क्षेत्रीय

मनुष्य की इच्छाये उसके दुख का सबसे बडा कारण है आचार्य विनिश्चय सागर

25/03/2019

छतरपुर (ईएमएस)। नगर के दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र डेरा पहाड़ी में विराजमान परम पूज्य आचार्य श्री विनिश्चय सागर जी ने आज की धर्मशभा में उपदेश्य दिया कि मनुष्य को दु:ख कही बाहर से नही आता बल्कि उसके स्वयं की इक्छाये ही दुख का सबसे बड़ा कारण है। अजित जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए महाराज जी ने कहा कि एक किसान बड़ा ही संतुष्ट था उसको खेती किसानी करके जो भी प्राप्त करता था उसे ही ग्रहण करके संतोष धारण करता था उसकी फसल कम हो या अधिक उसे कोई फर्क नही पड़ता था जो मिला उतने में संतुष्ट था लेकिन क्या करे लोगों से किसी का सुख नही देखा जाता उसका भी ये सुख कई व्यक्तिओ को खटकता है । एक वार गांव का ही एक व्यक्ति उसके पास पहुँचा उसने उस किसान को एक हीरा दिखाया ओर उसकी ऐसी ऐसी महिमा बताई की तुम इसे प्राप्त कर लोगे तो अमीर बन जाओगे खुश रहोगे वस फिर क्या किसान की भी इक्छा हो गई कि इस पत्थर को तो प्राप्त करना ही है। उस व्यक्ति ने बता दिया ये हीरा फलाने देश मे फलानी खदान में मिलता है उसने अपने खेत मकान आदि बेचकर उस हीरे की खोज में जुट गया है। हीरा ढूढ़ते ढूढ़ते परेशान हो गया और उसने दर-दर की ठोकरे खाई ओर अंत मे दुखी होकर उसने आत्मघात कर लिया। इसलिए ज्ञानियो जरूरते तो भिखारी की भी पूरी हो जाती है ओर इच्छाये तो राजाओ की भी अधूरी रह जाती है। धर्मसभा के दौरान समाज के अनेक लोग मौजूद रहे।
प्रवीण/25/03/2019