लेख

अनियन्त्रित राजनीति : लोकतन्त्र का महल खोखली चुनावी नींव पर.......? (लेखक- ओमप्रकाश मेहता / ईएमएस)

07/12/2018

यह एक चिंतनीय कटु सत्य है कि आज भारतीय लोकतंत्र का महल खोखली चुनावी नींव पर खड़ा है और अनियंत्रित राजनीति की दीमक उस नींव को इसी तरह खोखली करती रही तो यह लोकतंत्र का महल किसी भी दिन जमींदोज़ हो सकता है, इस नींव ने अपने राजनीतिक आकाओं से कई बार ऐसा न करने की गुहार लगाई, किंतु नींव की गुहार कोई सुनने को तैयार नहीं है और देश के अन्य संवैधानिक इमारतों की तरह लोकतंत्र के इस महल की नींव भी लगातार खोखली की जा रही है और देश के लोकतंत्र की किसी को भी चिंता नहीं है।
यह केवल एक दिखावा भर है कि देश का चुनाव आयोग स्वतंत्र व निष्पक्ष है और वह बहुत ईमानदारी से अपना महान उत्तरदायित्व का निर्वहन कर रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर मुख्य चुनाव आयुक्त अपने कर्तव्यों व दायित्वों के ईमानदारी व निष्पक्षतापूर्वक निर्वहन के लिए छटपटाता है और उसके इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर सत्तारूढ़ राजनेताओं द्वारा धूल डाल दी जाती है।
इसका ताजा उदाहरण चुनाव आयोग के निवृत्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ओ.पी. रावत है, जिन्होंने खुले रूप में पाँच राज्य विधानसभाओं के चुनावों में कालेधन के दुरूपयोग का आरोप लगाया, साथ ही शराब के दखल के प्रति भी चिंता व्यक्त की। चुनाव आयोग ने मतदान के पूर्व अकेले मध्यप्रदेश से सौ करोड़ से अधिक मूल्य की शराब व अन्य सामान जब्त किया, जिसका दुरूपयोग मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए होने वाला था। जबकि पिछले विधानसभा चुनाव (2013) के समय केवल 19 करोड़ का सामान पकड़ाया था, इस बार पकड़ी गई अवैध शराब की मात्रा करीब छ: लाख लीटर है। इस सत्यता से दु:खी श्री रावत ने रानीतिक दलों को मिलने वाली चंदे की दौलत और उनके खर्च की सीमा भी तय होना चाहिए, चुनाव में कालेधन के उपयोग पर भी श्री रावत ने काफी चिंता व्यक्त की थी।
किंतु वास्तविकता यह है कि राजनीति के नक्कारखाने में चुनाव आयोग प्रमुख की तूती सी आवाज को सुनता कौन है, यदि यही चलन आगे भी चलता रहा तो देश के सभी संवैधानिक संगठनों को अपने अधिकार, दायित्व व कर्तव्य भूलकर सत्ताधीशों के नियंत्रण में रहना पड़ेगा और सत्ताधारी संगठन ही लोकतंत्र के मालिक बनकर बैठ जाऐंगे।
सबसे बड़े खेद और चिंता की बात तो यह है कि अब दिनोंदिन सत्ता के सिंहासन पर दीर्घजीवी होने के सपने देखें जाने लगे है, फिर इसके लिए चाहे इन्हें अपना ईमान, वाणी, चरित्र और नैतिकता का त्याग क्यों न करना पड़े? इसीलिए आज-कल चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं के हितों या कल्याण की बात नहीं की जाती, उनकी जगह प्रतिपक्षी दलों को गालियाँ देने की कवायदें की जाती है। इसी कारण अब चुनावों में घोषणा-पत्र केवल और केवल दिखावे की वस्तु बनकर रह गए है, न उन पर चुनाव जीतने और सत्ता प्राप्त करने के बाद अमल करने पर ध्यान दिया जाता है और न ही उनका कोई महत्व ही प्रतिपादित किया जाता है, घोषणा-पत्र इसीलिए ”जुमलों का पुलिंदा“ बनकर रह जाते है, और चूंकि सत्ता प्राप्ति के बाद चुनावी वादों पर कोई अमल तो करना नहीं है इसलिए घोषणा-पत्र तैयार करते समय उन्हें ’लुभावने‘ बनाने के चक्कर में उनकी पूर्ति में खर्च होने वाली राशि या धन की भी कोई चिंता नहीं की जाती, जिसका ताजा उदाहरण सत्ता प्राप्ति के दस दिन के अंदर किसानों के कर्ज माफ करने की घोषणा है, जिस पर मध्यप्रदेश में पचास हजार करोड़ की राशि खर्च होना है, उस प्रदेश में जहां की सरकार पहले से ही करीब दो लाख करोड़ के कर्ज में दबी हुई है और जहां तक चुनाव पर खर्च होने वाली राशि का सवाल है, उसका कोई हिसाब ही नही है, फिलहाल पांच राज्यों में हो रहे विधानसभाओं के चुनावों पर सत्रह हजार करोड़ के खर्च का अनुमान है। चूंकि चुनाव आयोग का किसी को भय नहीं है, इसलिए उसकी कार्यवाही की चिंता भी किसी को भी नहीं है। इस तरह कुल मिलाकर अब लोकतंत्र पर राजनीतिक सत्ता तंत्र पूरी तरह हावी हो चुका है, जो भारतीय लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। अब सिर्फ न्यायपालिका पर ही जनविश्वास कायम है और उसी पर सब की नजर है।
07दिसम्बर/ईएमएस