लेख

(विचार-मंथन) भोपाल गैस त्रासदी इंसानी भूल का नतीजा या कुछ और...! (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान /ईएमएस)

02/12/2018

कहते हैं कि 'दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है', लेकिन जब बात भोपाल गैस त्रासदी की होती है तो यह कहावत चरितार्थ होती दिखाई नहीं देती है। दरअसल गैस पीड़ितों की तरफ जब-जब नजरें जाती हैं तब-तब आंखें नम हो जाती हैं और यही सवाल जेहन में बार-बार उठता है कि आखिर इन बेकसूर शहरवासियों का गुनाह ही क्या था जो कि इन्हें इतनी बड़ी सजा देकर यूं छोड़ दिया गया। विचार करें कि जो गैस की जद में सीधे आए उनके प्राण पखेरु उड़ने में भी कितनी तकलीफ सहे होंगे। उन्होंने तक कितनी तकलीफ सही होगी। बहरहाल जो इस दुनिया से सदा के लिए चले गए उनके गम में तो दिल रोता ही है, लेकिन जो गैस खाने के बावजूद बच रहे उनकी जिंदगी भी जिंदा लाश के अलावा कुछ शेष नहीं रही है। दरअसल ऐसे गैस पीड़ित या तो अपनी आंखें गवां चुके हैं या फिर उनके जिस्म के अंदरुनी हिस्से इस कदर डेमैज हो चुके हैं कि उन्हें सालों गुजर जाने के बाद भी तरह-तरह की बीमारियों ने घेर रखा है। सामान्य जिंदगी जीना तो उनके लिए सपना हो गया है, उस पर अफसोस इस बात का कि ऐसे तमाम गैस पीड़ितों का इलाज भी सही से नहीं हो पा रहा है। ये लोग दर-दर की ठोकरें खाते मुआबजे की मांग करते और गैस त्रासदी के 34 साल गुजर जाने के बाद भी न्याय की गुहार लगाते दुनिया के सामने अपने दर्द को बयां करने को मजबूर हैं। कहने में हर्ज नहीं कि इनकी सुध लेने वाला अब कोई नहीं है। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि जो सियासी लोग कांग्रेस शासनकाल में गैस पीड़ितों के हित की बात करते सड़कों पर धरने-प्रदर्शन कर सरकार की ईंट से ईंट बजा देने वाली भाषा का प्रयोग करते देखे जाते थे, उनकी अपनी पार्टी की सरकार को 15 साल होने को आए, लेकिन तब भी गैस पीड़ितों की मांगें ज्यों की त्यों समाधान की बाट जोहती ही दिखी हैं। इसका मतलब तो यही हुआ कि गैस पीड़ितों का इस्तेमाल सरकार बनाने या चुनाव जीतने के लिए तो खूब हुआ लेकिन वाकई पीड़ितों की किसी ने सुध ली हो कहना मुश्किल है। इस तरह से मानवीय भूल कहें या सोची-समझी साजिश, जिसके चलते भोपालवासियों समेत अन्य जगहों से तब यहां आए लोगों को भी जिंदगीभर के लिए यूं सजा दे दी गई मानों वो इसी के लायक रहे हों। इंसानी जिंदगियों से बेरुखी का आलम तो यह रहा कि गैस रिसन से असंख्य मौतें हुईं सो अलग लेकिन उसके बाद भी गैस पीड़ितों की संख्या का लगातार बढ़ना बताता है कि इस हादसे से किसी भी स्तर पर कोई सबक नहीं लिया गया। हम तब भी इंसानी जिंदगी के प्रति लापरवाह रहे और इस हादसे के बाद भी लापरवाह बने हुए हैं। यदि ऐसा नहीं होता तो जिस जगह पर यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री थी उसके आस-पास के कचरे का निष्तारण कब का हो जाना चाहिए था, लेकिन वह काम भी अदालत के हस्तक्षेप के बावजूद नहीं किया जा सका। इसके साथ ही गैस प्रभावित मिट्टी और पानी को शुद्ध करने के लिए ज्यादा से ज्यादा प्लांट लगाए जाने चाहिए थे। हरियाली को बढ़ाया जाना चाहिए था और कोशिश की जानी चाहिए थी कि शहरवासियों को बड़े तालाब या आस-पास के पानी का इस्तेमाल पेयजल के तौर पर नहीं किया जाए, यहां गैस मिश्रित मिट्टी में जो खेती-बाड़ी होती है उस पर भी विशेष तरह के ट्रीटमेंट की आवश्यकता थी, लेकिन तमाम लोगों को मुआवजे की लाइन में लगाकर मानों प्रशासन और जिम्मेदारों ने अपने दायित्वों की इतिश्री मान ली और फिर विदेशों से आने वाले धन की लूटमार का खेल भी खूब चला। गैस त्रासदी के पर्यावरण संबंधी खतरों पर विचार किया ही नहीं गया। यहां सभी ने अपने-अपने स्तर पर उन वैज्ञानिकों की चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जिन्होंने कहा था कि इस जहरीली गैस का असर भोपाल की मिट्टी और पानी में दो-चार साल नहीं बल्कि दशकों रहने वाला है और जो इसका इस्तेमाल करेगा उसे बीमारियों का तो सामना करना ही करना है। यही वजह रही कि गैस त्रासदी के इतने सालों बाद भी लोग इसके नाम पर बीमारियां लिए अस्पतालों में रोते तड़पते मिल जाते हैं। कहने को तो भोपाल गैस त्रासदी पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना रही है, लेकिन गैस पीड़ितों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो न्याय मिलना चाहिए था वह नहीं मिला है। इसलिए बार-बार तीन दिसंबर, 1984 की आधी रात के बाद सुबह यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली जहरीली गैस में मरने वालों और पीड़ितों की चीखें कानों में गूंजती चली जा रही हैं। मिक या मिथाइल आइसो साइनाइड गैस किसी प्रकृतिजन्य जहरीली गैस का हिस्सा नहीं थी, बल्कि अधिक धन कमाने का लोभ और लालच के चलते चंद लोगों के द्वारा की गई बड़ी भूल का नतीजा रही है। इसमें दोराय नहीं कि दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए इस तरह की औद्योगिक इकाईयां होनी चाहिए, लेकिन इंसानी जिंदगियों की अनदेखी करके बिना जीवनरक्षक उपायों के यूं फैक्टरियां नहीं चलाई जानी चाहिए। अंतत: जो गैस पीड़ित हैं उनकी यूं अनदेखी हरगिज ही नहीं की जानी चाहिए। गैस पीड़ितों के न्याय की दरकार को पूरा करने के लिए शासन व प्रशासन स्तर पर हर संभव मदद दी जानी चाहिए, क्योंकि यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि यूं जिंदा लाशों के सहारे कभी विकास के सौपान नहीं रचे जा सकते हैं।
02दिसम्बर/ईएमएस