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(3दिसम्बर विश्व दिव्यांग दिवस पर विशेष) आखिर कैसे आत्मनिर्भर बन पायेगें देश में दिव्यांगजन ? (लेखक- रमेश सर्राफ धमोरा/ईएमएस)

02/12/2018

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1992 में अंतर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के रूप में 3 दिसम्बर का दिन तय किया गया था। इस दिवस को समाज और विकास के सभी क्षेत्रों में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण को बढ़ावा देना और राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन के हर पहलू में दिव्यांग लोगों की स्थिति के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए मनाया जाता है। दिसम्बर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकलांगों को ‘दिव्यांग’ कहने की अपील की थी, जिसके पीछे उनका तर्क था कि किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं। तब से भारत में हर जगह विकलांग के स्थान पर दिव्यांग शब्द प्रयुक्त होने लगा है।
हमारे ज्यादातर लोग ये भी नहीं जानते कि उनके घर के आस-पास समाज में कितने लोग दिव्यांग हैं। समाज में उन्हें बराबर का अधिकार मिल रहा है कि नहीं। समाज में उनके आत्मसम्मान, सेहत और अधिकारों को सुधारने के लिये और उनकी सहायता के लिये एक साथ होने के साथ ही लोगों की दिव्यांगता के मुद्दे की ओर पूरे विश्वभर की समझ को सुधारने के लिये इस दिन को उत्सव के रूप में मनाने का उद्देश्य बहुत बड़ा है। जीवन के हरेक पहलू में समाज में सभी दिव्यांग लोगों को शामिल करने के लिये भी इस दिन के आयोजन को देखा जाता है। इसी वजह से इसे विश्व दिव्यांग दिवस के शीर्षक के द्वारा मनाया जाता है। विश्व दिव्यांग दिवस का उत्सव हर साल पूरे विश्वभर में दिव्यांग लोगों के अलग-अलग मुद्दों पर ध्यान केन्द्रीत करता है।
हमारा देश भारत विकासशील देशों की गिनती में आता है। विज्ञान के इस युग में हमने कई नई ऊंचाइयों को छुआ है। लेकिन आज भी हमारे देश, हमारे समाज में कई लोग है जो हीन दृष्टी झेलने को मजबूर है। वो लोग जो किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाते है अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग होते है। आज समाज दिव्यांगो के लिए एक बेहतर जीवन और समाज में समान अधिकार के लिए आवाज बुलंद कर रहा है। लेकिन इसी बीच एक सच्चाई यह भी है कि भारत में दिव्यांगो को आज भी अपनी मूलभूत जरूरतों के लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है।
आज दुनिया में करोड़ो व्यक्ति दिव्यांगता के शिकार है। दिव्यांगता अभिशाप नहीं है, क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाये तो दिव्यांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सकारात्मक रहा जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं। दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों का मजाक बनाना, उन्हें कमजोर समझना और उनको दूसरों पर आश्रित समझना एक भूल और सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है। आज हम इस बात को समझे कि उनका जीवन भी हमारी तरह है और वे अपनी कमजोरियों के साथ उठ सकते है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्राप्त आंकड़ों के अनुसार दुनिया के 65 करोड़ लोग दिव्यांग की श्रेणी में आते हैं। यह दुनिया की सम्पूर्ण जनसंख्या का 8 प्रतिशत है।
गत दिनो पैरा एशियाड खेलों में झुंझुनू जिले के दिव्यांग खिलाड़ी संदीप कुमार ने भाला फेंक प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीत कर भारत का मान बढ़ाया है। हमारे आस पास कई ऐसे व्यक्ति है जिन्होंने अपनी दिव्यांगता के बाद भी देश में अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई है। दुनिया में अनेकों ऐसे उदाहरण मिलेंगे जो बताते है कि जीवन में यदि सही राह मिल जाये तो अभाव एक विशेषता बनकर सबको चमत्कृत कर देते है। हाल के वर्षों में दिव्यांगो के प्रति समाज का नजरिया बदल रहा है। यह माना जाता है कि यदि दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
भारत सरकार द्वारा किये गए प्रयास में सरकारी सेवा में आरक्षण देना, योजनाओं में दिव्यांगो की भागीदारी को प्रमुखता देना, आदि को शामिल किया जाता रहा है। हालांकि भारत में बहुत सी ऐसी सरकारी योजनाएं हैं जो दिव्यांगो की मदद के लिए हैं, लेकिन आज भी मात्र पचास फीसदी दिव्यांगो को ही दिव्यांगता प्रमाण पत्र मुहैया कराया जा सका है। ऐसे में दिव्यांगो के लिए सरकारी सुविधाएं महज मजाक बनकर रह गयी हैं। भारत में आज भी दिव्यांगता प्रमाण पत्र हासिल करना किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकारी कार्यालयों और अस्पतालों के कई दिनों के चक्कर लगाने के बाद भी लोगों को मायूस होना पड़ता है। हालांकि सरकारी दावे कहते हैं कि इस प्रक्रिया को काफी सरल बनाया गया है, लेकिन हकीकत इससे उलट है। दिव्यांगता का प्रमाणपत्र जारी करने के सरकार ने जो मापदण्ड बनाये हैं, अधिकांश सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक उनके अनुसार दिव्यांगो को दिव्यांग होने का प्रमाणपत्र जारी ही नहीं करते है। जिसके चलते दिव्यांग व्यक्ति सरकारी सुविधायें पाने से वंचित रह जाते हैं।
2011 के जनगणना के अनुसार देश मे 2.68 करोड़ दिव्यांग है। जिनमें 45 फीसदी दिव्यांग आबादी अशिक्षित है। जबकि पूरी आबादी की बात की जाए तो अशिक्षितों का प्रतिशत 26 है। दिव्यांगों में भी जो शिक्षित हैं, उनमें 59 फीसदी मात्र 10 वीं पास हैं, जबकि देश की कुल आबादी का 67 फीसदी 10 वीं तक शिक्षित है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत सभी को एक समान शिक्षा मुहैया कराने का वादा तो किया गया है, इसके बावजूद शिक्षा व्यवस्था से बाहर रहने वाली आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा दिव्यांग बच्चों का ही है। दव्यांगो के बीच भी विशेषी कृत करें तो ऐसे बच्चे जिनके शरीर के एक से अधिक अंग अपंग हैं, उनकी 44 फीसदी आबादी शिक्षा से वंचित है, जबकि मानसिक रूप से अपंग 36 फीसदी बच्चे और बोलने में अक्षम 35 फीसदी बच्चे शिक्षा से वंचित हैं।
देश में दिव्यांगो के लिए सरकार ने कई नीतियां बनायी है। उन्हें सरकारी नौकरियों, अस्पताल, रेल, बस सभी जगह आरक्षण प्राप्त है। साथ ही दिव्यांगो के लिए सरकार ने पेशन की योजना भी शुरु की है। लेकिन ये सभी सरकारी योजनाएं उन दिव्यांगो के लिए महज एक मजाक बनकर रह गयी हैं। जब इनके पास इन सुविधाओं को हासिल करने के लिए दिव्यांगता का प्रमाणपत्र ही नहीं है। हाल ही में केन्द्र सरकार ने देशभर के दिव्यांग युवाओं को बड़ा तोहफा दिया हैं। सरकार ने शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों को सरकारी नौकरी में 10 साल तक की छूट दी है। केन्द्र सरकार में सीधी भर्ती वाली सेवाओं के मामले में दृष्टि बाधित, बधिर और चलने-फिरने में दिव्यांगता या सेरेब्रल पल्सी के शिकार लोगों को उम्र में 10 साल की छूट दी है।
दिव्यांगता शारीरिक अथवा मानसिक हो सकती है किन्तु सबसे बड़ी दिव्यांगता हमारे समाज की उस सोच में है जो दिव्यांग जनों से हीन भाव रखती है और जिसके कारण एक असक्षम व्यक्ति असहज महसूस करता है। देश में दिव्यांगो को दी जाने वाली सुविधाएं कागजों तक सिमटी हुई हैं। दिव्यांगो को अन्य देशों में जो सुविधाएं दी जा रही हैं उसकी एक चौथाई सुविधाएं भी हमारे देश में नहीं मिल रही है।
अब दिव्यांग लोगों के प्रति अपनी सोच को बदलने का समय आ गया है। दिव्यांगो को समाज की मुख्यधारा में तभी शामिल किया जा सकता है जब समाज इन्हें अपना हिस्सा समझे, इसके लिए एक व्यापक जागरूकता अभियान की जरूरत है। हाल के वर्षों में दिव्यांगो के प्रति सरकार की कोशिशों में तेजी आयी है। दिव्यांगो को कुछ न्यूनतम सुविधाएं देने के लिए प्रयास हो रहे हैं या प्रयास होते हुए दिख रहे हैं। वैसे योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सरकार पर सवाल उठते रहे हैं। क्रियान्वयन की सुस्त चाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी सरकार को फटकार लगा चुका है। दिव्यांगो को शिक्षा से जोडऩा बहुत जरूरी है। इस वर्ग के लिए, खासतौर पर, मूक-बधिरों के लिए विशेष स्कूलों का अभाव है जिसकी वजह से अधिकांश दिव्यांग ठीक से पढ़-लिखकर जीवन में आत्मनिर्भर नहीं बन पाते हैं।
आधुनिक होने का दावा करने वाला हमारा समाज अभी तक दिव्यांगो के प्रति अपनी बुनियादी सोच में कोई खास परिवर्तन नहीं ला पाया है। अधिकतर लोगों के मन में दिव्यांगों के प्रति तिरस्कार या दया भाव ही रहता है। ऐसे भाव दिव्यांगो के स्वाभिमान पर चोट करते हैं। भारत में आज भी ढाई करोड़ से अधिक लोग दिव्यांगता से जूझ रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या होने के बावजूद इनकी परेशानियों को समझने और उन्हें जरूरी सहयोग देने में सरकार और समाज दोनों नाकाम दिखाई दे रहें हैं।
02दिसम्बर/ईएमएस