लेख

(विचार-मंथन) असहिष्णुता महसूस करने और करवाने की कवायद (लेखक- डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

12/02/2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को किसी और बात के लिए जाना जाए या न जाना जाए, लेकिन असहिष्णुता के लिए तो जरुर ही जाना जाएगा। यह बात यदि विरोधी कहते तो शायद हंसी में उड़ा दी जाती, लेकिन कला व सिने जगत के स्थापित लोगों ने इस बात को बारंबार कहा, इसलिए एक बार फिर यह विचारणीय हो गई है। दरअसल जब से भाजपानीत गठबंधन केंद्र में काबिज हुआ है, तभी से विभिन्न क्षेत्रों की स्थापित और सम्मानित अनेक हस्तियों को देश में असहिष्णुता नजर आने लगी है। इसका विरोध भी देशव्यापी होते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक असरकारक साबित हुआ। इसके बाद कुछ कार्रवाइयां होती दिखीं, लेकिन कहते हैं कि यह हिंदुस्तान है जहां के रहवासी बड़े से बड़े जख्म को भूलते बहुत जल्दी हैं। संभवत: यही वजह है कि रह-रहकर वही घटनाएं सामने आ जाती हैं, जिन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले लोकतांत्रिक देश के लिए कलंक माना जाता है। दरअसल मौजूदा सरकार के फैसलों और उसकी नीतियों को लेकर आलोचना करने की परिपाटी पुरानी है, लेकिन मुखर होते सरकार विरोधियों पर हमले करने, करवाने और उनका मुंह सदा के लिए बंद करने की नई परिपाटी जरुर शुरु हो गई है, जिसका विरोध भी लगातार जारी है। इस समय सिनेजगत के महान कलाकार और स्थापित निर्देशक अमोल पालेकर को तब असहिष्णुता नजर आ गई जबकि उन्हें कार्यक्रम में बुलाकर बोलने की आजादी नहीं दी गई। उनके भाषण देने के दौरान आयोजकों का टोंका-टाकी करना कहीं न कहीं उन्हें नागवार गुजरा और वो दु:खी मन से यह कहते देखे गए कि वो तो सिर्फ सरकार के संस्कृति मंत्रालय के एक फैसले के खिलाफ बोल रहे थे, जबकि यदि उन्हें आगे बोलने दिया जाता तो अनेक ऐसे फैसले थे जिनकी वो तारीफ भी करने वाले थे। इस प्रकार शांत स्वभाव के शानदार कलाकार को गुस्सा भी आया और उन्होंने चुनौती स्वीकार करते हुए कह दिया कि देश व समाज में असहिष्णुता बढ़ी है और अब वो चुप बैठने वाले नहीं हैं। इसके खिलाफ वो बोलेंगे ताकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा हो सके। यहां याद दिला दें कि पिछली बार जब असहिष्णुता पर सवाल उठे थे तो नवंबर 2015 में अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ साझा बयान के दौरान हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने असहिष्णुता मुद्दे पर चुप्पी तोड़ते हुए कहा था कि 'भारत गांधी और बुद्ध की धरती है और हमारा देश ऐसी किसी भी बात को स्वीकार नहीं करता है। देश के किसी भी कोने में हुई प्रत्येक घटना हमारे लिए गंभीर है। कानून कठोरता से काम करेगा। हर नागरिक के विचार की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।' प्रधानमंत्री मोदी की बात का असर इन ताकतों पर कितना हुआ यह तो इसी बात से पता चल जाता है कि उसके बाद भी घटनाएं होती रहीं और प्रधानमंत्री मोदी को यहां तक कहना पड़ गया था कि यदि ऐसे किसी को मारना ही है तो पहले मेरे सीने में गोली दाग दो। बावजूद इसके भीड़ द्वारा निहत्थों की हत्या करने का सिलसिला थमने की बजाय बदस्तूर जारी रहा। हद यह रही कि जिसने भी सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ बोला उसे जान से मारने तक की धमकी मिलती रही। विशेष संप्रदाय के लोगों को तो सीधे कह दिया गया कि वो देश छोड़ विदेश में बस जाएं क्योंकि यहां तो यही सब होने वाला है। मतलब साफ है कि अराजकता और असहिष्णुता का जो दौर शुरु हुआ वह थमता नजर नहीं आ रहा है। यही वजह है कि अब अपने जमाने के दिग्गज अभिनेता, निर्देशक और पटकथा लेखक अमोल पालेकर भी इसकी जद में आ गए। उन्हें भी सार्वजनिक तौर पर असहज होते देखा गया। यह सब हुआ और वह भी मुंबई की नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न ऑर्ट में एक प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर। दु:खद इसलिए भी कहेंगे क्योंकि दिवंगत कलाकार प्रभाकर बर्वे की याद में आयोजित प्रदर्शनी 'इंसाइड द एंपटी बॉक्स' के उद्घाटन अवसर की यह घटना है, जहां उनकी आत्मा की शांति के लिए, उनके सम्मान में यह आयोजन रखा गया और बड़े विवाद को जन्म दे दिया गया। दरअसल सदा शांत दिखने वाले और आहिस्ता बात करने वाले अभिनेता अमोल पालेकर ने जैसे ही भाषण के दौरान संस्कृति मंत्रालय के एक फैसले की आलोचना की कार्यक्रम आयोजक मंडल के कुछ सदस्यों को नागवार गुजरने लगी। पालेकर को रोकने की खातिर सदस्यों ने टोका-टाकी शुरु कर दी। यह सब हुआ और उसके बाद सोशल मीडिया पर जो वीडियो फुटेज वायरल हुआ उसे लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहिष्णुता पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए। इस घटना से नाराज अमोल पालेकर ने कहा कि कार्यक्रम में बुलाकर खुलकर विचार नहीं रखने दिया गया। इससे साफ है कि देश में असहिष्णुता बढ़ी है, लेकिन वह चुप नहीं रहेंगे। पालेकर ने तो आर्ट गैलरी के बंगलुरू और मुंबई केंद्र में कलाकारों की सलाहकार समितियों को भंग करने के मुद्दे को उठाने की कोशिश की थी, जिसके चलते उन्होंने भारत के संस्कृति मंत्रालय के फैसले की आलोचना की। उन्होंने कहा कि 'आप में से बहुत से लोगों को शायद यह पता न हो कि यह अंतिम शो होगा, जिसे स्थानीय कलाकारों की सलाहकार समिति ने तय किया है न कि मोरल पुलिसिंग या किसी खास तरह की विचारधारा को बढ़ावा देने वाले सरकारी एजेंटों या सरकारी बाबुओं ने।' यहां पालेकर ने सवाल उठाते हुए कहा कि 'जहां तक मुझे पता है दोनों ही क्षेत्रीय केंद्रों मुंबई और बंगलुरू में 13 नवंबर 2018 तक कलाकारों की सलाहकार समितियों को भंग कर दिया गया है।' इस पर कार्यक्रम में मौजूद एनजीएमए की मुंबई केंद्र की निदेशक अनिता रूपावतरम ने उन्हें न सिर्फ टोंका बल्कि यहां तक कह दिया कि 'वो अपनी बात को आयोजन तक ही सीमित रखें।' इस पर अमोल पालेकर का कहना था कि वो तो इसी बारे में बात करने जा रहे हैं, लेकिन क्या उस पर भी सेंसरशिप लागू करने की कोशिश की जा रही है? इस वृत्तांत के बाद भी टोंका-टाकी रुक जाती तो गनीमत थी, लेकिन न अमोल पालेकर रुके और न ही उन्हें बोलने से रोकने वाले ही बाज आए। घटना से असहज हुए पालेकर कह गए कि "यह जो सेंसरशिप है, जो हमने अभी यहीं देखी। कहा जा रहा है कि यह मत बोलो, वो मत बोलो, यह मत खाओ, वो मत खाओ।" इशारों ही इशारों में मोदी कार्यकाल की उन तमाम घटनाओं को जेहन में ताजा कर गए, जिन्हें लेकर तमाम क्षेत्रों की अनेक हस्तियों को देश में असहिष्णुता नजर आई थी। अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि असहिष्णुता यदि है तो उसका अहसास करवाने वाले लोग भी इस समाज में मौजूद हैं, जो कहीं न कहीं विवाद को बढ़ाने का ही काम करते देखे जा रहे हैं। अब जबकि लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं तो देश में असहिष्णुता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला होने के साथ ही साथ भ्रष्टाचार, भय, भूख का राज भी खास तरह के लोगों को नजर आने लगा है। इसलिए इसे राजनीति से भी जोड़कर देखा जाना उचित होगा। वैसे भी देश में कुछ और भी चीजें हैं जो समाज के असहिष्णु हो जाने सरीखी ही भयंकर और नाकाबिलेबर्दाश्त हो गई हैं। बावजूद इसके इन विषयों को बीते सालों में कभी कभार ही वैचारिक पटल पर गंभीरता से उठाया गया है। बढ़ते अपराध के साथ ही कुपोषण और भुखमरी, बेरोजगारी, किसान आत्महत्या, भ्रष्टाचार ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जिन्हें तमाम सरकारों ने भली-भांति जाना और पहचाना है, लेकिन स्थिति सुधारने के लिए प्रभावी कदम उठाने का साहस शायद इन सरकारों में नहीं है। इसलिए तमाम तरह के दावों के बावजूद ये समस्याएं जस की तस समाज व देश में विद्यमान हैं।
12फरवरी/ईएमएस