराणसी संस्कृत का गहन अध्ययन करने के लिएजा रहा हूं। इसी आशय का एक पत्र उन्होंने अपने पिता के नाम लिख दिया। शंकर राव कगारे और बेडेकर नामक दो अन्य मित्र भी उनके साथ काशी के लिए चल पड़े। वहां पर उन्होंने नितांत गरीबी में जीवन व्यतीत करना शुरू किया। दोपहर का भोजन वे लोग किसी मन्दिर के लंगर में खाते थे। लंगर लगाने वाले दानियों द्वारा भोजन के बाद दो पैसे की दक्षिणा भी मिलती थी। इस दक्षिणा से उनके रात के भोजन का प्रबंध हो जाता था। इस फटेहाल जीवन से तंग आ कर कुछ समय बाद शंकर राव कगारे घर वापिस चले गए। कुपोषण के कारण बेडेकर का निधन हो गया। विनायक ने एक स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने की नौकरी कर ली। वेतन के बारे में पूछने पर विनायक ने कहा कि मुझे मात्र दो रुपए मासिक वेतन ही चाहिए क्योंकि मेरे भोजन का प्रबंध दान से हो जाता है। कमरे का किराया दो रुपया है। मुझे केवल उसी की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त मेरा कोई खर्चा नहीं है।
काशी में विनायक ने एक बार महात्मा गांधी का भाषण सुना। वह उनसे अत्याधिक प्रभावित हुए। उन्होंने गांधी जी पत्र लिखा। गांधी जी के बुलाने पर वह साबरमती आश्रम पहुंच गए। आश्रम में वह गांधी जी के विश्वस्त सहयोगीबन गए और आश्रम के राष्ट्रीय विद्यालय में छात्रों को पढ़ाने का दायित्व उन्होंने अपने ऊपर ले लिया। विनोबा जी किसी भी काम को करने में संकोच नहीं करते थे। आश्रम में पाखानों की साफ सफाई करने से लेकर आटा दाल पीसने तक का कार्य वह स्वयं अपने हाथों से करते थे। हर प्रकार का कार्य पूरी तन्मयता से सम्पन्न करके वह आश्रमवासियों के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे। उनकी इस कठोर साधना पर गांधी जी का ध्यान हमेशा रहता था। इसी कारण जब सेठ जमनादास बजाज ने वर्धा में आश्रम की स्थापना की तब वहां के संचालन के लिए गांधी जी ने विनोबा जी को वहां भेज दिया। 1921 की वर्ष प्रतिपदा को विनोबा जी वर्धा पहुंच गए। इस आश्रम में गांधी जी द्वारा निर्देशित भारत के नव निर्माण के सारे रचनात्मक कार्य सम्पन्न होने लगे। उन्होंने सर्वांगीण ग्राम विकास की कई योजनाएं बनाईं और ग्राम सेवा मंडलों का गठन भी किया। जब भी विनोबा जी को जेल जाना पड़ा वहां पर भी उनका जेलवासियों को पढ़ाने और स्वयं अध्ययन करने का कार्य चलता रहा। उन्होंने गीता का गहन अध्ययन किया था इसलिए वह गीता के रहस्यों से उन्हें परिचित करवाते थे। गीता पर उन्होंने अनेक प्रवचन दिए लेख और पुस्तकें भी लिखीं। उनकी गीता रहस्य नामक पुस्तक का देश विदेश की अनेक भाषाओं में प्रकाशन हुआ। ाrवनोबा जी बहुभाषिक थे। किसी भी भाषा को वह बहुत जल्दी सीख लेते थे। उनकी भाषा शैली सूत्रमय होते हुए भी बहुत ही सरल होती थी। उनके पास एक विस्तृत शब्द भंण्डार था जिस कारण वह अपनी बात को बहुत सहजता से उदाहरण दे कर समझाने में सफल होते थे। नलवाडी में रहते हुए उन्होंने अरबी भाषा सीखी और कुरान का मूल अरबी भाषा में अध्ययन किया। उन्होंने बाईबिल का भी अध्ययन किया ।
विनोबा जी का दृढ़ विश्वास था कि सिद्धांत व्यक्ति से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। सिद्धांतों का पालन करके ही व्यक्ति महान बनता है। जिस विचार को हम अपनाते हैं वह हमारा विचार ही हो जाता है। उन्होंने कहा कि हमने गांधी जी के समस्त विचारों को अपनाया है तो अब वे हमारे विचार ही हैं। गांधी जी के निधन के साथ वह नष्ट नहीं हुए। अब वे विचार सर्वोदय के हैं। वह हमारी बहुमूल्य विरासत है। उनको अपनाने में हमारा ही नहीं सब का कल्याण है। सब के कल्याण के लिए ही उन्होंने भूमिहीनों को भूमि उपलब्ध करवाने की योजना बनाई। इसका प्रारम्भ उन्होंने आंध्र प्रदेश के पांचमपल्ली नामक स्थान से किया। उनके अनुरोध पर वहां के जमींदार रामचन्द्र रेड्डी ने 100 एकड़ भूमि उन्हें दान में दे दी जिसे भूमिहीनों में वितरित कर दिया गया। इस कार्य के लिए विनोबा जी ने देश के कोने कोने में तेरह वर्ष पदयात्राएं कीं। इन यात्राओं के दौरान वह लगभग एक लाख किलोमीटर पैदल चले। इन यात्राओं से स्थान स्थान पर भूदान का कार्य प्रारम्भ हुआ। फलस्वरूप उन्हें लाखों एकड़ भूमि दान में प्राप्त हुई जिसे उन्होंने जरूरतमंदों के मध्य वितरित कर दिया । विनोबा जी के पिता के देहावसान पर उन्हें 25 हजार रुपए और 450 एकड़ पुश्तैनी जमीन मिली। विनोबा जी ने सारी जमीन भूमिहीनों में बांट दी। 25 हजार रुपए रचनात्मक कार्यों पर व्यय करने के लिए ग्राम सेवा मंडलों को सौंप दिए गए। भूदान के साथ ही विनोबा जी ने एक अन्य महान कार्य दस्यू उन्मूलन का भी किया। उनकी प्रेरणा से बहुत से डाकूओं ने आत्म सपमर्पण करके पुन: समाजिक जीवन में पर्दापण किया।
विनोबा जी की सप्रिय राजनीति में कोई रुचि नहीं थी। वे स्वयं को अराजनीतिक ही मानते थे। 1958 में उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों के लिए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मैगासे पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। इससे पूर्व यह पुरुस्कार किसी अन्य भारतीय को नहीं दिया गया था। विनोबा जी मानते थे कि विचार ही चिरंतन होते हैं। इसलिए जब 15 नवम्बर 1982 को उन्होंने देह त्यागी तो वह अपने विचारों की एक सृद्धिशाली वसीयत पूरे विश्व के लिए पीछे छोड़ गए। 1983 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से विभूषित किया गया। उनके कार्यों की मशाल एक दिव्य मिसाल बन कर आज भी हमारा मार्ग प्रशस्त कर रही है।
(ईएमएस)/रानी/10सितंबर/10.30