लेख

"विनोबा भावे व उनका भूदान आंदोलन" (लेखक-प्रो.शरद नारायण खरे/ईएमएस)

10/09/2019

(जन्म दिवस 11सितंबर पर विशेष)
देश में अनेक महापुरुष हुए हैं,जिन्होंने कि लोक कल्याण के कार्य अपनी मौलिक शैली में सम्पन्न किए हैं।यद्यपि उनमें से अनेक आज हमारे बीच नहीं हैं,पर उनके कार्य विद्यमान हैं।वह 18 अप्रैल 1951 की तारीख थी, जब आचार्य विनोबा भावे को ज़मीन का पहला दान मिला था। उन्हें यह ज़मीन तेलंगाना क्षेत्र में स्थित पोचमपल्ली गांव में दान में मिली थी। यह विनोबा के उसी 'भूदान आंदोलन' की शुरुआत थी, जो अब इतिहास के पन्नों में दर्ज़ है या फिर पुराने लोगों की स्मृति में।
तब विनोबा पदयात्राएं करते और गांव-गांव जाकर बड़े भूस्वामियों से अपनी जमीन का कम से कम छठा हिस्सा भूदान के रूप में भूमिहीन किसानों के बीच बांटने के लिए देने का अनुरोध करते थे। तब पांच करोड़ एकड़ ज़मीन दान में हासिल करने का लक्ष्य रखा गया था जो भारत में 30 करोड़ एकड़ जोतने लायक जमीन का छठा हिस्सा था। उस वक्त प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) के नेता जयप्रकाश नारायण भी 1953 में भूदान आंदोलन में शामिल हो गए थे। आंदोलन के शुरुआती दिनों में विनोबा ने तेलंगाना क्षेत्र के करीब 200 गांवों की यात्रा की थी और उन्हें दान में 12,200 एकड़ भूमि मिली। इसके बाद आंदोलन उत्तर भारत में फैला। बिहार और उत्तर प्रदेश में इसका गहरा असर देखा गया था। मार्च 1956 तक दान के रूप में 40 लाख एकड़ से भी अधिक जमीन बतौर दान मिल चुकी थी। पर इसके बाद से ही आंदोलन का बल बिखरता गया।
1955 तक आते-आते आंदोलन ने एक नया रूप धारण किया। इसे ‘ग्रामदान’ के रूप में पहचाना गया। इसका अर्थ था ‘सबै भूमि गोपाल की’। ग्रामदान वाले गांवों की सारी भूमि सामूहिक स्वामित्व की मानी गई, जिसपर सबों का बराबर का अधिकार था। इसकी शुरुआत उड़ीसा से हुई और इसे काफी सफलता मिली। 1960 तक देश में 4,500 से अधिक ग्रामदान गांव हो चुके थे। इनमें 1946 गांव उड़ीसा के थे, जबकि महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर था। वहां 603 ग्रामदान गांव थे। कहा जाता है कि ग्रामदान वाले विचार उन्हीं स्थानों पर सफल हुए जहां वर्ग भेद उभरे नहीं थे। वह इलाका आदिवासियों का ही था।
पर बड़ी उम्मीदों के बावजूद साठ के दशक में भूदान और ग्रामदान आंदोलन का बल कमजोर पड़ गया। लोगों की राय में इसकी रचनात्मक क्षमताओं का आम तौर पर उपयोग नहीं किया जा सका। दान में मिली 45 लाख एकड़ भूमि में से 1961 तक 8.72 लाख एकड़ ज़मीन ग़रीबों व भूमिहीनों के बीच बांटी जा सकी थी। कहा जाता है कि इसकी कई वजहें रहीं। मसलन- दान में मिली भूमि का अच्छा-खासा हिस्सा खेती के लायक नहीं था। काफी भूमि मुकदमें में फंसी हुई थी, आदि-आदि। कुल मिलाकर ये बातें अब भुला दी गई हैं। हालांकि, कभी-कभार मीडिया में भूदान में मिली ज़मीन के बाबत ख़बरें आती रहती हैं। आचार्य विनोबा का 'भूदान आंदोलन' लोगों के जे़हन में रह गया है। जानकारों की राय में आज़ादी के बाद यह उन पहली कोशिशों में से एक था, जहां रचनात्मक आंदोलन के माध्यम से भूमि सुधार की कोशिशें की गई थी। सो लोगों ने बड़ी कोशिशें की हैं, इस समाज को आगे लाने की। दुख है कि वे कोशिशें समय के साथ समाप्त हो गई हैं। तो भी 'सर्वोदय' के प्रणेता व 'भूदान आंदोलन' के जनक विनोबा भावे जी के कार्य आज भी विद्यमान हैं।हम उनके लोक कल्याण के इस पावन व विशिष्ट कार्य को बारम्बार प्रणाम करते हैं।
10सितम्बर/ईएमएस