लेख

क्या राष्ट्र भगवाकरण की ओर जा रहा हैं ! (लेखक- डॉक्टर अरविन्द जैन / ईएमएस)

02/12/2018

हर राजा अपने कार्यकाल को स्वर्णिम काल बनाना चाहता हैं और बनाता भी हैं। इससे कोई अछूता नहीं रहा। चाहे गुप्तकाल हो, मौर्यकाल हो, मुग़ल काल हो, ब्रिटिश काल हो,गाँधी, नेहरू युग हो या मोदी युग हो। सब अपने काल को अजर अमर बनाकर जीवित में या उसके बाद भी अमर रहना चाहते हैं और रहते भी हैं। गुप्तकाल से लेकर ब्रिटिश राज तक का शासन लम्बे समय तक रहा तो उस दौरान उन राजाओं ने, शासकों ने काम भी किया और यश भी मिला। यदि हम निष्पक्ष चिंतन करे तो हर युग में जितने भी निर्माण हुए चाहे वे अत्याचारी हुए या लोककल्याणकारी हुए उन्होंने जो धरोहरों का निर्माण किया वे आज भी उनके यशोगान गाती हैं और गा रही हैं। चाहे आप उन्हें पसंद करे या न करे।
इसी प्रकार वर्तमान में मोदी सरकार ने चार वर्षों से अधिक समय में इतना विकास कर दिया जितना विगत ७० वर्षों में नहीं हुआ। इसका मतलब पुरानी सरकारों ने जो भी काम किया वह शून्य रहा और सब विकास का काम साढ़े चार वर्षों में हुआ। आज हमारे वित्त मंत्री ने पूछा की महात्मा गाँधी के पिता का नाम क्या हैं ?सरदार पटेल के पिता का नाम क्या हैं ?उनकी पत्नी का नाम क्या हैं ?इनकी कोई भी पीढ़ी का नाम नहीं लिया जाता हैं और गाँधी नेहरू परिवार की चार पीढ़ियों का नाम लिया जाता हैं। बात समझ से परे हैं !यदि पटेल के पिता जी या पत्नी ने देश के लिए कोई काम किया होता तो उनका नाम याद रखा जाता। गाँधी जी के पौत्रों ने कुछ काम किया तो नाम लिया जाता हैं। शास्त्री जी के पुत्रों ने काम किया तो उनका नाम लिया जाता हैं। गुरु गोलवलकर हो या अन्य सर संघ सचालक यदि वे शादी शुदा होते तो उनके वंशज संघ में काम करते। जब नहीं हैं तो क्या करेंगे कोई भी,अटल बिहारी बाजपेयी जी अविवाहित रहे तो उनकी संतान कहाँ से देश के काम आएगी। आज मोदी जी अविवाहित हैं तो उनके बाद उनका नाम लेने वाला या वंश बढ़ाने वाला कौन होगा। जेटली जी के पिताजी की क्या भूमिका रही देश के लिए वो उजागर करे तो उनका नाम भी स्वर्णिम अक्षरों में लिया जायेगा। उदाहरण के लिए नेहरू परिवार का इतिहास जितना जैसा मालूम हैं की मोतीलाल नेहरू, विजया लक्ष्मी पंडित, पंडित नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, राहुल गाँधी वरुण गाँधी मेनका गाँधी आदि अभी भी काम कर रही हैं इसके आगे यदि कोई अयोग्य संतान होगी तो हम या आप क्या कर लेंगे।
यह बात बहुत जिम्मेदारी से कही जा सकती हैं की भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में और राज्यों में सरकार बनने से संघ और उनकी अनुषांगिक संस्थाओं ने केंद्र और राज्य स्तर पर बहुत काम किये, बहुत आयोजन किये, बहुत गोष्ठियां की और अपने अपने संगठनों को खूब बढ़ावा दिया और उसके माध्यम से संस्कृति, साहित्य, का प्रचार किया। और मजे की बात यह रही की इस दौरान जिनसे इनका दूर दूर तक सम्बन्ध नहीं रहा उनको गले लगाया, अंगीकार किया जैसे हमेशा आंबेडकर का विरोध किया उनको प्राथमिकता दी। गाँधी जी के बंटवारे के कारण विरोध किया उनका नाम भुनाना शुरू किया। जिन पटेल ने संघ पर प्रतिबन्ध लगाया उनको गले लगाया। कहीं न कहीं जिनकी मान्यता पुरानी सरकार ने दी उसका विरोध किया और क्या यह अपेक्षा यदि नई सरकार बनती हैं तो वह आपकी मान्यताओं को क्यों नहीं अस्वीकार करेगी ?
शासक हमेशा निष्पक्ष हो। यह बात जरुरी हैं की वह जिस विचार धारा का होता हैं वह उसकी पुष्टि करता हैं और वह उसका पोषक होता हैं पर इसका मतलब यह नहीं की जिन्होंने आपके पद पर रहकर जो भी कार्य किये थे उनका अवमूल्यन करो और अपनी उपलब्धियों को श्रेष्ठ बताओ। ये पद बहुत अस्थायी होते हैं। ये दया के पात्र हैं, भिखारी होते हैं, अभी जो चुनाव हो रहे हैं उसमे प्रधान सेवक से लेकर सब पार्टी के लोग याचना करते नजर आ रहे हैं। भिखारी जैसे याचक बने घूम रहे हैं। फिर जीतने के बाद वे शहंशाह हो जाये, पर मौलिक रूप से याचक ही हैं।
एक बात बहुत महत्वपूर्ण हैं की सत्ता में रहने पर अपनी विचार धारा थोपना उचित नहीं हैं। प्रजातंत्र में कब बाज़ी पलट जाए कुछ कहा नहीं जाता। आज आप जिनको त्रिस्क्रत कर रहे हो वे आपको भी त्रिस्क्रत करेंगे। जब हम एक देश के वासी हैं सब पार्टियां देश में शासन करना चाहती हैं और विकास करना चाहती हैं पर आपसी सामंजस्य न होना बहुत खेद की बात हैं। कोई भी एक मंच पर एक साथ नहीं बैठते हैं। और यदि बैठते हैं तो श्वान संस्कृति जैसे लड़ते भौकते हैं। कोई किसी के विचारों का आदर नहीं करते हैं। इससे भाई चारा शून्य होता जा रहा हैं। दूसरा सर्वोच्च स्तर पर सब एक हैं और जनता के बीच घृणा का वातावरण बनाकर अपनी रोटियां सेंकते हैं।
अब जनता सब समझने लगी हैं, सत्तर वर्ष में बहुत जान लिया और समझ लिया। हां अभी भी ग्रामीण क्षेत्र उतने जागरूक नहीं हुए हैं जिस कारण उनसे छलावा करके जीतते हैं। जिस तरीके से शिरडी के साईं बाबा के मंदिर के ट्रस्टियों ने जो विवाद पैदा किया हैं मात्र केंद्र और राज्य की सरकारों ने मिलकर किया हैं जैसे द्वारका माई मस्जिद का नाम बदलकर द्वारका माई मंदिर किया वर्ष २०१७ में। और उसका बोर्ड भगवा रंग का बनाया गया हैं। अब जितना भी साहित्य प्रकाशित हो रहा हैं उसमे ॐ साईनाथायाः नमः लिखा जा रहा हैं ! २०१८ में जो साई मंदिर में जो स्तम्भ तैयार किया जा रहा हैं उसमे ॐ का चिन्ह बनाया जा रहा हैं। जबकि यहाँ सब धर्मों के चिन्ह होने चाहिए। क्योकि साई बाबा के भक्त सभी धर्मों के अनुयायी हैं। विशेष रूप से साई बाबा समाधी शताब्दी समारोह में जिस तरह से भगवाकरण किया गया हैं उसको लेकर साई बाबा के श्रद्धालुओं में आक्रोश हैं। साई हिन्दू मुस्लिम और राम रहीम की संस्कृति के प्रतीक हैं। ऐसे न जाने कई प्रकरण दबे पड़े हैं, क्योकि सत्ता के भय से कोई विरोध नहीं कर पाटा। हां जेटली हुए या साक्षी महाराज जो पार्टी के समर्थक हैं उनकी आपत्ति पर कोई कार्यवाही नहीं होती या मुख्य मंत्री द्वारा ताजमहल पर जो टिप्पणी की जाती हैं उस पर केंद्र सरकार का समर्थन होता हैं।
02दिसम्बर/ईएमएस