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धार इस्लामी मरकज व पर्यटन स्थल

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नईम कुरेशी 
अजमेर शरीफ के ख्वाजा साहब मुईनउद्दीन चिस्ती हिन्द के अव्वल वली से 125 साल पहले धार मालवा तशरीफ ला चुके थे और इतिहासकारों का दावा है कि उन्होंने ही धार को मरकज़-ए-इस्लाम बनाया था। 441 हिजरी यानि 11 शताब्दी के शुरू का यह वाक्या है।  
शाह अब्दुल्ला चंगाल हज़रत अब्दुल्ला चंगाल अरब से खुरासान और संइस्तान से चलकर अपने चंद खास खिदमदगारों के तबलीकी लश्कर के साथ जो पूरे तौर से इस्लामी विचारों के थे हिन्दुस्तान की सरजमीं के मालवा सूबे के शहर धारा उर्फ धार में जलवा अफारोज हुये थे। इस बात की पुष्टि प्रसिद्ध पुस्तक ’हिन्दुस्तान पर इस्लामी हुकूमत‘ के पेज 506-508 पर दर्ज है। इस शहर में ही राजा भोज का शासन रहा था। इस दौर के इतिहासकारों का मानना है कि यह वक्त हिन्दुस्तान में इस्लाम का पौधा लगाने जैसा था। धार जिला इस मामले में उत्तर भारत में सबसे अव्वल रहा है। इसके 125 साल बाद ही ईरान व खुरासान के दर्रे खैबर को पर करते हुए बुलाना की घाटियों को लांघते हुए म.प्र. के अन्दरूनी शहर मालवा धार में अंग्रेजी साल 1020 ई. रहा था। अजमेर शरीफ के ख्वाजा साहब सबसे पहले धार में ही पहुंचे थे। उनके पहुंचते ही इलाके की जनता में रूहानी ताकत से राजा व प्रजा पर काफी असर होने लगा था। राजा भोज भी उस वक्त अपने दरबारियों के साथ इस्लाम की शिक्षा से प्रभावित हुए थे व उनके शिष्य बन गये थे। राजा भोज ने हज़रत अब्दुल्ला चंगाल साहब को अपने किले के दरवाजे पर ही ठहराया था। वहीं उनके दुनिया से जाने के बाद उनको दफनाकर उनका मकबरा बनवा दिया गया। 150 साल बाद उनके मकबरे को दिल्ली के तत्कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने 13 वीं सदी में काफी बड़ा व भव्य बनवा दिया था। इसके बाद दिल्ली के सुल्तान रहे मेहमूद शाह खिलजी ने भी 1455 में इस मकबरे की शान में कुछ और इजाफा कराया व इसको और ऊँचाईयों पर पहुंचाया। कुछ इतिकासकारों का मत है कि धार के राजा ने हज़रत चंगाल से प्रभावित होकर इस्लाम भी स्वीकार लिया था व अंतिम इच्छा अपने को अपने गुरु के समीप ही दफनाने की रखी थी जो अब्दुल्ला चंगाल के समीप ही उन्हें दफनाया गया था। यह वाक्या धार राज्य का इतिहास के सफा 82 पर दर्ज है। धार मालवा इस्लाम में एक खास औलिया बाबा फरीदउद्दीन शकरगंज रहमत अलैह के एक चस्मे चिराग हज़रत मौलाना कमालउद्दीन साहब चिश्ती रहमत अलैह का भी मजार है। आपको 1269 में देहली के हज़रत निजामुद्दीन औलिया साहब ने बेत करके मालवा धार भेजा था। इससे साफ लगता है कि धार 1100 सालों से इस्लामी मरकज के तौर पर प्रसिद्ध रहा है। आज ये धार मांडू स्मारकों का महान ग्रुप है जो जहाज महल के लिये देश दुनिया में काफी प्रसिद्ध है। आज ये धार मांडू स्मारकों का महान ग्रुप है जो जहाज महल के लिये देश दुनिया में काफी प्रसिद्ध है। हज़रत मौलाना कमालउद्दीन चिश्ती साहब सीधे देहली से आकर उज्जैन पहुंचकर सालों तक चिल्लाकसी करते रहे फिर यहां से धार जा पहुंचे वहां की जामा मस्जिद में जाकर ठहरे व यहां 41 साल तक रहे। यहां रहकर रूहानी तालीमातों के जरिये आम लोगों को राहत प्रदान की व बहुत से लोगों को आपने इस्लाम में दाखिल किया। 731 हिजरी में 95 साल की लम्बी उम्र में वह दुनिया से विदा हुए। उनका मजार भी धार की जामा मस्जिद के दरवाजे के पास ही बना है। हज़रत मौलाना कमालउद्दीन चिश्ती साहब बेहतरीन मालूमातों व इनकी दानिशमन्दी से लोग प्रभावित होते थे और इस्लाम की तरफ मुड़ जाते थे। आप भारत के महान सूफी संत मेहबूब इलाही सुल्ताने औलिया हिन्द हज़रत निजामुद्दीन के खलीफा भी थे। जिनके एक प्रमुख शिष्य अमीर खुसरो साहब भी हुये जिन्होंने भारत को अनमोल देन हिन्दवी (हिन्दी भाषा) दी 
 
 ईएमएस सोनी 12अगस्त-
 
Admin | Aug 12, 2017 11:29 AM IST
 

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