लेख

संतुलित आहार के नाम पर विवेकहीन निर्णय (लेखक- डॉक्टर अरविन्द प्रेमचंद जैन / ईएमएस)

19/07/2019

भारत देश में औसतन कोई भी व्यक्ति अधिक पौष्टिक नहीं हैं। अधिकांश कुपोषण से पीड़ित हैं कारण सामान्य वर्ग को संतुलित आहार नहीं मिलता और निम्म और गरीबों को जब पर्याप्त भोजन नहीं मिलता तो वे कुपोषण की श्रेणी में आते हैं।सभी सरकारों का लक्ष्य हैं की कुपोषण से कोई पीड़ित न हो ,कारण कुपोषण के कारण शरीर में प्रतिरोधक क्षमता न होने से रोगग्रस्त शीघ्र होते हैं और शीघ्र मृत्यु के शिकार होते हैं।यह स्थिति जन्म के समय से शुरू होती हैं और पांच वर्ष के पहले पहले बहुत बालक /.बालिकाएं मर जाते हैं या बीमार रहते हैं।इसी समय उन्हें पर्याप्त पोषण की जरुरत होती हैं जो उनके घरों में उपलब्ध न होने पर सरकार लोक कल्याणकारी होने से अलग अलग प्रकार का पोषण आहार शालाओं में देती हैं।यह अच्छी पहल हैं पर पहल ऐसी हो जो किसी प्रकार की हानिकारक न हों पर सरकार अपना लक्ष्य प्राप्त करने कोई भी विवेकहीन निर्णय ले लेती हैं।
अंडा को पोषण के बाबद प्रोटीन का अच्छा स्रोत बताना या मानना बहुत बड़ी भूल हैं ,अंडा यानी हृदय रोग को सीधा निमंत्रण हैं। अंडा एक प्रकार से जहर ही जहर हैं।अंडा यानी अन्य असाध्य रोगों का आमंत्रण हैं ,इसको ठन्डे दिमाग से समझकर फिर विचार करे की यह खाना चाहिए या नहीं।
पहली बात हम अंडा क्यों देना चाहते हैं ,प्रोटीन की कमी या पोषण के लिए ?१०० ग्राम अंडा में प्रोटीन १४.३ ग्राम होता हैं ,एक अंडे का वजन २५ ग्राम होता हैं तो ४० अंडे खानेसे १०० ग्राम प्रोटीन मिलेगा।यानी एक अंडा की कीमत यदि ५ रुपये हैं (मुझे नहीं मालूम ) तो ४० अण्डों की कीमत २०० रुपये होंगी और उसमे १४.३ ग्राम प्रोटीन मिलेगा जिससे आपको हृदय रोग ,किडनी रोग ,त्वक रोग और आप मांसाहारी बनाने जा रहे हैं ,उसके विपरीत यदि आप सोयाबीन ,मूंगफली और चना का प्रयोग करेंगे तो आपको सस्ता और पूर्ण आहार के साथ शाकाहारी और सात्विक आहार मिलेगा ,इसको भी समझना जरुरी हैं। १०० ग्राम सोयाबीन में ४५.५ ग्राम प्रोटीन और लागत ५ रुपये ,१०० मूंगफली में ३२.५ ग्राम प्रोटीन और लागत १५ रुपये अधिकतम और१०० ग्राम चना में २३ ५ ग्राम प्रोटीन और लागत १५ रुपये अधिकतम इस प्रकार सोयाबीन मूंगफली और चना तीनो को मिलाकर ३०० ग्राम में १०० ग्राम प्रोटीन मात्र ३५ रुपये में मिलेगा जो सात्विक के साथ पौष्टिक भी होगा।और पूर्णतः शाकाहारी और हानिरहित।यदि इसको और स्वादिष्ट बनाना हो तो उसको बर्फी के रूप में भी दिया जा सकता हैं।
ये विचारणीय बात हैं की अंडा का उत्पादन काम वासना से पैदा होता हैं जिससे तामसिक प्रवत्ति होने से तामसिक बुद्धि और भाव पैदा होते हैं।जो भविष्य में हिंसा वृत्ति को आमंत्रित करती हैं।यदि हम शुरू से उन बालक बालिकाओं को पोषण आहार के रूप में अंडा या मांसाहार देंगे तो उनका भविष्य शांतिकारक नहीं होगा।आहार यानी आरोग्य वर्धक और हानि रहित आहार कहलाता हैं और शाकाहार यानी शांतिकारक और हानि रहित आहार।भोजन यानी भोग से जल्दी शरीर नष्ट होता हैं।
इसीलिए सरकारको अंडो का वितरण तुरंत बंद करना चाहिए उसकी जगह हमारे पास अनेकों विकल्प हैं जिनके उपयोग से हम कुपोषण समाप्त कर सकते हैं बशर्ते इस कार्यक्रम में पूर्ण ईमानदारी होना चाहिए।मुख्यमंत्री ,मंत्री ,सचिव संचालक जिला अधिकारी और ठेकेदार अन्यथा अंडा भी कब का,किस तारीख का किस हालात में प्रदाय किया जा रहा हैं और उसकी विषाक्तता से मौत ही होगी।खाने से और जहरीला होने पर मौत ही मौत होगी ,भारतवर्ष अहिंसा प्रधान देश हैं तो इसमें सरकार की ओर से क्यों बढ़ावा दे रहे हैं ?जिसको जो खाना हैं वह उसकी स्वतंत्रता हैं पर सरकारी स्तर पर इस प्रकार का बढ़ावा देना कानूनन अपराध के साथ जन सामान्य के साथ धोखा और गलत आहार को बढ़ावा देना हैं।
तन मन धन करता कौन ख़राब
मछली अंडा मांस शराब
अंडा खाओ मौत बुलाओ
अंडा अनेको रोगों का घर हैं
क्यों खाना जब उससे कोई लाभ नहीं
नुक्सान ही नुक्सान हैं।
19जुलाई/ईएमएस