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(पुस्तक चर्चा) वतन को नमन : एक पठनीय पुस्तक (प्रो. (डॉ.) साधना वर्मा )

01/12/2018

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा है-
"जिसको न निज गौरव तथा निज देश एक अभिमान है
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।"
नर्मदांचल के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ कवि प्रो. सी.बी. एल. श्रीवास्तव 'विदग्ध' ने देश की नई पीढ़ी को नर-पशु बनने से बचाने के लिए इस कृति का प्रणयन किया है। आदर्श शिक्षक रहे विदग्ध जी ने नेताओं की तरह वक्तव्य देने या तथाकथित समाज सुधारकों की तरह छद्म चिंता विकट करने के स्थान पर बाल, किशोर, तरुण तथा युवा वर्ग के लिए ही नहीं अपितु हर नागरिक में सुप्त राष्ट्रीय राष्ट्र प्रेम की भावधारा को लुप्त होने से बचाकर न केवल व्यक्त अपितु सक्रिय और निर्णायक बनाने के लिए "वतन को नमन" की रचना तथा प्रकाशन किया है। १३० पृष्ठीय इस काव्य कृति में १०८ राष्ट्रीय भावधारापरक काव्य रचनाएँ हैं। वास्तव में ये रचनाएँ मात्र नहीं, राष्ट्रीयता भावधारा के सारस्वत कंठहार में पिरोए गए काव्य पुष्प हैं।
'वतन को नमन' विदग्ध जी की राष्ट्रीय चेतना से परिपूर्ण कविताओं-गीतों का संग्रह है। विदग्ध जी शिल्प पर कथ्य को वरीयता देते हुए नई पीढ़ी को जगाने के लिए राष्ट्रीय भावधारा के प्रमुख तत्वों राष्ट्र महिमा, राष्ट्र गौरव, राष्ट्रीय पर्व, राष्ट्रीय जीवन मूल्य, राष्ट्रीय संघर्ष, राष्ट्रीयता की दृष्टि से महत्वपूर्ण महापुरुष, राष्ट्रीय संकट, कर्तव्य बोध, शहीदों को श्रद्धांजलि, राष्ट्र का नवनिर्माण, नयी पीढ़ी के स्वप्न, राष्ट्र की कमजोरियाँ, राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय सेना, राष्ट्र के शत्रु, रष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्र की प्रगति, राष्ट्र हेतु नागरिकों का कर्तव्य एवं दायित्व आदि को गीतों में ढालकर पाठक को प्रेरित करने में पूरी तरह सफल हुए हैं। भारत का गौरव गान करते हुए वे कहते हैं-
हिमगिरि शोभित, सागर सेवित, सुखदा, गुणमय, गरिमावाली।
शस्य-श्यामला शांतिदायिनी, परम विशाला वैभवशाली।।
ममतामयी अतुल महिमामय, सरलहृदय मृदु ग्रामवासिनी।
आध्यात्मिक सन्देशवाहिनी, अखिल विश्व मैत्री प्रसारिणी।।
प्रकृत पवन पुण्य पुरातन, सतत नीति-नय-नेह प्रकाशिनि।
सत्य बंधुता समता करुणा, स्वतन्त्रता शुचिता अभिलाषिणी।।
ज्ञानमयी, युवबोधदायिनी, बहुभाषा भाषिणि सन्मानी।
हम सबकी मी भारत माता, सुसंस्कारदायिनी कल्याणी।।
देश के युवाओं का आव्हान करते हुए वे उन्हें युग निर्माता बताते हैं-
हर नए युग के सृजन का भर युवकों ने सम्हाला
तुम्हारे ही ओज ने रच विश्व का इतिहास डाला
प्रगति-पथ का अनवरत निर्माण युवकों ने किया है-
क्रांति में भी, शांति में भी, सदा नवजीवन दिया है

देश, उसकी स्वतंत्रता और देशवासियों के रक्षक सेना के रणबांकुरों के प्रति देश की भावनाएं कवि के माध्यम से अभिव्यक्त हुई हैं-
तुम पे नाज़ देश को, तुम पे हमें गुमान
मेरे वतन के फौजियों जांबाज नौजवान
संस्कारधानी जबलपुर राष्ट्रीय भावधारा के इस सशक्त हस्ताक्षर की काव्य साधना से गौरवान्वित है। हिंदी साहित्य के लब्ध प्रतिष्ठ हस्ताक्षर आचार्य संजीव 'सलिल' देश की माटी के गौरवगान करने वाले विदग्ध जी के प्रति अपने मनोभाव इस तरह व्यक्त करते हैं-
हे विदग्ध! है काव्य दिव्य तव सलिल-नर्मदा सा पावन
शब्द-शब्द में अनुगुंजित है देश-प्रेम बादल-सावन
कविकुल का सम्मान तुम्हीं से, तुम हिंदी की आन हो
समय न तुमको बिसरा सकता, देश भक्ति का गान हो
चिर वन्दित तव सृजन साधना, चित्रगुप्त कुल-शान हो
करते हो संजीव युवा को, कायथ-कुल-अभिमान हो।
01दिसम्बर/ईएमएस