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(विचार-मंथन) संघ के खिलाफ और हिन्दुत्व के करीब जाती कांग्रेस के निहितार्थ (लेखक-डॉ हिदायत अहमद खान /ईएमएस)

सुनने में यह बात भले ही अजीब लगती हो लेकिन हकीकत यही है कि कांग्रेस नेता यदि मंदिर और मस्जिद समेत अन्य धार्मिक स्थलों का रुख न करें तो भाजपा और उसके सहयोगी संगठन कहते देखे जाते हैं कि ये अधर्मी लोग धर्म प्रधान देश की जनता के साथ क्या न्याय कर पाएंगे? वहीं दूसरी तरफ यदि कांग्रेस नेता मंदिर में पूजा करने चले जाएं, जनेऊ संस्कार करते देखे जाएं या अन्य धार्मिक स्थलों में नतमस्तक होते दिख जाएं तो वही लोग कहते दिखेंगे कि क्या ढोंग करते हैं, क्या इन ढोंगियों को जनता माफ करेगी? मतलब राजनीतिक तौर पर धर्म का ठेका भाजपा और उनके चंद सहयोगियों और समर्थकों के हाथों में आ गया है जो कि पूरे देश के धर्मावलंबियों को अपने लिहाज से चलाना चाहते हैं और वही तय करना चाहते हैं कि उनके अनुसार 'धर्म' का कब सबेरा होगा और कब अंधेरे के गर्त में डूबते हुए धर्म को बचाने की गुहार लगाकर अपना उल्लू सीधा किया जाएगा। अगर यही काम कोई राजनीतिक दल या संगठन करने की चेष्टा करता है तो वो सबसे बड़ा पाखंडी, अधर्मी और धोखेबाज साबित कर दिया जाता है। इस भूमिका पर यदि यकीन नहीं हो रहा हो तो मौजूदा पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के दौरे कार्यक्रमों को देख लें, जिनकी ज्यादातर शुरुआत किसी न किसी धार्मिक स्थल से शुरु होती दिखती है। वहीं दूसरी तरफ उन पर निशाना साधने वाले, उन्हें अधर्मी और ढोंगी साबित करने में कोई कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखने वाले लोगों पर भी गौर फरमा लें जो भाजपा के होते हैं या फिर उनके सहयोगी संगठनों से होते हैं। बहरहाल इस पूरी कवायद का सबसे ज्यादा असर इस समय मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। हमने देखा है कि जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी उज्ज...