लेख

(विचार-मंथन) चीनी मुद्रा युआन का पाकिस्तान में चलने के निहितार्थ (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान / ईएमएस)

08/11/2018


यह तो दुनिया जान चुकी है कि पाकिस्तान के अंदरुनी हालात बद से बदतर हो चले हैं। बिगड़े हालात के लिए अमेरिका या पड़ोसी मुल्क जिम्मेदार नहीं हो सकते हैं, बल्कि इसकी जिम्मेदारी खुद पाकिस्तान के हुक्मरानों की है। इसकी दूसरी वजह पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी और उन्हें संरक्षण देते कट्टरपंथियों का प्रभाव भी है। गौर करें कि एक तरफ कट्टरपंथियों से समाज और कानून को लगातार चुनौतियां मिलती रही हैं तो वहीं दूसरी तरफ आर्थिक तौर पर देश को मजबूत करने की बजाय पाकिस्तान की सरकारों और सेना ने पड़ोसी देशों को हलाकान करने का फार्मूला अपना रखा है। इस गुप्त एजेंडे को लागू करने में ज्यादा से ज्यादा खर्च करते हुए सरकार पूरी तरह टूट चुकी है। मतलब यह कि सरकारी खजाना पूरी तरह से खाली हो चुका है, जिस वजह से प्रधानमंत्री इमरान खान को खर्च पर कंट्रोल करने से लेकर शासकीय संपत्तियों की नीलामी तक करनी पड़ी है। प्रधानमंत्री कार्यालय की लग्जरी कारें और भैसों की नीलामी दुनियाभर में चर्चा का विषय रही हैं। इस आर्थिक संकट के लिए आवाम को तो कहीं से भी दोष नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह तो देश के कर्ता-धर्ताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने की कोशिशें करती नजर आई है। इसलिए भी आर्थिक मामले में पाकिस्तान की पूर्व सरकारों की नीतियों और बढ़ते भ्रष्टाचार को प्रमुख कारण बताया जाता रहा है, लेकिन समय पर आंख नहीं खोलना और बेहतर फैसले के लिए सरकार को मजबूर नहीं किया जाना कहीं न कहीं विपक्ष में बैठे लोगों पर भी सवाल खड़े करते हैं। इस प्रकार कुछ-एक ईमानदारों को यदि छोड़ दिया जाए तो समस्त सरकारी तंत्र देश के बदतर हालात के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आज पाकिस्तान के हालात यहां तक बिगड़े हैं कि चीन की मुद्रा युआन को पाकिस्तान में चलाने के लिए सरकार को मजबूर होना पड़ा है, जो कि ईस्ट इंडिया कंपनी की याद भी ताजा करा रहा है। आखिर कैसे भुलाया जा सकता है कि अंग्रेजों ने पहले भारत में कंपनी के जरिए ही प्रवेश किया था और साथ में वो लेकर आए थे अपनी मुद्रा, जिसके प्रचलन के साथ उन्होंने पूरे देश में शासन किया। वैसे देखा जाए तो यह फैसला इमरान सरकार का नहीं है बल्कि उनसे पहले ही नवाज सरकार के कार्यकाल में इस आशय के मसौदे पर हस्ताक्षर हो चुके थे। याद करें जब पाकिस्तान के तत्कालीन योजना एवं विकास मंत्री अहसन इकबाल और चीनी एंबेसडर याओ जिंग के बीच इसे लेकर फैसला हुआ था। उस फैसले के तहत कहा गया कि निकट भविष्य में पाकिस्तान में चीनी मुद्रा युआन को भी वही दर्जा हासिल हो जाएगा जो कि अमेरिकी डॉलर को है। इसका अर्थ यह हुआ कि चीन और पाकिस्तान के बीच होने वाले व्यापार का लेन-देन अब अमेरिकी डॉलर ही नहीं बल्कि चीनी मुद्रा युआन में भी हो सकता है। एक तरह से चीन अपने इरादों को अमली जामा पहनाने में कामयाब हो गया है, जबकि पाकिस्तान उसके मकड़जाल में बुरी तरह उलझता चला जा रहा है। गौरतलब है कि वित्तीय संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए आर्थिक पैकेज की मांग लेकर प्रधानमंत्री इमरान खान बिजिंग गए थे। इस दौरे के बाद ही खुलासा हुआ कि चीन न सिर्फ अपनी मुद्रा पाकिस्तान में चलाने जा रहा है बल्कि उसने तो लाखों चीनी नागरिकों को पाकिस्तान में बसाने का भी प्लान तय कर रखा है। इसके तहत चीनी सरकार व्यापार के लिहाज़ से पाकिस्तान के सबसे खास ग्वादर पोर्ट पर भी अपना दबदबा बढ़ाने के लिए कदम आगे बढ़ा चुका है और अगर यह गलत नहीं है तो फिर चीन अपने 5 लाख नागरिकों के लिए एक अलग शहर पाकिस्तान में बसाने जा रहा है, जो पाकिस्तान में मौजूद कट्टरपंथियों के लिए किसी न किसी तरह से परेशानी का सबब बनेगा ही बनेगा। वैसे यह तो सभी जानते हैं कि चीनी उत्पाद की ही तरह चीनी संबंध भी भरोसेमंद नहीं होते हैं। ऐसे में पाकिस्तान का बाजार ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश को चीन के हवाले करने की जो गलती पाकिस्तान की सरकार कर रही है उससे आवाम कैसे खुश हो सकती है या चीनी प्रभाव से खुद को कैसे बचा कर रख सकती है। कहना मुश्किल है कि जिस चीन ने अपने देश में धार्मिक आयोजनों पर सख्ती से पाबंदी लगाने का काम किया वह पाकिस्तान जैसे धार्मिक देश की संस्कृति के लिहाज से क्योंकर काम-काज करेगा। फिलहाल भविष्य के पाकिस्तान की तस्वीर की बात की जाए तो साफ दिख रहा है कि पाकिस्तान के अधिकांश बाजारों में मेड इन चाइना का सामान बिक रहा है और उसे खरीदने वाले असंतुष्ट नजर आ रहे हैं। यही नहीं भविष्य के पाकिस्तान की सड़कें, पुल, कल-कारखाने, इमारतें, बंदरगाह यहां तक कि बिजली-पानी और हवा पर भी मेड इन चाइना लिखा दिख रहा है। यह सब इसलिए मुमकिन होता दिख रहा है क्योंकि पाकिस्तान में चीनी मुद्रा का चलन जो होने जा रहा है। इमरान सरकार करे भी तो क्या करे क्योंकि सरकारी खजाना तो खाली है। रुपया पूरी तरह गिर चुका है। पाकिस्तानी मुद्रा को कोई पूछ नहीं रहा, इसलिए भी नई मुद्रा के चलन की व्यवस्था करना सरकार की मजबूरी है। कुल मिलाकर एक निहत्थे कमजोर इंसान का सामना भूखे शेर से हो गया है और ऐसे में जो करना है शेर को ही करना है, बेचारा इंसान तो अब ईश्वर भरोसे है।

08नवंबर/ईएमएस