लेख


(विचार-मंथन) शोध की गुणवत्ता पर असर (लेखक-सिद्धार्थ शंकर / ईएमएस)

भारत में विश्वविद्यालयों की स्थापना का मूल उद्देश्य उच्च शैक्षिक संस्थानों में ऐसे अध्ययन, अध्यापन और अनुसंधान को बढ़ावा देना है जो हमारे समाज और देश की प्रगति में सहायक हो सके। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के तमाम प्रयासों के बावजूद उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हो रहा है, जबकि राधाकृष्ण आयोग, कोठारी समिति, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, यशपाल समिति, उच्च शिक्षा व अनुसंधान विधेयक, उच्च शिक्षा सशक्तिकरण विनिमय एजेंसी आदि के माध्यम से वह अपनी मंशा जाहिर कर चुका है। भारत में इस समय 47 केंद्रीय विश्वविद्यालय और 738 राज्यस्तरीय विश्वविद्यालय हैं। इन सबके बावजूद 16 फीसद छात्र ही उच्च शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयों की दहलीज तक पहुंच पाते हैं। भारत जैसे किसी भी विकासशील देश के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है। उच्च शिक्षा समाज के लिए तभी बेहतर हो सकती है जब इससे निकल कर आने वाले अनुसंधान समाज और देश के लिए लाभप्रद हो सकें। आज सरकार विश्वविद्यालयी शोध को शिक्षकों की पदोन्नति से जोडऩे का प्रयास कर रही है जो शोध के महत्व को बताने के साथ ही किसी न किसी रूप में शिक्षकों पर नकेल कसने का प्रयास भी है। जब भी इस यक्ष प्रश्न पर विचार होता है तो यह सवाल उठना लाजिमी हो जाता है कि क्या शिक्षण संस्थाओं के नीति निर्धारकों में दूरदर्शिता का पूरी तरह अभाव है या ऐसे लोग किसी वर्ग विशेष को लाभ पहुंचाने का काम कर रहे हैं। शोध की दशा में सुधार की दो मूल बातें सभी की समझ में आसानी से आती हैं। पहला-विश्वविद्यालय में नियुक्त होने वाले शिक्षकों की योग्यता कम से कम इतनी तो अवश्य हो कि वे अपनी संस्थाओं में पीएचडी कराने हेतु पात्र हों। इस संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि राजस्थान विश्...