लेख

कम्पनियाँ क्यों करती हैं ऐसी भूल?(लेखक-अजित वर्मा/ईएमएस)

14/03/2019

विदेशी या मल्टीनेशनल कम्पनियों के विज्ञापन अक्सर विवाद पैदा करते रहते हैं। कभी शराब की बोतल पर, कभी जूता-चप्पल पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र तो कभी धार्मिक चिन्ह छापकर ये कम्पनियां हिन्दू भावनाओं को आहत करती हैं। फिर जब हिन्दू उद्वेलित होते हैं तो वे मुँह छिपाने लगती हैं। दरअसल, मार्केटिंग के टोटके आजमाने के चक्कर में उलझ जाती हैं। हिन्दू की बड़ी संख्या में उन्हें अपना बड़ा उपभोक्ता बाजार नजर आता है। उन्हें हिन्दुओं की आस्थाओं, धर्म, धार्मिक प्रतीक चिन्हों, सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं का ज्ञान गहराई से नहीं होता। लेकिन वे चाहते हैं कि उनके उत्पादों की ओर हिन्दू आकर्षित हों। इसीलिए वे हिन्दू चिन्हों का प्रयोग करते हैं। और, यही स्टेटेजी उनकी विरोध का कारण बन जाती है। अभी हाल ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड को भी उस समय भारतीयों के गुस्से का शिकार होना पड़ा जब उस पर कुंभ मेले को बदनाम करने का आरोप लगा।
दरअसल, यूनिलीवर को अपने एक विज्ञापन की वजह से ट्विटर पर भारी विरोध का सामना करना पड़ा। कुंभ मेले को परिवार द्वारा ‘बुजुर्गों को छोड़ने’ का स्थान बताने की वजह से बड़ी संख्या में लोगों ने नाराजगी जाहिर की। ‘ब्रूक बॉन्ड रेड लेबल टी’ के इस विज्ञापन के बाद ट्विटर पर गुस्से की प्रतिक्रियाएं ट्रेंड करने लगीं। लोगों के भारी विरोध के बाद कंपनी को ट्विट हटाना पड़ा और फिर इसे संशोधित करके पोस्ट किया गया। नए ट्वीट में लिखा गया, ‘रेड लेबल चाय हमें उन लोगों का हाथ पकड़ने के लिए प्रेरित करता है, जिन्होंने हमें वह बनाया है जो आज हम हैं।’
पुराने ट्वीट में कंपनी की ओर से लिखा गया था, ‘कुंभ मेला वह जगह है, जहां अपने छोड़ दिए जाते हैं। क्या यह दुखद नहीं है कि हम अपनों का ध्यान नहीं रखते। हमें उनका हाथ पकड़ने को प्रेरित करता है, जिन्होंने हमें वह बनाया जो आज हम हैं।
ट्विटर यूजर्स ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कंपनी के उत्पाद के बॉयकॉट की अपील शुरू कर दी। कई यूजर्स ने तो कंपनी के उत्पाद की सूची भी जारी की और उनका इस्तेमाल ना करने की अपील की। अधिकतर यूजर्स ने कंपनी पर हिंदुत्व और कुंभ मेले को बदनाम करने का आरोप लगाया। कम्पनियों के लिए जरूरी है कि वे ऐसी नाजुक बातों का अपने प्रचार में उपयोग न करें, जो लोगों के लिए संवेदनशील हों और उनकी भावनाओं या स्वाभिमान को आहत करती हो। यह बात कम से कम कम्पनियों के रणनीतिकारों को तो समझना ही चाहिए।
14/03/2019