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(विचार मंथन) देश में असुरक्षा और बेचैनी महसूस करता अल्पसंख्यक?

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- डॉ हिदायत अहमद खान 
देश के अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिमों में बेचैनी का अहसास और असुरक्षा की भावना घर करती जा रही है। हद यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इनकी सुरक्षा करने में स्वयं को असफल पा रहे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि जिन्होंने अल्पसंख्यकों को निशाने में लिया हुआ है वो अपने आपको कथिततौर पर गौरक्षक और देशभक्त बताते हैं। इनकी बेकाबू भीड़ कभी भी, कहीं पर भी, गौरक्षा के नाम पर किसी भी नौजवान, बूढ़े-बच्चे यहां तक कि महिलाओं को भी बेइज्जत करते हुए जान से मारने तक से नहीं चूकते हैं। गौरतलब है कि गौरक्षकों की बढ़ती गुंडागर्दी और हिंसा की तमाम घटनाओं को देखते हुए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे तुरंत रोकने को कहा था। उसके बाद भी घटनाएं होती रही हैं। बात साफ है कि देश में अल्पसंख्यकों पर ज्यादती की घटनाओं की गूंज विदेशों में भी सुनाई देती है। ऐसे में जबकि ज्यादा समय प्रधानमंत्री को विदेशों में रहना पड़ता है तो फिर वो कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं कि उनके अपने लोग इस तरह का कृत्य करें जिसका जवाब वो विदेशों तक में न दे पाएं। इस स्थिति से सामान्यजन, राजनेता या समाजसेवी बिचलित होते हुए दिखाई दें तो समझ में आता है, लेकिन जब यही बात संवैधानिक पद में रहने वाले उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की ओर से आए तो चिंता होनी लाजमी है। दरअसल निवर्तमान उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने देश में असहनशीलता और कथित गौरक्षकों की गुंडागर्दी की घटनाओं को सामने रखते हुए एक साक्षात्कार में कहा कि देश के मुस्लिमों में बेचैनी और असुरक्षा की भावना है। कुछ भगवा नेताओं की ओर से अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बयान दिए गए हैं। उपराष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल पूरा करने से पहले 80 वर्षीय हामिद अंसारी ने यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कैबिनेट सहयोगियों के सामने उठाने की बात भी कह चुके हैं। उन्होंने इसे ‘‘परेशान करने वाला विचार’’ करार दिया कि नागरिकों की भारतीयता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हकीकत में यह चिंतनीय है क्योंकि जब सार्वजनिक जीवन में किसी के धर्म, उसकी आस्था और विश्ववसनीयता पर सवाल किए जाने लगते हैं तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाती है। देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाला भी ऐसे लोगों के सामने कुछ कहने की स्थिति में खुद को नहीं पाता है। इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि दस साल संविधान के दायरे में रहे हैं, इसलिए कुछ छटपटाहट तो रही होगी। इस प्रकार उन्होंने अल्पसंख्यकों के विस्तारित मामले को महज हामिद अंसारी से जोड़कर व्यक्तिगत मामला बनाने का प्रयास किया है। इसी प्रकार नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने इस मामले में बिना किसी का नाम लिए यह कह दिया कि कुछ लोग राजनीतिक फायदों के लिए अल्पसंख्यक मुद्दे उठाते रहते हैं। इस प्रकार यदि अल्पसंख्यकों के मामले कोई उठाता है और न्याय की गुहार लगाता है तो वह राजनीति प्रेरित समझा जाए और चूंकि पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने ऐसा ही कुछ किया है तो वह भी राजनीति प्रेरित बना दिया जाना चाहिए। इसके बाद कानून के रखवाले भी अपना काम ईमानदारी नहीं करें तो कोई बात नहीं, भीड़ तमाशा करते हुए कानून हाथ में ले तो भी कोई बात नहीं। ऐसी भीड़ जो पलभर में सजा मुकरर्र और सरे बाजार इंसान की हत्या कर दे तो करे, उस पर सवाल उठाने की किसी को छूट नहीं होगी। हामिद अंसारी जैसे कुछ लोगों को ऐसे कारनामें बिचलित करते हैं तो करें क्योंकि वर्तमान भारत में सभ्य समाज की परिभाषा को बदल कर रख दिया गया है। अब इस प्रकार की घटनाएं कानूनी परिधि में नहीं आती हैं, इसलिए ज्यादा हायतौबा करते हुए सीना पीटने की आवश्यकता नहीं है। देश के जिम्मेदार पद पर रहते हुए भी अंसारी को इस प्रकार की घटनाएं विचलित करती हैं तो यह उनकी समस्या है। हामिद अंसारी को घर वापसी और तर्कवादियों की हत्याओं ने भी विचलित किया है। इसलिए वो कहते नजर आ जाते हैं कि यह भारतीय मूल्यों का बेहद कमजोर हो जाना, सामान्य तौर पर कानून लागू करा पाने में विभिन्न स्तरों पर अधिकारियों की योग्यता का चरमरा जाना है और इससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात किसी नागरिक की भारतीयता पर सवाल उठाया जाना है। इन तमाम घटनाओं में सरकार या उसके नुमाइंदे जो स्पष्टीकरण देते हैं या तर्क रखते हैं उससे जरुरी नहीं कि सभी सहमत हों, इसलिए किसी की खामोशी को उसकी सहमती नहीं समझना चाहिए। इस प्रकार अल्पसंख्यकों में खासकर मुस्लिम समुदाय में एक तरह की शंका है और वह इसलिए क्योंकि जिस तरह के बयान उनके खिलाफ दिए जा रहे हैं उससे वे अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इस आंकलन में कहीं से भी राजनीतिक नमक का स्वाद नहीं मिलता। इस सच्चाई को मानने में सरकार को भले ही समय लगे लेकिन यह हकीकत है कि कानून व्यवस्था भी सरकार के हाथ से फिसलती चली जा रही है और वह भी भीड़तंत्र का हिस्सा बनने में अपने आपको गौरवांवित महसूस कर रही है। यह सिर्फ अल्पसंख्यकों के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण देश के लिए हानिकारक है और इसे यूं ही मजाक में नहीं लिया जा सकता है। इससे देश का विकास अवरुद्ध् होता है और विदेशों में छवि भी खराब होती है इसलिए इसे हल्के में लेना खुद के पैरों में कुल्हाड़ी मारने के बराबर है। इस पर रोक लगना चाहिए और जमीनी स्तर पर इसका माकूल जवाब दिया जाना चाहिए, ताकि अनेकता में एकता के साथ भाईचारे के संदेश को अमली जामा पहनाया जा सके। जय हिंद! 
12अगस्त/ईएमएस
 
Admin | Aug 12, 2017 11:32 AM IST
 

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