क्षेत्रीय

भावों से बंध है, भावों से निर्बन्ध -मुनिश्री प्रसाद सागर महाराज

17/07/2019

भोपाल (ईएमएस)। आत्मा को परमात्मा बनाने का माध्यम ध्यान है निग्रन्थ मुद्रा ही निर्वाण की मुद्रा है। रत्नत्रय धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है परम् सत्य यदि कोई है तो वह आत्मा है जिसके पास दया, करूणा है वही सत्य को जान सकेगा। उक्त उद्गार चौक धर्मशाला में मुनिश्री प्रसाद सागर महाराज ने व्यक्त करते हुये कहा कि जो सुख दे वही सत्य है, वही धर्म है जो दुख दे दुखित करे वही अधर्म है यही सरल भाषा में धर्म की व्याख्या है। मोह रहित होना ही मोक्ष मार्ग है, भावों से बंद होता है और भावों से निर्बन्ध होता है। जगत को सुधारने का प्रयास नहीं करते हुये स्वयं को सुधारने की चेष्टा करो इसी में कल्याण है। अपने गुणों को इतना बढ़ाना कि दोषों को ठहरने का स्थान ही न मिले। आत्मा का स्वभाव परभावों से अत्यंत भिन्न है।
मुनिश्री निकलंक सागर महाराज ने कहा कि सुसंस्कारों से सुशोभित संतान ही धर्म, परिवार और देश का नाम गौरव कर सकती है। पारिवारिक संस्कार ही श्रेष्ठता की ओर ले जा सकते हैं। आप अपनी संतानों को कुछ दें या न दें पर संस्कारों की अमूल्य संपदा अवश्य देकर जायें।
पंचायत कमेटी ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी ने बताया कि जबलपुर प्रतिभास्थली से बहने एवं विद्यार्थी आज मुनिसंघ को श्रीफल भेंट करने के लिये आये। पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु एवं अन्य पदाधिकारियों ने सभी ब्रह्मचारिणी बहनों का सम्मान किया एवं प्रतिभास्थली के विद्यार्थियों को ज्ञानवर्धक साहित्य भेंट किया।
धर्मेन्द्र 17 जुलाई 2019