लेख

(कविता) दीपमाला पांडे / ईएमएस

08/11/2019

अगर पेड़ भी चलते होते
सोचो वो दिन कैसे होते
धूप जब हमको सताती है
पेड़ की ठंडी छांव ही याद आती है...
जब मैं बाहर जाती
धूप बारिश मुझको सताती
सुकून पाने के लिए में
पेड़ के नीचे ही रुक जाती.…...
फल खूब खाते हैं
पर वह भी तो पेड़ से आते हैं
जब नदी झरने, तूफान, उफान पर आते हैं
पहले पेड़-पौधे ही उनको रोक पाते हैं...
जन्म से मृत्यु तक का सारा सफर
हम इनके बिना तय नहीं कर पाते हैं...
नन्हीं चिड़िया गिलहरी गोरैया
यह सब पेड़ों में ही तो रह पाते हैं...
और अंत में हम सब भूल जाते हैं
उन्ही लकड़ियों से तो हमारे शव जल पाते हैं..
बिजली दाहघर में करो यह संस्कार
ताकि एक बेटा और एक बेटी के साथ
पेड़ों से भी सजा हो हमारा संसार
08नवंबर/ईएमएस