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(विचार मंथन) पेड न्यूज अर्थात बात अब इस्तीफे तक नहीं रुके

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- डॉ. हिदायत अहमद खान
स्वतंत्रता प्राप्ति के ध्येय को लेकर शुरु हुई हिन्दी पत्रकारिता ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे। अंग्रेजी शासनकाल में देशभक्त पत्रकारों ने जहां जान-जोखिम में डालकर भी पत्रकारिता की अलख जगाए रखी वहीं स्वतंत्र भारत की जियो और जीने दो की तर्ज पर खाएं और खाने दें वाली आब-ओ-हवा ने इसके मूल्यों को धूल-धुसरित करने में कोई कोर-कसर बाकी न रखी। ईमानदारी का झंडाबरदार बनने वालों की कलम को खरीदने वालों की मानों लाइन लग गई। दरअसल हिन्दुस्तान में पीत पत्रकारिता की शुरुआत जो होती है वह आजादी के बाद ही का काल था। तब पत्रकारों ने इस पेशे को अपनी रोजी-रोटी का जरिया बनाया। वहीं गंदी राजनीति के साथ ही साथ तत्कालीन सरकारों की मंशा अनुरूप खबरें नहीं छपने की वजह से उन्हें तंगी और अन्य तरह की परेशानियों से भी दो-चार होना पड़ा। इन्हीं हालात में पत्रकारिता फलती-फूलती अपना मकाम तलाशती आगे बढ़ी। अत: अब पैड और फेक न्यूज को बढ़ावा देना आमतौर पर पत्रकारिता जगत में अपराध नहीं समझा जाने लगा है। यही वजह है कि मध्य प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा को जब चुनाव आयोग ने पेड न्यूज मामले में अयोग्य करार दिया तो ऐसा लगा कि भाजपा के जनप्रितिनिधि ने नहीं बल्कि आयोग ने कोई भारी गलती कर दी हो। इस भूल को सुधारने के लिए अयोग्य पक्ष ने लगातार अदालतों के दरबाजे खटखटाए। अंतत: सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई की और याचिका खारिज करते हुए बतला दिया कि आयोग का फैसला ही सही है। इस प्रकार संभवत: देश का यह पहला मामला है जिसमें चुनाव आयोग के द्वारा पैड न्यूज मामले में किसी राष्ट्रीय पार्टी के मंत्री को अयोग्य ठहराया गया हो और अदालत ने भी उस पर अपनी मोहर लगा दी हो। वैसे 2011 में उत्तर प्रदेश की एक विधायक पेड न्यूज मामले में अपनी विधानसभा सदस्यता गवां चुकीं थीं, लेकिन वो विधायक ही थीं, यहां मिश्रा भाजपा की शिवराज सरकार में जनसंपर्क मंत्री हैं, जिन्हें सदस्यता जाने के बाद भी मंत्री बनाए रखने की बात लगातार सामने आ रही है। इसका विरोध विपक्ष में बैठी कांग्रेस के नेता और विधायक लगातार कर रहे हैं। बहरहाल यह तो तय है कि किसी भी स्तर के चुनाव क्यों न हों पैसा लेकर किसी खबर को प्रसारित करने का खेल बहुतायत में खेला जा रहा है। इसके बगैर चुनाव जीतना टेढ़ी खीर समझा जाता है। इसलिए कुछ लोग तो पेड न्यूज को आतंक की श्रेणी में रखकर देखते हैं। इसके चलते अब पेड न्यूज़ के अनेक तरीके बाजार में ईजाद कर लिए गए हैं। चुनावी बेला में विपक्षी दलों के ख़िलाफ़ स्टिंग ऑपरेशन का तो मानों सैलाब ही आ जाता है। इसी बीच कुछ ऐसे सर्वे भी सामने आते हैं जिनका हकीकत से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता है और ऐसे सर्वे बहुतायत में विपक्ष को कमज़ोर बताने का काम करते नजर आते हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ ऐसे ही सर्वे सामने आए थे, जिन्हें लेकर विवाद भी हुआ। ये वही सर्वे या खबरें होती हैं जो किसी भी उम्मीदवार के खिलाफ या पक्ष में लहर चलाने का दम भरते नजर आते हैं। ऐसे ही पेड न्यूज को लगाम लगाने के लिए चुनाव आयोग मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मॉनिटरिंग कमेटी यानी एमसीएमसी का चुनाव के दौरान गठन करता है। हैरानी की बात है कि चुनाव आयोग की 2013 में आई एक रिपोर्ट में बताया गया कि महज 2012 से लेकर 2013 तक विधानसभा चुनाव में 1400 मामले पेड न्यूज के सामने आए। इनमें से यदि दो प्रतिशत मामलों को ही अंजाम तक पहुंचा दिया जाता तो देश की राजनीति में अब तक भूचाल आ चुका होता। राजनीति इसका एक पक्ष है, जबकि दूसरा पक्ष पत्रकारिता का है उस पर भी शिकंजा कसने की आवश्यकता है। आखिर देश और समाज का आईना यदि इतना गंदा हो जाएगा तो उसमें सही तस्वीर कैसे दिखाई जा सकती है। अत: जिस तरह से राजनीतिक दलों और नेताओं को पैड न्यूज मामलों में घेरा जाता है और सजा दिलाने का प्रावधान है उसी तरह से सख्त से सख्त कदम ऐसे मीडिया संस्थानों और पत्रकारों के खिलाफ भी उठाए जाने चाहिए ताकि चुनाव प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाया जा सके।
17 जुलाई/ईएमएस
 

Admin | Jul 17, 2017 11:24 AM IST
 

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