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(विचार मंथन) बाल-दुष्कर्म पर रोक (लेखक -सिद्वार्थ शंकर/ईएमएस)

बच्चों से जुड़े यौन उत्पीडऩ व दुष्कर्म के मामलों से निपटने के तरीके को 'खौफनाकÓ करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र व सभी राज्य सरकारों को इन मामलों में ज्यादा सक्रिय भूमिका निभाने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र व राज्य सरकारों को ऐसी घटनाओं की त्वरित जांच कराकर एक साल के अंदर ट्रायल पूरा कराने की व्यवस्था करने को कहा है। शीर्ष अदालत ने 12 दिसंबर को अगली सुनवाई पर सरकारों को एक्शन रिपोर्ट जमा कराने का भी आदेश दिया है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के खिलाफ बढ़ती वारदातों में 'चेताने वाली बढ़ोतरीÓ के बाद खुद संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की थी। शीर्ष अदालत पहले ही केंद्र सरकार को पॉक्सो एक्ट की 100 से ज्यादा एफआईआर वाले सभी जिलों में विशेष फास्ट ट्रैक अदालत स्थापित करने का आदेश दे चुका है। 13 नवंबर को तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार सुरिंदर एस. राठी की तरफ से तैयार की गई रिपोर्ट का संज्ञान लिया था। पीठ ने पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज सभी मामलों को एक साल के अंदर निस्तारित कराने का आदेश दिया है। पीठ ने कहा, रिपोर्ट में कार्रवाई की स्थिति खौफनाक है। ट्रायल की क्या बात करें, 20 फीसदी मामलों में एक साल के अंदर जांच भी पूरी नहीं हो रही है। तत्कालीन चीफ जस्टिस गोगोई के साथ जस्टिस दीपक गुप्ता व जस्टिस संजीव खन्ना की मौजूदगी वाली पीठ ने कहा, पीडि़तों को न ही कोई सहायक दिया गया और न ही मुआवजा। तकरीबन दो तिहाई मामलों में एक साल से भी ज्यादा समय से ट्रायल लंबित है। देशभर में 30 जून तक बाल दुष्कर्म के एक लाख 50 हजार 332 मामले लंबित थे और इस प्रकार के मामलों के निपटान की दर महज नौ फीसदी ही रही है। इन मामलों के पीडि़तों को बच्चों के पक...